बस्ती। भाजपा नेताओं का जो गुंडई वाला चरित्र सामने आ रहा है, उसका खामियाजा भाजपा को ही भुगतना पड़ेगा। चूंकि भाजपा में कार्रवाई करने का कोई प्राविधान नहीं हैं, इस लिए प्रबल मलानी जैसे चेयरमैन की हिम्मत पत्रकार को मारने के लिए हो जाती है। अभी तक एक भी भाजपा नेता ने इस घटना की निंदा तक नहीं की, कार्रवाई करना तो दूर की बात है। इसे एक कमजोर संगठन भी कहा जा सकता है। अगर कमजोर न होता तो किसी की हिम्म्त नहीं पड़ती कि जिलाध्यक्ष के बारे में अभद्र टिपणी न करते। इसका मतलब यह हुआ कि भाजपा वाले चाहे जितना लूटखसोट करे, चाहें जिसको मारे-पीटे, कोई रोकने वाला नहीं हैं, अगर कोई पत्रकार रोकने की हिम्मत भी करता है, तो भ्रष्टाचारी इतना मारते हैं, कि वह डर के मारे समझौता कर लेता है। कहने का मतलब मार भी खाया और समझौता भी किया, ऐसी पत्रकारिता करने से क्या फायदा? इससे अच्छा परचून की दुकान खोल लीजिए। डर कर पत्रकारिता नहीं किया जाता, पत्रकारिता निडर और निष्पक्ष होकर किया जाता है। समझौतावादी पत्रकारों को जितना जल्दी हो सके पत्रकारिता क्षेत्र से बाहर हो जाना चाहिए। ताकि कम से कम हडडी टूटने से तो बच जाएगें। समझौता करने वाले अधिकांश पत्रकारों को कायर और डरपोक कहा जाता है। जिसे डरना चाहिए, वह नहीं डर रहा है, वह खुले आम भ्रष्टाचार कर रहा है, और जिसे नहीं डरना चाहिए, वह डरकर समझौता कर ले रहा है। किसी पत्रकार को इस लिए नहीं रोना चाहिए, कि उसका साथ अपनों ने नहीं दिया, या फिर अपनों के कारण ही वह मारा गया। पत्रकारिता करना है, तो अपने दम पर करो, किसी के भरोसे नहीं, यह इस लिए कहा जा रहा है, क्योकि कई ऐसे मौके सामने आए, जब पत्रकार की संस्था ने ही साथ देने से मना कर दिया, अपना पत्रकार मानने से भी इंकार कर दिया। पत्रकारों के रास्ते में प्रबल मलानी जैसे भ्रष्ट चेयरमैन आते रहेगें, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जिसने मारापीटा उसी के साथ इस लिए समझौता कर लिया, क्यों कि फिर कहीं न मार दें? कहा भी जाता है, कि अगर पत्रकार डर गया, तो उसे पत्रकारिता नहीं करनी चाहिए। पत्रकारों को इसका इस लिए बुरा नहीं मानना चाहिए, क्यों कि आज जो पत्रकारों की स्थित हैं, उसके लिए वह खुद जिम्मेदार है। न नगर पंचायत बभनान के चेयरमैन और न नगर पंचायत रुधौली के चेयरमैन जिम्मेदार है। दोनों भ्रष्ट चेयरमैनों ने अपनी कमियों को छिपाने के लिए निरीह पत्रकारों को मारापीटा, एक ने तो समझौता कर लिया लेकिन दूसरे ने नहीं किया, और वह आज भी भ्रष्ट चेयरमैन के खिलाफ लड़ाई लड़ रहा है। जब भी पत्रकारों के साथ कोई घटना घटी उसमें पत्रकार ही भूमिका रही, जिस तरह बभनान के भ्रष्ट पत्रकारों ने भ्रष्ट चेयरमैन का साथ दिया, उससे पूरी पत्रकारिता को शर्मसार होना पड़ा। पत्रकारों को इतना भी नीचे नहीं गिरना चाहिए, कि अपने लाभ के लिए अपने ही साथी को बलि का बकरा बना दे। अगर पत्रकार अपने साथियों का साथ नहीं दे सकता तो न दे, लेकिन पत्रकार के खिलाफ साजिष न रचे। साजिश रचने वाले पत्रकारों को यह नहीं भूलना चाहिए, कि एक दिन वह भी साजिश का षिकार हो सकते है। एक साजिश के तहत पत्रकार विनोद जासयवाल को 10 जुलाई को सबके सामने प्रबल मलानी ने मारा, और दूसरे दिन यानि 11 जुलाई को तब मारापीटा जब वह गौर थाने में तहरीर देने जा रहे थे, पहले से ही घात लगाए, चेयरमैन के गुगों ने मारापीटा। चेयरमैन से अधिक गुर्गो ने मारा। बिडंबना यह रही है, कि पत्रकार को लोगों के सामने मारापीटा गया, लेकिन एक व्यक्ति बीचबचाव कराने नहीं आया। यह समाज का सबसे घिनौना सच है।
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