बस्ती। उप निदेशक कृषि कार्यालय में वेतन और योजना बेचने की बात अब पुरानी हो गई, नई बात यह है, कि इस कार्यालय में मलाईदार पटल बिक रहा है। अगर किसी को आत्मा, एनएफएसएम और इन सीटू यानि यंत्रीकरण का पटल चाहिए तो उसे पहले साहब को ढ़ाई लाख का भुगतान करना होगा, भुगतान चेक या आनलाइन नहीं बल्कि नकद में करना होगा। ढ़ाई लाख देने के बाद पटल सहायक कई करोड़ का मालिक बन जाता है, उसके पास नेताओं की तरह बैंक बैलेंस हो जाता है, ड़ेढ़ दो करोड़ का बगंला बनवा सकता है, दो करोड़ की जमीन खरीद सकता, और लग्जरी कार से घूम सकता है। कहने का मतलब ढ़ाई लाख देने के बाद पटल सहायक, पटल सहायक नहीं रह जाता, बल्कि सेठ बन जाता है। जाहिर सी बात है, जिस पत्नी का बाबू पति अगर इतनी दौलत लाकर देता है, तो पत्नी की नजर में उसका पति महान होता है। पत्नी को इससे कोई मतलब नहीं पड़ता कि उसका पति चोरी चमारी करके पैसा ला रहा है, या फिर किसानों का अनुदान मारकर। पत्नी को तो हीरों का हार, बगंला और गाड़ी चाहिए, और यह सबकुछ एक ईमानदार कर्मी पूरे जीवन में भी नहीं एकत्रित कर सकता। रही बात साहबों की तो इनकी बात ही मत कीजिए, पैसे के लिए यह जितना गिर सकते हैं, गिर जाते हैं, अगर इन्हें पैसे के लिए अपना ईमान भी बेचना पड़े तो यह पीछे नहीं हटेंगें। लेकिन ऐसे लोगों का और उनके परिवार का अंत बहुत ही खराब होता है, तब उनका पैसा काम नहीं आता।
हम बात कर रहे थे, उप निदेशक कृषि कार्यालय के बाबूओं और साहबों की। यहां के साहब पहले ऐसे अधिकारी होगें, जिन्होंने पैसा बनाने के लिए पटल तक बेचा, इससे पहले इन पर वेतन और अनुदान बचने तक आरोप लग चुका है। इस कार्यालय के लोग कहते हैं, कि साहब दिल के बुरे नहीं, व्यवहार भी इनका अन्य अधिकारियों से ठीक हैं, लेकिन इन्हें जिस तरह पैसा बनाने की बीमारी हैं, वह बहुत घातक बीमारी है। हाल ही में यह घातक बीमारी का असर मलाईदार पटल बेचने में दिखाई दिया। पटल बेचने में इन्होंने कोई परहेज नहीं किया, यह कहकर बेचा कि ढ़ाई लाख में ढ़ाई करोड़ का पटल दे रहा हूं। कहा भी जाता है, कि मलाईदार बेचकर पैसा बनाने का हुनर अगर किसी को सीखना हो तो इसमें पीएचडी किए उप निदेषक कृषि से सीख सकता है। पटल बेचने के तरीके में इन्होंने बड़े-बड़े अधिकारियों तक को पीछे छोड़ दिया। अब जरा पटल बेचने का इनका तरीको तो देखिए, कागजों में तो इन्होंने पटल परिवर्तन कर दिया, लेकिन काम उन्हीं से ले रहे हैं, जिससे पहले लिया करते थे, इन्होंने ऐसा इस लिए किया क्यों कि आत्मा, एनएफएसएम और इन सीटू यानि यंत्रीकरण का पटल पर चार-चार साल से जमे हुए थे, जबकि कोई भी पटल सहायक एक पटल पर तीन साल से अधिक नहीं रह सकता, डीडी साहब सोचा कि इसी बहाने षासन की मंशा भी पूरी हो जाएगी, और कोई उन पर अगुंली नहीं उठाएगा। कहने का मतलब चार साल पहले जो पटल सहायक आत्मा, एनएफएसएम और इन सीटू यानि यंत्रीकरण जैसी मलाईदार योजना देख रहा था, वह चार साल बाद भी देख रहा है। यानि कागजों में तो पटल सहायक का नाम दूसरा है, लेकिन काम पुराना वाला पटल सहायक देख रहा। जिन तीनों मलाईदार योजनाओं के पटल ़की बात की जा रही है, वह तीनों योजनाएं विभाग की रीढ़ कहा जाता है, इन तीनों योजनाओें पर सरकार इतना पैसा देती है, कि अगर उसका आधा भी सही इस्तेमाल हो जाए तो किसानों की आयु दोगुना हो जाए। किसानों की आय तो दो गुना नहीं हो रही है, लेकिन पटल सहायकों और साहबों की आय हजार गुना अवष्य बढ़ जा रही है। जिन पटल को कागजों में बदला गया उनमें आत्मा योजना, इस योजना का पटल पहले अमित कुमार के नाम था, और यह चार साल तक इस पटल पर रहकर मलाई खाते हैं, और संपत्तियों बढ़ाते रहे। कागजों में इस पटल को दुर्गेश प्रताप सिंह को एलाट कर दिया, लेकिन चार्ज नहीं दिलाया गया, इस पटल का काम पहले की तरह अमित कुमार ही देख रहे है। इन सीटू यानि यंत्रीकरण का पटल दुर्गेश प्रताप सिंह देख रहे थे, और यह पटल अमित कुमार के नाम एलाट हुआ, लेकिन अभी भी यह इन सीटू ही देख रहे है। तीसरी सबसे बड़ी मलाईदार पटल एनएफएसएम इसका काम बिल बाबू जितेंद्र मिश्र के नाम है। इनका परिवर्तन नहीं हुआ, साहब इन्हें आवास बुलाए थे, किस लिए बुलाए थे, यह पता नहीं चला। कमोवेश यही हालत मक्का विकास योजना पटल की है। यह पटल वीरेंद्र दूबे देख रहे हैं, और यह पिछले चार साल से एक ही पटल पर है। यह पिछले चार साल से मलाई काट रहे हैं, और साहब की मेरहबानी से आगे भी काटते रहेंगे। कहा जाता है, कि जिस विभाग के मंत्री को एक पत्रकार यह कहे, कि षाहीजी क्या आप मंत्री बनने लायक हैं, उस विभाग के अधिकारी अगर वेतन और पटल बेचते हो तो इसमें चौकने वाली कोई बात नहीं, शाहीजी को ब्रीफकेष कल्चर बहुत पसंद है।
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