बस्ती। अभी तक आप लोगों ने फर्जी आईएएस, आईपीएस, डाक्टर, सीएम के पीए, इंकम टैक्स आफिसर बनकर अनेक लोगों को लूटते हुए सुना होगा, लेकिन यह कभी नहीं सुना होगा, कि कोई फर्जी पादरी बनकर विवाह भी करवाता होगा और जन्म-मृत्यु प्रमाण-पत्र भी जारी करता होगा। देश में पहली बार फर्जी पादरी होने का खुलासा बस्ती के मीडिया ने किया। जिस कथित फर्जी पादरी का खुलासा हुआ, उसका नाम ‘संजय विंसंेट’ हैं, और यह पिछले लगभग 13 सालों से ‘सेंट जेम्स चर्च’ का पादरी बना हुआ। इसका खुलासा कभी न होता अगर मीडिया चर्च आफ इंडिया ‘सीआईपीबीसी’ और चर्च आफ नार्थ इंडिया ‘सीएनआई’ के असली और नकली को लेकर रिर्पोटिगं न करता। सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि जब सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में ही चर्च आफ नार्थ इंडिया ‘सीएनआई’ के गठन को असंवैधानिक मानकर यह निर्णय दे चुका हैं, कि चर्च आफ नार्थ इंडिया ‘सीएनआई’ नामक संस्था की बस्ती सहित पूरे हिंदुस्तान में कोई भी संपत्ति नहीं हैं, तो फिर कैसे इस कथित फर्जी चर्च का संचालन इसके कथित फर्जी प्रापर्टी इंचार्ज अनिल लाल कर रहें हैं, और दुकान बनवाकर बेच रहें है, और कैसे फर्जी पादरी बनकर संजय विंसेंट विवाह करवा रहें हैं? चर्च आफ इंडिया ‘सीआईपीबीसी’ के बाबी विलिएम का भी मानना है, कि जब चर्च आफ नार्थ इंडिया ‘सीएनआई’ को सुप्रीम कोर्ट अवैध मान चुका तो कैसे संजय विंसेंट वैध पादरी हो सकतें? जाहिर सी बात हैं, कि जब सुप्रीम कोर्ट ने इस संस्था को फर्जी करार दे दिया तो इस संस्था से जुड़ा हर व्यक्ति फर्जी ही कहलाएगा, चाहें वह अनिल लाल हांे या चाहें पादरी संजय विंसेंट ही क्यों न हों? इन्होंने कहीं पादरी का प्रशिक्षण भी नहीं लिया, और इनका पंजीयन एलडीसीए कानपुर में भी नहीं है। कहने का मतलब चर्च फर्जी, प्रापर्टी इंचार्ज फर्जी, स्कूल फर्जी, स्कूल के प्रिंसिपल फर्जी और पादरी फर्जी। फर्जी लोगों का जमावड़ा अगर किसी को देखना हो तो वह सेंट जेम्स चर्च में जाकर देख सकता है। वहां चारों तरफ फर्जी ही फर्जी नजर आएगा।
‘संजय विंसेंट’ दुनिया के पहले ऐसे फर्जी पादरी होगें, जो पिछले कई सालों से ईसाई धर्म से जुड़े लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, उन्हें धोखा दे रहे है। देखा जाए तो पिछले लगभग 13 साल में इनके द्वारा जितने भी विवाह करवाए गए होगें और जन्म-मृत्यु प्रमाण-पत्र जारी हुआ होगा, वह भी फर्जी ही माना जाएगा। कहने का मतलब अगर कोई फर्जी पादरी विवाह करवाता है, तो विवाह को ही फर्जी माना जाएगा। हैरान करने वाली बात यह है, कि जिस संस्था को सुप्रीम कोर्ट अवैध मान चुका है, उस संस्था के पदाधिकारियों का प्रशासन स्वागत कर उन्हें गले लगाता है। जब भी चर्च के असली कस्टोडिएन बाबी विलिएम शिकायत लेकर लखनउ से बस्ती आते तो छोटे साहब मैडम को यह समझा देते हैं, कि इन लोगों का आपस का मामला है। यह कहते-कहते नकली कस्टोडिएन ने दुकानों का अवैध निर्माण करवाकर बेच भी दिया। प्रशासन का कोई भी अधिकारी चाहें वह कमिष्नर हो, चाहें वह डीएम हो, चाहें वह एडीएम और चाहें क्यॅंूं न हो एसडीएम ही हो, किसी ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को देखना ही नहीं चाहा। अगर, देख लेते तो चर्च की जमीन पर अवैध निर्माण न होता और गरीबों का करोड़ों ही डूबता। क्यों नहीं देखना चाहा, इसके बारे में न लिखा जाए तो बेहतर होगा। बस इतना समझ लीजिए कि 2013 से ही चर्च के असली कस्टोडिएन बाबी विलिएम, चर्च की संपत्ति के दुरुपयोग को रोकने के लिए आवाज उठाते रहें, अधिकारियों को साक्ष्य के साथ शिकायत करते रहें, लेकिन इन 13 सालों में प्रशासन ने इनकी एक बार नहीं सुना, अगर सुना होता तो 2016 और 2026 में चर्च की जमीन पर कब्जा न होता। इनसे अच्छा तो कथित नकली कस्टोडिएन अनिल लाल हैं, जिनकी प्रशासन न सिर्फ सुनता ही हैं, बल्कि उनकी वाली करता भी है। अगर ऐसा नहीं होता तो दो बार अवैध दुकानों का निर्माण न होता है। प्रशासन न सिर्फ नकली वालों की सुनता, बल्कि उस ठेकेदार की भी सुनता जिसने नगर पालिका क्षेत्र में टंकी लगाने के नाम पर करोड़ों की वसूली की, जब मीडिया ने शोर मचाया, तब जाकर कई माह बाद ठेकेदार ने एक लाख 40 हजार की रसीद दिया, जबकि वसूला तीन से साढ़े तीन लाख। अब वही ठेकेदार चर्च की जमीन पर दुकान का निर्माण करवाकर एक-एक व्यक्ति से पांच-से छह लाख तक की वसूली कर रहा हैं। इससे पहले लगभग 20-25 लोगों से चर्च के फर्जी कस्टोडिएन डेढ़-डेढ़ लाख वसूल कर चुके हैं, हालांकि इन्होंने बाकायदा रसीद भी दिया, लेकिन ठेकेदार तो कोई रसीद भी नहीं दे रहा है। जिसका खुलासा अनेक लोग कर चुके है, अब आप लोग समझ गए होगें कि क्यों प्रशासन 13 साल तक शिकायतों को अनसुना करता रहा।
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