बस्ती। मालवीय रोड स्थित भव्या होटल पैलेस और कैली रोड स्थित ओझा डायग्नोसिस्ट सेंटर में अगर आग लग गई तो कोई नहीं बच पाएगा, क्योंकि अगर भव्या के बेसमेंट में पार्टी हाल बना तो ओझा में बेसमेंट में सेंटर चल रहा है। इन दोनों स्थानों पर हमेशा भीड़ रहती है। सबसे खराब स्थित भव्या पैलेेस की है, क्यों कि यहां पर फायर के लिए छोड़े गए स्थान को भी पैक करवा दिया गया, बेसमेंट का मानचित्र पार्किगं में स्वीकृति हैें, लेकिन पार्किगं के स्थान को भी पार्टी हाल बना दिया। इसकी शिकायत कई बार उमेश गोस्वामी की ओर से डीएम से की गई, लेकिन बीडीए वाले हर बार पैसा लेकर फर्जी रिपोर्ट लगाते आ रहे हैं, यही फर्जी रिपोर्ट एक दिन प्रशासन के लिए मुसिबत खड़ी कर सकता है। प्रशासन और बीडीए को इस होटल के मामले को गंभीरता से लेना चाहिए, क्यों कि यह होटल आमजन के लिए पूरी तरह असुरक्षित है। कभी भी इस होटल में कोई अप्रिय घटना घटित हो सकती है, तब प्रशासन हाथ मलता रह जाएगा, भले ही चाहें होटल के संचालक जेल चले जाएगें, लेकिन न कितने कितनों की जिंदगी चली जाएगी। प्रशासन और बीडीए को अब इस मामले में कोई रिस्क नहीं उठाना चाहिए, रिस्क उठाने का मतलब कई की जिंदगीं का खतरे में डालने जैसा होगा। हैरानी होती है, बीडीए के लोगों के लालची स्वाभाव पर, कुछ पैसों के लिए यह लोग किसी की जिंदगी के साथ किस तरह खिलवाड़ कर सकते हैं, इसका जीता-जागता उदाहरण भव्या पैलेस है। बीडीए से अधिक होटल के संचालक को दोशी माना जा रहा है, ऐसा भी नहीं कि इसके संचालक के पास पैसे की कोई कमी हो, इनका नाम जिले के 100 करोड़ के क्लब में शामिल लोगों में होती है, अगर इतनी दौलत वाला कारोबारी इंसासनों की जिंदगियों के साथ खिलवाड़ करता है, तो ऐसे लोगों के खिलाफ अवष्य कार्रवाई होनी चाहिए, क्यों कि चाहें जितना भी पैसे से कोई बड़ा हो, उसे मनमानी और नियम विरुद्व कार्य करने का कोई अधिकार नहीं है। ध्यान रहे, जब भी किसी प्रतिष्ठान में लखनउ जैसी घटना होती है, तो सबसे पहले उस प्रतिष्ठान के संचालक को जेल जाना पड़ता है। सवाल उठ रहा है, कि जिनकी गिनती धन्नासेठों में होती है, उसे नियम विरुद्व कार्य क्यों करने पड़ते है? बल्कि ऐसे लोगों को समाज और प्रशासन के सामने एक आईडिएल बनना चाहिए। अब आ जाइए, ओझा डायग्नोसिस्ट सेंटर की तो, इन्हें भी नियम विरुद्व कार्य करने की आदत है। इनका भी सेंटर बेसमेंट में सीएमओ की मेहरबानी से चल रहा है, अगर इसके यहां भी कोई आगजनी जैसी घटना होती है, तो एक भी मरीज और तीमारदार नहीं बच पाएगें। बेसमेंट में इतनी भीड़ होती है, कि लोगों की सांसे फूलने लगती है। अनेक शिकायते हुई, लेकिन बीडीए की तरह सीएमओ पैसा लेकर खामोश हो जाते है। प्रषासन अगर ओझा डायग्नोसिस्ट के मामले में गंभीर नहीं हुआ तो बहुत बड़ा आरोप लग सकता, तब कोई काम नहीं आएगा। जो कारोबारी जनता के पैसे से बड़े बिजनेसमैन बनते हैं, वही सबसे अधिक आम जनता की सुरक्षा की ख्याल नहीं रखते। यह सबकुछ करते हैं, लेकिन उनके लिए नहीं करते, जिनके चलते यह 100 करोड़ के क्लब में षामिल होते है। पैसा कमाने के चक्कर यह लोग इंसानियत को भूल जाते है।
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