बस्ती। जिले की जनता और मीडिया ब्राहृमण महासभा के उन लोगों को दिपावली की ढ़ेरों बधाई दे रही है, जिन लोगों पर चंदा चोरी का आरोप लगा और जिन लोगों ने चंदा चोरों को बचाने का काम किया। ऐसे लोगों की जितनी भी निंदा की जाए कम है, आज ऐसे लोगों के कारण देश और विदेष में ब्राहृमण महासभा की बदनामी हो रही है। जिले के लोगों ने देखा कि किस तरह 20 साल से ब्राहृमण महासभा के नाम पर दानवीरों को लूटते रहे। चंदा चोरों के खिलाफ जितनी आवाज ब्राहृमण महासभा और मीडिया ने उठाया, उतना राम मंदिर में हुए चंदा चोरी के खिलाफ नहीं उठाया, लोगों ने ऐसे लोगों के चेहरे भी देखे जो कहते तो अपने आप को बहुत ईमानदार, लेकिन उनकी ईमानदारी का सच उस समय लोगों ने देखा जब इन्होंनें चंदा चोरों का चेहरा बेनकाब नहीं होने दिया, क्या इसी को ईमानदारी कहते है? 20 साल तक चंद लोग ब्राहृमण महासभा को लूटते रहें, और जिम्मेदार दृष्टिराष्ट की तरह चुप रहे है। चंदा चोरों से अधिक उन लोगों को दोषी माना जा रहा हैं, जिन पर लोगों ने आंख बंदकर भरोसा किया। सवाल उठ रहा है, क्या समाज ऐसे लोगों को कभी माफ कर पाएगा, जिन्होंने हजारों भक्तों के साथ विष्वासघात किया। आडिट जांच रिपोर्ट को अब तक सार्वजनिक न करना या बताता है, उन लोगों की मंशा लगभग पूरी हो गई, जो लोग चाहे रहे थे, कि न तो जांच हो, और न दोषियों को कभी सजा मिले। चंद लोगों के चलते मंदिर का निर्माण घटाई में पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। अब कौन ब्राहृमण महासभा के लोगों पर विस्वास करेगा, और क्यों मंदिर निर्माण के नाम पर चंदा देगा? भले ही ब्राहृमण महासभा की छवि को खराब करने वाले खुष हो रहे होगें, लेकिन विप्र कभी माफ नहीं करेगा, माफी के लायक तो वे लोग भी हैं, जो राष्टीय कार्यकाारिणी के पदाधिकारी है। कहने को यह लोग कहते हैं, कि चंदा चोरी हुई, लेकिन आज तक एक भी पदाधिकारी ने चंदा चोरों के खिलाफ न तो एफआईआर दर्ज करवाया और न विरोध स्वरुप इस्तीफा ही दियार्। इंट से ईंट बचाने का नारा देने वाले न जाने कहां हैं, पता ही नहीं चल रहा है। किसने इन सूरमाओं की बोलती बंद कर दी, बड़ा सवाल बना हुआ है। कहना गलत नहीं होगा कि न्याय पर अन्याय की जीत हुई, बेईमान जीत गया, ईमानदार हार गया। पता नहीं ऐसे लोग कब चूल्लूभर पानी में डूबेगे, जिन लोगों के आंख के सामने चंदा चोरी जैसा अपराध हुआ। उन लोगों की सारी हेकड़ी धरी की धरी रह गई, जो बाहर तलवार भांजते थे। सोषल मीडिया पर बड़ी-बड़ी बाते करते थे, बड़े-बड़े उपदेष देते थे, गीता का श्लोक बताते थे। आडिट जांच रिपोर्ट मजाक बनकर रह गया। जिस संस्था में इतने लोग राष्टीय स्तर के पदाधिकारी हो, अगर उस संस्था में चंदा चोरी जैसा आरोप राष्टीय महामंत्री पर लगता है, तो ऐसे राष्टीय पदसधिकारी होने और न होने से क्या लाभ?
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