बस्ती। यदि किसी मुलाजिम को ईमानदारी से भ्रष्टाचार व बेईमानी सीखना हो तो उप कृषि निदेशक कार्यालय कर्मियों से प्रशिक्षण ले सकता है। इस कार्यालय में दलाल से लेकर लेखाकार व उप कृषि निदेशक तक की हिस्सेदारी का लेखा-जोखा एक्सेल सीट पर तैयार किया जाता है। ताकि किसानों के हक की योजनाओं को पारदर्शी तरीके से नोचा जा सके।

प्रायः सुनने में आता है कि फलां विभाग में कमीशन का लेखा-जोखा रखने के लिए रजिस्टर बनाया गया है। जिसमें सबके घूसखोरी का विवरण दर्ज किया जाता है। हालांकि इसे अत्यंत गोपनीय रखा जाता है। हालांकि सूचना संचार क्रांति के युग में अब यह विधि पुरानी हो चुकी है। घूसखोर अब रजिस्टर का भार नहीं संभालना चाहते हैं। इसके रख-रखाव में अत्याधिक रिस्क होने के कारण पूर्व में तमाम विभागों में लोग कानून की भेंट चढ़ कर नौकरी तक गंवा चुके हैं। डिजिटल जमाने में लेखा-जोखा रखने के लिए एक्सेल सीट का उपयोग शुरू हो गया है। कंप्यूटर व मोबाइल की स्क्रीन पर अंगुलियां फिराते ही सारी जानकारी सुरक्षित और संरक्षित हो जाती है। कृषि विभाग के मुलाजिम घूस का लेखा-जोखा इसी एक्सेल सीट पर तैयार कर पूरी व्यवस्था को पारदर्शी बनाए हुए हैं। एक स्क्रीन शॉट के अनुसार, पद के हिसाब से सबको कमीशन मिलता है। जैसे बड़े साहब (बहुत बड़े वाले से छोटे) को 38.5 प्रतिशत, लेखाकार को 5 प्रतिशत, आडिट, ट्रेजरी व बाबू को 14 प्रतिशत, काम कराने वाले यानी की दलाल को 5 हजार और बिल बनाकर देने वाली फर्म को 16.5 प्रतिशत कमीशन दिया जा रहा है। हालांकि इसमें लेखाकार का कमीशन बहुत कम रखा गया है। जानकारी करने पर पता चला कि योजना और काम की प्रवृत्ति के हिसाब से लेखाकार खुद का प्रतिशत तय करते हैं। जैसे अगर बिल प्राकृतिक खेती योजना का है तो उसमें लेखाकार 10 प्रतिशत से नीचे नहीं लेते हैं। इसका कारण यह है कि प्राकृतिक खेती, मिलेट्स आदि योजनाओं में बजट बड़ा है लेकिन इनमें धरातल पर कोई कार्य नहीं किया जाता। यह योजनाएं खेतों में नहीं कागज के एक कोने से दूसरे कोने तक चलती हैं। ऐसे में इनमें कमीशन भी बड़ा हो जाता है। ज्ञात हो कि लेखाकार मनोज कुमार गौतम का जिला पंचायत राज अधिकारी कार्यालय में तीन दिन का उनके संबंधीकरण है। लेकिन वह इसकी अनदेखी कर पूरे समय किसी भवन में ही जमे रहते हैं और कमीशन की मलाई डकार रहे हैं। इसका कारण है, सहायक लेखा अधिकारी बद्रीनाथ का बस्ती कभी कभार आना। उनकी जगह बिल वाउचर पर हस्ताक्षर मनोज कुमार गौतम करते हैं जो घोर वित्तीय अनियमित है। यह लगभग 4 वर्ष से चला आ रहा है। चार सालों में करोड़ रुपया से अधिक वह कमीशन के रूप में डकार चुके हैं। मजे की बात यह है कि ये सब कमिश्नर की नाक के नीचे चल रहा है। यदि आत्मा योजना, प्राकृतिक खेती, यंत्रीकरण योजनाओं के बिल वाउचर की सत्यता की जांच की जाए तो यह जनपद का सबसे बड़ा घोटाला हो सकता है।