गलत ग्राम प्रधान का चुनावः गाँव में लाता है 5 साल का भ्रष्टाचार और अव्यवस्था

राजेश शुक्ल /बनकटी-बस्ती

ग्राम प्रधान गाँव का सबसे नज़दीकी जनप्रतिनिधि होता है, जो विकास का मार्ग तय करता है। हालांकि, जब ग्रामीण लालच, जातिवाद, डर या मुफ्त सामग्री के प्रभाव में गलत व्यक्ति का चुनाव करते हैं, तो गाँव में विकास के बजाय भ्रष्टाचार की स्थायी व्यवस्था स्थापित हो जाती है।

चुनाव संपन्न होते ही सरकारी योजनाओं में अनियमितताएं शुरू हो जाती हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीबों के नाम पर धनराशि निकाली जाती है, लेकिन मकान अधूरे रहते हैं या बनते ही नहीं। शौचालय योजना में भी कागजों पर काम पूरा दिखाया जाता है, जबकि जमीनी स्तर पर कुछ नहीं होता।

मनरेगा को भी अवैध कमाई का माध्यम बना लिया जाता है। फर्जी मजदूरों, मृत व्यक्तियों या बाहर रह रहे लोगों के नाम पर हाजिरी लगाकर मजदूरी निकाली जाती है। एक ही फोटो को बार-बार अपलोड कर काम पूरा दिखाया जाता है, जिससे वास्तविक मजदूरों को न काम मिलता है और न ही मजदूरी।
सड़क, नाली, खड़ंजा और इंटरलॉकिंग जैसे निर्माण कार्यों में घटिया सामग्री का उपयोग होता है। मानकों की अनदेखी के कारण ये कार्य कुछ ही महीनों में टूट जाते हैं, जबकि भुगतान पूरा कर दिया जाता है। ठेकेदार और प्रधान की मिलीभगत से सरकारी धन का खुलेआम गबन होता है।

पेंशन, राशन कार्ड और आवास सूचियों में भी बड़े पैमाने पर हेरफेर होता है। पात्र व्यक्तियों के नाम हटा दिए जाते हैं और अपात्रों को सूची में शामिल कर लिया जाता है। नाम जोड़ने या हटाने के बदले अवैध वसूली एक सामान्य प्रथा बन जाती है।

जो ग्रामीण इन अनियमितताओं की शिकायत करते हैं, उनके नाम योजनाओं से हटा दिए जाते हैं। इससे गाँव में एक तरह की चुप्पी छा जाती है, जिससे भ्रष्टाचार बिना किसी बाधा के जारी रहता है।

पांच साल बीतने पर ग्रामीण अक्सर महसूस करते हैं कि गलत चुनाव के कारण पूरे गाँव का विकास बाधित हुआ है। इस स्थिति में अफसोस और शिकायतें तो होती हैं, लेकिन तब तक गाँव को भारी नुकसान हो चुका होता है।