बस्ती। नीजि कारणों से रेडक्रास सोसायटी बस्ती के सभापति डा. प्रमोद कुमार चौधरी ने इस्तीफा दे दिया। इसकी पुष्टि कोषाध्यक्ष राजेश ओझा ने की। इस्तीफे के बाद नए सभापति के लिए मंथन होना शुरु भी हो गया। चर्चा है, कि सरदार कुलवेंद्र सिंह मजहबी नए सभापति के रुप में शपथ ले सकते हैं, इनके नामों पर आम सहमति बनने की पूरी संभावना है। इस उथल-पुथल के बीच कार्यकारिणी सदस्य एवं पूर्व सचिव इंडिएन रेडक्रास सोसायटी सरदार कुलवेंद्र सिंह मजहबी ने मंगलवार को जिलाधिकारी/अध्यक्ष रेडक्रास सोसायटी को पत्र लिखकर उनसे नए पदाधिकारियों के गठन की प्रक्रिया संपन्न करवाने की अपील की है। ताकि इंडिएन रेडक्रास सोसायटी बस्ती शाखा अपने सामाजिक और मानवीय दायित्वों एवं उद्वेष्यों की पूर्ति कर सके। यह भी निवेदन किया कि नई कार्यकारिणी के गठन होने तक इंडिएन रेडक्रास सोसायटी के बैंक खातों पर किसी भी प्रकार के लेन-देन पर रोक लगाई जाए। इंडिएन रेडक्रास सोसायटी के चुने हुए कार्यकारिणी सदस्यों की बैठक बुलाकर सदस्यों के पूर्व में और सभापति के इस्तीफे पर विचार करते हुए, नई कमेटी का गठन किया जाए।
इंडिएन रेडक्रास सोसायटी के इतिहास में पहली बार निर्वाचित सभापति के द्वारा त्याग पत्र दिया गया। जो अच्छा खासा चर्चा का विषय बना हुआ है। सभापति डा. प्रमोद कुमार चौधरी का इस्तीफा देना कोई सामान्य घटना नहीं कहा जा सकता है। जिस तरह से पिछले काफी दिनों से डा. प्रमोद कुमार चौधरी और उनके हास्पिटल मेडीवर्ल्ड को लेकर जो आरोप लग रहे थे, और जिसके चलते डाक्टर साहब और उनके हास्पिटल की काफी बदनामी हो रही थी, उसे देखते हुए लगने लगा था, कि चौकाने वाला निर्णय कभी भी आ सकता है। मामला उस समय काफी गंभीर हो गया था, जब दस में से सात-आठ कार्यकारिणी के सदस्यों ने डा. प्रमोद चौधरी के सभापति वाली कमेटी के प्रति अविष्वास प्रस्ताव लाकर सबको चौंका दिया, बहरहाल, असंतुष्ट सदस्यों के अविष्वास प्रस्ताव पर न तो लखनऊ और न बस्ती के स्थानीय प्रशासन ने कोई निर्णय लिया। उसके बाद अचानक इस्तीफे की बात सामने आई। सभापति के अचानक इस्तीफे के बारे में कहा जाता है, कि यह निर्णय बहुत पहले ले लेना चाहिए था, कम से कम सभापति और इंडिएन रेडक्रास सोसायटी की इतनी बदनामी तो न होती। यह सही है, कि अगर डा. प्रमोद चौधरी इंडिएन रेडक्रास सोसायटी के सभापति न बने होते तो उनके और उनके हास्पिटल के खिलाफ इतना आरोप न लगता और न एफआईआर ही दर्ज होता। मीडिया बार-बार कह रही थी, कि जिस तरह की राजनीति हो रही है, उसका खामियाजा एक न एक दिन सभापति को अवष्य भुगतना पड़ेगा, और वही हुआ, जिसका अंदेशा था। फायदा उठाने वालों ने तो खूब उठाया और दर्द झेलने के लिए सभापति को छोड़ दिया।
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