बवाल से बचने को डाक्टर्स मरीजों को कर रहें रेफर

-रेफर होने से अधिकांश मरीजों की मौत या तो अयोध्या या फिर बाराबंकी पहुंचने से पहले हो जाती

-तमाम ऐसी बीमारियों हैं, जिन्हें फर्स्ट एड के जरिए गंभीर होने से डाक्टर्स रोक सकते, लेकिन आरोपों से बचने के लिए रेफर करना ही बेहतर समझते, इलाज करना तो दूर की बात प्राथमिक उपचार देने से भी बच रहें

-डाक्टर्स का तो 500 फीस का ही नुकसान हुआ, लेकिन परिजन का तो बेटा, बेटी, माता और पिता का नुकसान हो सकता

-आरोपों से बचने के लिए अधिकांश डाक्टर्स गंभीर किस्म के मरीजों का इलाज और भर्ती करने से परहेज कर रहें, जिसका खामियाजा मरीज और उनके परिजन को भुगतना पड़ रहा

-लखनऊ में मरीजों की हुई मौत पर परिजन हायतोबा नहीं करते, लेकिन अपने शहर में हुई मौत पर बवाल अवष्य मचाते

-मरीजों को डाक्टर्स पर और डाक्टर्स को मरीजों पर विष्वास करना ही होगा, 80 फीस डाक्टर्स गलत हो सकते हैं, लेकिन उन 20 फीसद सही डाक्टर्स का क्या कसूर जो गेहूं के साथ घुन की तरह पिस रहे

-अगर मरीजों और डाक्टरों के बीच बदलाव नहीं आया तो आने वाले दिनों में सबसे अधिक इसका खामियाजा मरीज और परिजन को ही भुगतना पड़ेगा

-अधिकांश डाक्टर्स का मरीजों और उनके परिजनों को संतुष्ट न कर पाना और मरीजों के प्रति अधिकांश डाक्टर्स का व्यवहार अच्छा न होना डाक्टर्स और मरीजों के बीच कड़ुवाहट पैदा हो रहा

-लाइफ लाइन मेडिकल सेंटर के यहां जिस वैशाली नामक महिला की मृत्यु हुई, उसके पति दिनेश कन्नौजिया ने लिखित में कहा कि डा. अल्का शुक्ला के अनुचित व्यवहार से उनका परिवार बहुत दुखी, जो कि शिकायत करने का एक कारण बना

बस्ती। हाल के दिनों में जिस तरह मरीजों के मौत को लेकर डाक्टरों की कार्यशेली पर सवाल उठ रहे हैं, और जिसके लिए उन्हें सवालोें के कटघरें में खड़ा होना पड़ रहा है, लापरवाही के आरोप लग रहें हैं, बवाल मचाए जा रहे हैं, शिकायतें हो रही है, जांचें हो रही हैं। उसे देखते हुए अधिकांश डाक्टरों ने बवाल और आरोपों से बचने के लिए गंभीर किस्म के मरीजों को रेफर कर देने में ही अपनी भलाई समझ रहें है। जिसके चलते किसी की मौत अयोध्या तो किसी की बारांबकी पहुंचने से पहले ही हो जा रही हैं, किस्मत वाले मरीज ही लखनऊ पहुंच पाते है। आरोपों से अधिकांश डाक्टर्स इतने दुखी और व्यथित हैं, कि वह इलाज और भर्ती करना तो दूर की बात फर्स्ट एड तक देने से बच रहें है। देखा जाए तो रेफर करने वाले डाक्टर्स का तो 500 फीस का ही नुकसान हुआ, लेकिन परिजन को तो बेटा, बेटी, माता और पिता का नुकसान उठाना पड़ रहा है। यह सही है, कि आरोपों से बचने के लिए अधिकांश डाक्टर्स गंभीर किस्म के मरीजों का इलाज और भर्ती करने से परहेज कर रहें, और जिसका खामियाजा मरीज और उनके परिजन को भुगतना पड़ रहा है। जब भी किसी मरीज की मौत इलाज के दौरान लखनऊ में होती है, तो परिजन वहां हायतोबा नहीं मचाते, लेकिन जब वही मौत अपने शहर में होती हैं, तो बवाल मचाने लगते है। धरना-प्रदर्शन और मीडियाबाजी तक करने लगते हैं, जांच और कार्रवाई करने के लिए प्रशासन और सीएमओ पर दबाव बनाने लगते है। उसके बाद डाक्टर्स को कभी पुलिस वाले तो कभी मीडिया वाले तो कभी सीएमओ कार्यालय शोषण करने लगते है। इतना होहल्ला मचाते हैं, कि डाक्टर्स की नींद हराम हो जाती है। आवास से निकलना और समाज में उठना बैठना मुस्किल हो जाता है। इसी लिए कहा जाता है, कि मरीजों को डाक्टर्स पर और डाक्टर्स को मरीजों पर विष्वास करना ही होगा, इसमें सबसे अधिक विष्वास डाक्टर्स को मरीजों को यह दिलाना होगा कि कोई भी डाक्टर्स जानबूझकर मरीज के मौत का कारण नहीं बनना चाहता। जिस दिन डाक्टर्स अपने मरीजों को यह समझाने में सफल हुए उसी दिन से विरोध करना बंद हो जाएगा। भले ही चाहें 80 फीस डाक्टर्स को मरीज गलत मान रहें हैं, लेकिन उन 20 फीसद सही डाक्टर्स का क्या कसूर जो गेहूं के साथ घुन की तरह पिस रहें है। ऊनपर भी अगुंली उठ रही है। उन्हें भी अन्य की तरह चोर की निगाह से देखा जाता है। अगर मरीजों और डाक्टरों के बीच बदलाव नहीं आया तो आने वाले दिनों में सबसे अधिक इसका खामियाजा मरीज और परिजन को ही भुगतना पड़ेगा। एक दो मरीज के चले जाने से डाक्टर्स की कमाई पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा, लेकिन मरीज के परिजन पर अवष्य पड़ सकता। अधिकांश डाक्टर्स का मरीजों और उनके परिजन को संतुष्ट न कर पाना और मरीजों के प्रति अधिकांश डाक्टर्स का व्यवहार अच्छा न होना डाक्टर्स और मरीजों के बीच कड़ुवाहट पैदा होने का कारण माना जा रहा है। लाइफ लाइन मेडिकल सेंटर के लोगों पर जिस तरह वैशाली की मृत्यु का कारण डा. अल्का शुक्ला पर उसके पति दिनेश कन्नौेजिया ने लिखित में ख्रीरब व्यवहार का आरोप लगाते हुए कहा कि डा. अल्का शुक्ला का मरीज और परिजन के प्रति जो व्यवहार था, उससे उनका परिवार बहुत दुखी हुआ, जो कि शिकायत करने का एक कारण बना। यानि अगर डा. शुक्ला का व्यवहार मरीज और उनके परिजन के प्रति अच्छा होता तो शायद इतनी लिखा पढ़ी न होती। वैसे भी डा. अल्का शुक्ला का व्यवहार मरीजों के प्रति बहुत अच्छा नहीं रहा, जिसके चलते कई डाक्टर्स उनके पास मरीजों को रेफर नहीं करते। व्यवहार को देखते हुए एक डाक्टर्स ने कहा कि हम तो डा. शशि के पास मरीज भेजना अधिक पसंद करते हैं, क्यों कि उनका मरीजों के प्रति जो व्यवहार है, वह अन्य बहुत कम डाक्टर्स में पाया जाता है। कहते भी है, कि व्यवहार हो तो डा. शषि जैसा, न कि डा. अल्का शुक्ला जैसा। यह भी कहा कि महिला अस्पताल की एक महिला डाक्टर का बेटा मर गया, खराब व्यवहार के चलते कोई बेटे को कंधा देने को तैयार नहीं था, कुल नौ लोग ही अयोध्या गए। इस महिला डाक्टर्स ने पैसा तो बहुत कमाया, लेकिन इज्जत नहीं कमाया और जिसने इज्जत नहीें कमाया, उसने कुछ नहीं कमाया। डाक्टर्स को खासतौर पर महिला डाक्टर्स को अपने मरीजों के साथ परिवार के सदस्य जैसा मानकर उनके साथ व्यवहार करना चाहिए। जिले में आधा दर्जन से अधिक ऐसे डाक्टर्स होगें जिनके पास इतनी दौलत हैं, कि उन्हें खुद नही मालूम होगा कि उनकी चल और अचल संपत्ति कहां-कहां और किसके-किसके नाम होगी। एक डाक्टर्स के बारे में तो कहा जाता है, कि उनके पास एक हजार करोड़ से अधिक की अचल संपत्ति है। फिर भी इन्होंने मेलकाम जैसी अधोमानक दवा बनाने वाली कंपनी के साथ कंपनी का दवा लिखने के लिए दस करोड़ का एग्रीमेंट कर लिया। सवाल उठ रहा है, कि आखिर एक डाक्टर्स परिवार को कितना धन चाहिए, कि वह चोरी बेईमानी न करें। डाक्टर्स को वही काम करना चाहिए, जिसकी उसके पास डिग्री है, नहीं तो इनमें और छोला छाप डाक्टर्स में कोई फर्क नहीं रह जाएगा।