बस्ती। जिन सवालों को आज के नेताओं को संसद में उठाना चाहिए, वह सवाल ‘कौटिल्य फाउंडेशन भारत अध्यक्ष/प्रधान न्यासी राजेंद्रनाथ तिवारी’ को उठाना पड़ रहा है। अगर यह सवाल संसद में उठ जाता तो आज देश में एक देश एक शिक्षा पद्धति लागू होता। फिर कोई यह सवाल नहीं करता कि एक ही देश के दो बच्चों की शिक्षा केवल इस लिए भिन्न-भिन्न हैं, क्यों कि उनके बोर्ड या विधालय अलग-अलग है? सवाल उठ रहे हैं, कि क्या यह देश की प्रतिभा के साथ अन्नाय नहीं? कि हम उन्हें समान अवसर क्यों नहीं दे पा रहे हैं?
क्रेद्रीय शिक्षा मंत्री को लिखे पत्र में श्रीतिवारीजी ने कहा कि भारत केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि जीवंत सभ्यता है, जिसकी आत्मा उसकी शिक्षा में बसती है। अगर शिक्षा बिखरी हुई है, तो राष्ट का भविष्य भी बिखरा हुआ होता है। आज यही पीड़ा देश का हर सजग नागरिक अनुभव कर रहा है, कि हमारे यहां शिक्षा एक पता के अभाव में दिशाहीनता की ओर अग्रसर है। लिखा कि देश में एक ओर सीबीएसई का नाम हैं, तो दूसरी ओर उसी के भीतर अलग-अलग निजी प्रकाशनों की मंहगी, असगंत और कभी-कभी अनावष्यक रुप से बोझिल पुस्तकों का जाल फैला हुआ है। यह शिक्षा नहीं एक प्रकार का शेक्षणिक व्यापार बन चुका है। जिसमें ज्ञान पीछे छूट गया और लाभ आगे निकल गया। गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए यह स्थित एक मौन अन्याय से कम नहीं।
लिखा कि समय की पुकार है, एक राष्ट, एक शिक्षा पद्धति, एक समान पाठ्यक्रम यह केवल एक नीतिगत सुधार नहीं, बल्कि राष्ट के बौद्धिक पुर्नजागरण का आधार बन सकता है। निजी प्रकाषनों की मंहगी पुस्तकों पर नियंत्रण कर केवल मानक, सस्ती और प्रमाणित पुस्तकों को अनिवार्य किया जाए। जिससे शिक्षा का बोझ आर्थिक नहीं, बौद्धिक बने। शिक्षा को व्यापार से मुक्त कर राष्टनिर्माण का माध्यम बनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़िया सशक्त, जागरुक और राष्टनिष्ठ बन सके। लिखा कि इतिहास बार-बार अवसर नहीं देता। आज जब भारत विष्वपटल पर अपने स्वर्णिम युग की ओर अग्रार है, तब एक समान शिक्षा प्रणाली लागू करना केवल एक सुधार नहीं बल्कि राष्ट की दिशा तय करने करने वाला निर्णय है। लिखा कि यदि यह साहसिक कदम आज नहीं उठाया गया, तो आने वाली पीढ़िया अवष्य पूछेंगी कि जब अवसर था, तब क्यों नहीं हुआ? यह वह क्षण है, जब नीति नहीं, दृष्टि की आवष्यकता है, निर्णय नहीं, नेतृत्व की आवष्यकता है। लिखा कि मैं ही नहीं पूरा देष चाहता है, कि इस एतिहासिक दायित्व का निवर्हन करते हुए भारत को एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था प्रदान करेगें, जो समानता, गुणवत्ता और राष्टभावना की सषक्त आधारशिला बने।
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