बस्ती। अगर ब्राहृमण महासभा के अध्यक्ष पिछले 15 सालों से सवालों से बचते आ रहे हैं, तो सवाल तो अध्यक्ष पर उठेगा ही। तभी तो आशीष त्रिपाठी ने लिखा कि अध्यक्षजी के कार्यकाल में ही ब्राहृमण महासभा की ऐसी दुर्दशा हुई हैं। इन्होंने अपनी जिम्मेदारी को सही तरीके से नहीं निभाया, अगर निभाया होता तो भ्रष्टाचार नहीं होता, और न ब्राहृमण महासभा के लोग सवाल ही उठाते, जो अध्यक्ष अपने ही महामंत्री के गलत कार्यो पर रोक नहीं लगा सके, उस अध्यक्ष से और क्या उम्मीद की जा सकती है? अगर इनके 15 साल के कार्यकाल पर पहली बार आडिट हो रहा है, तो सवाल तो इनके कार्यशेली पर भी उठेगा। सवाल उठ रहा है, कि आज क्यों सबकी निगाहें अध्यक्ष के निर्णय पर टिकी हुई हैं? अगर अध्यक्षजी सदस्यों की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे तो इनके खिलाफ भी आवाज उठने लगेगी। जिस महामंत्री ने अध्यक्ष को निकालने की साजिश रची, उसी को अगर पुनः महामंत्री बना देगें, तो वह भ्रष्टाचार करेगा ही। इसी लिए कहा जा रहा है, कि इज्जत ब्राहृमण महासभा की नहीं बल्कि अध्यक्ष की दांव पर लगी हुई है। जिस तरह महामंत्री को पालापोसा गया और उन्हें बार-बार भ्रष्टाचार करने का मौका दिया गया, उसे किसी भी दषा में अनुशासन नहीं माना जा सकता हैं, जो संस्था अपने बाईलाज के अनुसार संचालित नहीं होती, उस संस्था में अनियमितता होना लाजिमी है। बार-बार समाज में यह सवाल उठ रहा है, कि आखिर एक व्यक्ति पर इतना विष्वास कैसे किया गया? जब कि वह व्यक्ति अपना विष्वास खो चुका। हर साल आडिट न कराना बड़ी साजिश की ओर ईशारा करता है। सवाल उठ रहा है, कि आडिट कराना क्या अध्यक्ष की जिम्मेदारी नहीं बनती? इतनी बड़ी संस्था को एक व्यक्ति के हाथ में सौंप देना कोई दूरदर्षिता का परिचय नहीं है। क्या ब्राहृमण महासभा में महामंत्री षंभूनाथ मिश्र से अधिक कोई योग्य नहीं, अगर है, तो क्यों इन्हें पुनः महामंत्री बनाया गया? इसके पीछे बनाने वालों की क्या मंशा रही? आषीष त्रिपाठी लिखते हैं, कि अध्यक्षजी बहुत दिनों से ब्राहृमण महासभा पर नीतिगत मुद्वों वा सवाल उठते रहें, अध्यक्षजी को नशीहत देते हुए कहते हैं, कि ब्राहृमण महासभा के हित और सम्मान की रक्षा के लिए उचित अनुशासनात्मक निर्णय लेकर अपने अध्यक्षता के अधिकारों का मान रखिए। अन्यथा कुछ लोगों की अनुशासनहीनता और गैर जिम्मेदाराना रर्वैए और जबावदेही से आप बच नहीं सकते, क्यों कि आपके ही कार्यकाल में ब्राहृमण महासभा की ऐसी दुर्दशा हुई है, और पहले से चले आ रहे, तमाम अनैतिक कार्यो पर रोक लगाना एक अध्यक्ष होने के नाते आपका प्रथम दायित्व है। पिछले कई सालों से जिस तरह ब्राहृमण महासभा के मान और सम्मान की दुहाई दी जा रही है, वह मान और सम्मान तो बचा नहीं, फिर क्यों लोग इस संस्था पर विष्वास करें? जिन लोगों के जिम्मे मान और सम्मान बचाने की जिम्मेदारी थी, उन पर मौन रहने का आरोप लग रहा है। title in english
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