बस्ती। तष्करों के कब्जे से 320 किलो गांजा पकड़ने वाले एमपी राज्य के छिंदवाड़ा पुलिस को दिए गए बयान में तहसील हर्रैया के एक तष्कर ने बताया कि वह विधायक का भतीजा है, किस विधायक का भतीजा हैं, उसके नाम का खुलासा छिंदवाड़ा पुलिस ने नहीं किया, बरामउ कार पर यूपी विधानसभा का ‘एमएलए 602’ पार्किंगं पास और अधिवक्ता का स्टीेकर भी चस्पा हुआ मिला। इतनी बड़ी मात्रा में गांजे के साथ जिन सात लोगों को पुलिस ने कार, कंटेनर, पिस्टल और 24 हजार नकद बरामद किया, उसमें चार बस्ती के हैं, जिनमें पैकोलिया के भैरोपुर निवासी षुभम सिंह, भाजपा की सभासद मनीषा के देवर एवं गांजा तष्कर दुर्गेश सोनकर का भाई कृष्ण कुमार, अटवापुर अवधी हर्रैया का आदर्श का नाम षामिल है।
हर्रैया तहसील खासतौर पर हर्रैया थाना क्षेत्र बनता नहीं बल्कि गांजा और स्मैक तष्करों का हब बन गया है। अब तो इस क्षेत्र के गांजा तष्करों की गिरफतारी दूसरे प्रांत की पुलिस कर रही है। पहले गांजे का खेप अंबेडकरनगर जाता था, गांजा तष्कर कभी एनएच का इस्तेमाल नहीं करते, क्यों कि इन लोगों को अच्छी तरह मालूम रहता है, कि एनएच पर पुलिस की चहल पहल अधिक रहती हैं, पुलिस का पिकेट भी रहता, एनएचएआई के वाहनों की गतिविधियां भी रहती है। इस लिए यह लोग ओडीआर की सड़कों का इस्तेमाल करते हैं, ओडीआर की सड़क पर ही छिंदवाड़ा की पुलिस ने दो दिन पहले 320 किलो गांजा बरामद किया। बीच-बीच का रास्ता पकड़ते हैं, एनएच पर चलने के लिए एवाईड करते है। अब यहां सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि जिले की पुलिस क्यों 40-50 किलो गांजा पकड़कर बैठ जाती है? क्यों नहीं क्ंिवटल में बरामद करती? कहा भी जाता है, कि जब दूसरे प्रांत के जिले की पुलिस बस्ती के तष्करों को इतनी बड़ी मात्रा में गांजा पकड़ सकती है, तो जिले की पुलिस क्यों नहीं? जब कि पुलिस को अच्छी तरह मालूम हैं, कि हर्रैया गांजा और स्मैक का हब बन गया है। सबसे बड़ा सवाल पुलिस और उसके खुफिया तंत्र पर उठ रहे हैं, कहा जा रहा है, कि पुलिस और एलआईयू कौन सी ऐसी निगरानी कर रही है, कि 25 साल के भैरोपुर के षुभम सिंह के पास इतना पैसा कहां से आया कि उनके बेड़ें पर एक करोड़ से अधिक की कई लक्जरी वाहन है, कहां से दस हजार का जूता और पांच हजार का चप्पल पहनते हैं? कहां से पांच हजार की टीषर्ट और गले में लाखों रुपये का सोने का चैन लटकाए रहते हैं? कहां से यह गांव में करोड़ों रुपये का आलीषान मकान बनवा रहे हैं? जबकि बताया जाता है, कि इनके पास कोई वैध कारोबार भी नहीं है। अब सवाल उठ रहा है, कि इस मामले में क्यों जिले की खुफिया तंत्र फेल नजर आ रही है? अगर खुफिया तंत्र मजबूत होता तो रवि गुप्ता और दीपक चौहान कभी सभासद मनोनीत नहीं हो पाते, और न गांजा और स्मैक तष्करी के चलते दौलतमंद बन पातें। शुभम सिंह को आसमान छूते देख गांव और अन्य नवयुवक इन्हीं के रास्ते पर चलकर दस हजार का जूता पहनने का सपना देख रहें हैं, कई लोग तो रास्तें पर चल भी पड़े है। अगर ऐसे लोगों की जानकारी पुलिस के पास नहीं तो इससे पता चलता है, कि पुलिस अपना काम ईमानदारी से नहीं कर रही है। नया नाम बीट पुलिस आफिसर कहां हैं, क्या इन्होंने भी गांजा तष्करों से हाथ मिला लिया है। अगर किसी बीट आफिसर के क्षेत्र में किसी के पास अचानक दौलत आ जाता है, तो उसकी रिपोर्ट क्यों नहीं उच्चाधिकारियों को की जाती? क्यों इस तरह के मामलों में खुफिया काम नहीं करती?
अधिवक्ता नरेंद्र बहादुर सिंह कहते हैं, कि भाई अब नेतागिरी भी व्यवसाय हो गया हैं, कोई वेतन या मानदेय तो मिल नहीं रहा है, इसी नेतागिरी से सामाजिक प्रतिष्ठा भसी बढ़ाना है, चार पहिया भी मेंटेन करना है, अपना विकास तो करना ही है, तो गांजा, अफीम और स्मैक तो अेचना ही है। इसी कारण से सफेइपोष अपराध यहां तक कि सेक्सुअल बफेंस दिन रात फज फूल रहा है। अब राजनीतिश्र, नौकरशाही, कर्मचारी से ईमानदारी की कल्पना परी लोक की कहानी हो गई है। विजय शंकर त्रिपाठी लिखते हैं, कि नशा उन्मूलन अभियान चलाया जा रहा है। योगेंद्र षाही लिखते हैं, कि हुड़वा कुंवर वाले बाबू साहब का कुछ नहीं होगा, क्यों कि उनके आका उपर है। अनिल तिवारी लिखते हैं, कि हुड़वा कुवंर वाले बाबू साहब की जय हो, और उनके आका की जय हो, और उनके चेलों की जय हो, और भाजपा की जय हो और भाजपा के अध्यक्ष नितिन नवीन की जय हो।
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