बस्ती। कोई बाबू यह न समझे कि वह साहब को कमाकर दे रहा है, तो वह सुरक्षित है, और जब तक साहब हैं, उनकी ओर कोई आंख उठाकर भी नहीं देख सकता। अगर किसी बाबू ने यह ख्याली पुलाव बना रखा हैं, तो उसे फिर से अपने साहब के बारे में विचार करना होगा, और जिस बाबू ने अपने साहब की समीक्षा नहीं की, तो समझो उसका भी वही हाल होगा, जो सीएमओ कार्यालय के बाबू प्रेम बहादुर सिंह के साथ हुआ। इस बाबू ने सपने में भी नहीं सोचा होगा, कि जिस साहब को उसने गलत तरीके से लाखों कमवाया, वही सीएमओ दूध में मक्खी की तरह निकाल फेकेगें। जब भी कोई साहब फंसता हुआ देखते हैं, तो वह सबसे पहले उस बाबू को बलि का बकरा बनाते हैं, जिसने लाखों कमवाया। यह तो साहबों का पुराना हथियार है। इसी हथियार का इस्तेमाल सीएमओ डा. राजीव निगम ने बाबू प्रेम बहादुर सिंह पर इस्तेमाल किया। यह जाने हुए कि दीवानचंद्र पटेल और रवीेंद्र सिंह को लगभग एक करोड़ का सिविल का, मां काली को विधुत का डेढ़ करोड़, गोरखपुर वाले बाबा को प्रिंटिगं का लगभग ढ़ाई करोड़ का फर्जी कार्य आर्डर और भुगतान सीएमओ ने किया, लेकिन उसके बाद भी सीएमओ ने प्रेम बहादुर सिंह को प्रेम पत्र थमाते हुए पूछा कि पत्रावली कैसे गायब हो गई, और क्यों नहीं विजिलेंस के एसपी को मांगने के बावजूद पत्रावली दी गई। प्रेम पत्र पढ़कर प्रेम बहादुर सिंह का परेशान होना लाजिमी है। इधर जब से शिकायतकर्त्ता एमएलसी प्रतिनिधि हरीश सिंह ने एसपी विजिलेंस को पत्र लिखकर पत्रावली गायब करने वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने को लिखा, तब से सीएमओ साहब और भी सतर्क हो गए। मीडिया पहले ही यह बता चुकी है, कि अगर सीएमओ अपने आपको फंसता देखेगें तो उसका ठीकरा प्रेम बहादुर सिंह पर फोड़ेगें। वही हुआ, जिसकी आशंका व्यक्त की जा रही थी, हो सकता है, कि सीएमओ के इस प्रेम पत्र से उनका कुछ बचाव हो जाए। बता दें, िकइस फर्जीवाड़ा में सीएमओ के साथ चीफ फार्मासिस्ट अजय मिश्र, एनएचआरएम के संदीप राय और सीएमओ कार्यालय के बाबू प्रेम बहादुर सिंह ने मिलकर लगभग नौ करोड़ का फर्जीवाड़ा किया। इसमें लगभग 25 फीसद का काम हुआ, और लगभग 75 फीसद बंदरबांट हुआ। वैसे इसकी जांच मां लक्ष्मी की शिकायत पर सीडीओ और सीटीओ दोनों मिलकर कर रहे हैं, लेकिन अभी तक जांच को पूरा नहीं किया गया, इस लिए नहीं किया गया, क्यों कि फर्जी भुगतान में सीटीओ भी फंस रहे है। इस फर्जीवाड़े में शामिल सभी लोगों के खिलाफ आज नहीं तो कल कार्रवाई होनी ही है। कोई नहीं बच पाएगा। षिकायतकर्त्ता भी चाहे तो किसी को नहीं बचा सकते। मामला अगर सीडीओ और सीटीओ तक रहता तो मैनेज हो सकता था, लेकिन मामला विजिलेंस के पास है, इस लिए मैनेज नहीं हो सकता, देर हो सकता है, लंबित रखा जा सकता है, लेकिन पूरी तरह इसे समाप्त नहीं किया जा सकता।
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