बस्ती। कौन कहता है, कि योगी बाबा के रहते कोई भ्रष्टाचार नहीं कर सकता, जो यह कहतें है, कि जीरो टालरेंस नीति सफल हैं, तो वह गलत कहते है। क्यों कि अगर जीरो टालरेंस नीति सफल होती जो उनकेे ही अधिकारी, मेडिकल कालेज लखनउ के द्वारा ब्लैक लिस्टेड किए गए प्राइवेट फर्म पीओ सिटी को रिजेंट खरीद का पांच सौ करोड़ का बिना टेंडर के दर अनुबंध नहीं करते। भारत सरकार की गाइड लाइन को दरकिनार करके लिए तरह प्रदेश भर के सरकारी अस्पतालों में ‘क्लोज सिस्टम’ लैब की मशीने सप्लाई की गई, ताकि अस्पतालें पीओ सिटी से रिजेंट खरीद सके। अगर भारत सरकार के गाईड लाइन को फालो किया गया होता तो ‘ओपेन सिस्टम’ की मशीने सप्लाई की जाती, तब अस्पतालें किसी भी फर्म से रिजेंट खरीद कर सकती थी, लेकिन ब्लैक लिस्टेड फर्म को सैकड़ों करोड़ का लाभ पहुंचाने के लिए डिप्टी सीएम तक को मैनेज हो गए। अब आप सोच सकते हैं, कि जब डिप्टी सीएम मैनेज हो सकते हैं, तो अगर डीएम और सीएमओ मैनेज हो गए तो क्या गलत हुआ? जिस राज्य के डिप्टी सीएम पर भ्रष्टाचार का आरोप लगे, उस राज्य को और भाजपा दोनों को तो बर्बाद होना ही है। सवाल तो योगीबाबा पर भी उठ रहे हैं, और पूछा जा रहा है, कि क्या आपने अपने डिप्टी सीएम को जीरो टालरेंस नीति का उल्लघंन करने की इजाजत दी है? अगर नहीं दी है, तो क्यों नहीं अब तक अनुबंध को निरस्त किया गया? और नहीं अनुबंध करने वाले अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की गई? सच तो यह है, कि सिर्फ स्वास्थ्य विभाग ही नहीं हर विभाग में जीरो टालरेंस नीति की धज्जियां उड़ाई जा रही है, और योगीबाबा तमाषबीन बने बैठे है। प्रदेष भ्रष्टाचार की आग में जल रहा है, लेकिन योगीबाबा पर कोई फर्क नहीं पड़ता, इनका खुद का गृह जनपद भ्रष्टाचार की चपेट में हैं, फिर भी इन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा।
बड़ा सवाल उठ रहा है, कि जब पीओ सिटी रिेंजेट का निर्माण ही नहीं करती तो कैसे उनसे हर साल लगभग पांच सौ करोड़ का रिजेंट खरीदा जा रहा है? इससे भी बड़ा सवाल यह उठ रहा है, कि मेडिकल कारपोरेषन के एमडी ने कैसे पांच साल के लिए पीओ सिटी से रिजेंट खरीद का अनुबंध गठित कर दिया, जब कि हर साल इसका टेंडर निकलने का प्राविधान है। इससे पता चलता है, कि इतने बड़े भ्रष्टाचार में नीचे से लेकर उपर तक के लोग षामिल है। अब आप ही लोग बताइए कि कहां हैं, योगीबाबा का जीरो टालरेंस नीति। ऐसा लगता है, कि योगीबाबा खुद जीरो टालरेंस नीति को भूल गए, अगर भूले नहीं होते तो इतना बड़ा घोटाला और वह भी खुले आम नहीं होता। पीओ सिटी के मालिक तो चोरी कर ही रहे हैं, इनके कर्मचारी भी अस्पतालों में रिजेंट की चोरी कर रहे है। अगर न करते तो सख्त मना करने के बाद भी सीएमएस अपने अस्पतालों में पीओ सिटी के कर्मचारियों से लैब का संचालन न करवाते। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि जब पीओ सिटी रिजेंट का निर्माण ही नहीं करती तो कैसे उनसे रिजेंट खरीदा जा रहा है? गाइड लाइन के अनुसार उसी कंपनी से रिजेंट खरीदा जाए, जिस कंपनी का लैब मशीन है।
0 Comment