बस्ती। जब तक ब्राहृमण महासभा मंदिर निर्माण में चंदे की कथित चोरी होती रही, तब तक कोई पदाधिकारी नहीं बोल रहा था, लेकिन जैसे ही चंदा चोरी का मामला मीडिया के जरिए लोगों को पता चला, मानो भूचाल आ गया हो, चोरी को उजागर करने वाले पत्रकार के खिलाफ मानहानि के आरोप में मुकदमा दर्ज करवाने की बाते उठने लगी, मुकदमा दर्ज कराने की बात कहने वाले महासभा के महामंत्री को शायद यह नहीं मालूम कि कोई भी पत्रकार मुकदमा और नोटिस से नहीं घबड़ाता, बल्कि उसे वह अपनी उपलब्धि मानता है। कहा भी जाता है, कि वह पत्रकार ही क्या जिसके खिलाफ खबरों को लेकर दो चार मुकदमा न दर्ज हो। इस लिए मिश्राजी मुकदमें की छोड़िए चंदे का हिसाब दीजिए। कहना गलत नहीं होगा कि आज जो ब्राहृमण महासभा की जो स्थित और इसके भीतर जो अंसतोश की भावना, उसके लिए महामंत्री को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। अध्यक्षजी मौनी बाबा बने रहने से न तो मंदिर का निर्माण होगा, और न ब्राहृमण महासभा उंचाईयों पर पहुंच सकता। तभी तो बैठक में विजय नरायन तिवारी ने राष्टीय अध्यक्ष सो सबके सामने कीा भी था, कि अध्यक्षजी कब तक मौनी बाबा बने रहेंगें। जितने आरोप अभी तक महामंत्री पर लगे हैं, अगर कोई और महामंत्री होता तो इस्तीफा दे देगा, लेकिन जो महामंत्री ब्राहृमण महासभा को अपनी जागीर समझे, वह कैसे इस्तीफ देगा? अनियमितता और असंतोश को देखते हुए अध्यक्षजी को भी इस्तीफ दे देना चाहिए था, बकौल सदस्य उर्जावान लोगों को पदाधिकारी की जिम्मेदासरी दी जाए। कहा भी जाता है, कि महामंत्री अगर इतने ही ईमानदार होते तो हर माह व्यय का ब्यौरा सार्वजनिक कर देते, लेकिन यहां पर 20 साल हो गए, आज तक व्यय का ब्यौरा न तो सदस्यों को दिया और न ही उसे सार्वजनिक ही किया गया। सदस्य कहते हैं, कि चंदा तो यह समाज के लोगों से लेते हैं, और चाहते हैं, कि समाज के लोगों को उनकी चोरी का पता न चले। जिस तरह सदस्यों और पदाधिकारियों के द्वारा पिछले कई दिनों से महामंत्री पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं, और ग्रुप में यह कहा जा रहा है, कि जब तक महासभा में शंभूनाथ मिश्र महामंत्री रहेगें, तब तक ब्राहृमण महासभा का न तो विकास हो सकता, और न मंदिर का निर्माण ही हो सकता है, अगर होना होता तो 20 साल में हो गया होता, ऐसा लगता है, कि मानो महामंत्री से लेकर कोशाध्यक्ष और राष्टीय अध्यक्ष तक नहीं चाहते कि मंदिर का निर्माण पूरा हो, अगर चाहते तो कब का पूरा हो गया होता। इसी लिए बार-बार नियमानुसार पदाधिकारियों का चुनाव करने की मांग पिछले 20 साल से उठ रही है, चुनाव न होना यह बताता है, कि महासभा को कुछ लोग अपने हिसाब से संचालित करना चाहते हैं, अगर ऐसा नहीं होता तो परिवारवाद न पनपता। एक दिन पहले हुई बैठक में मीडिया रिपोर्ट पर खूब चर्चा हुई, और कहा गया कि जो बातें अभी तक ब्राहृमण महासभा की चहार दीवारी में थी, वह सड़क पर आ गई, जिसके चलते महासभा की समाज में बहुत बदनामी हुई, इस पर महामंत्री ने चंदा चोरी को उजागर करने वाले पत्रकार के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दर्ज करने कहा गया। बैठक ने सभी लोगों ने राष्टीय अध्यक्ष अषोक कुमार शुक्ल पर तो विष्वास जताया, लेकिन महामंत्री षंभूनाथ मिश्र पर असंतोष जताया। इस बैठक में भी महामंत्री और कोशाध्यक्ष के द्वारा व्यय का हिसाब-किताब नहीं दिया गया। अध्यक्ष की ओर से कहा गया कि उन्हें एक दो सप्ताह का और मौका दे दीजिए। उन्होंने इसकी आडिट कराने की बात भी कही। यळ भी कहा कि किसी इंजीनियर 25000 स्क्वायर फिट में कितना ‘रा’ मैटेरिएल लगना चाहिए, उसका इस्टीमेट बनवा लिया, क्यों कि अब जितना ‘रा’ मैटेरिएल लगा, उतने में मंदिर का निर्माण पूरा हो जाना चाहिए था। कहा गया कि जब मंहदर निर्माण के लिए समाज से चंदा ले सकते हैं, तो फिर समाज को व्यय का ब्यौरा क्यों नहीं दे सकते? कहा गया कि समाज को सच्चाई जानने का पूरा हक हैं, जो छीना जा रहा है। अगर इसी तरह चलता रहा तो भविष्य में कोई चंदा भी नहीं देगा, आय और व्यय में पारदर्षिता लाने पर जोर दिया गया। महामंत्री की ओर से स्पष्ट किया गया कि चाहें जितना कोई गाली दें, उनके सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जिस इंसान पर गाली का कोई असपर न पड़े, उस इंसान के बारे में अच्छी तरह सोचा और समझा जा सकता है। कोशध्यक्ष शंभूनाथ षुक्ल की भूमिका को ही संदिग्ंध माना गया, और कहा गया, कि ऐसे कोशाध्यक्ष के हाने से क्या फायदा जब इन्हें कोश के बारे में कोई जानकारी न हो, कोश का तो सारा काम महामंत्री देखते है। सवाल उठा कि आखिर क्यों नहीं सदस्यों को संतुष्ट किया जा रहा है, क्यों इसे लेकर अंसतोश व्याप्त है। इसी पर संयुक्त मंत्री विजय बिहारी तिवारी ने अध्यक्षजी पर तंज कसते हुए कहा कि आखिर कब तक मौनी बाबा बले रहेगें। कहा गया कि अध्यक्ष की उदारता ही महासभा को खा ले रही है। इस पर अध्यक्षजी ने धैर्य रखने को कहा। कहा भी गया, एक पत्रकार को ब्राहृमण महासभा की चिंता है, लेकिन इसके पदाधिकारियों को नहीं।
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