बस्ती। जीजा और साले के नाम से ब्राहृमण महासभा में मशहूर शंभूनाथ मिश्र और सत्ते शुक्ल की सबसे बड़ी भूल यह मानी जा रही है, कि इन दोनों ने वर्तमान अध्यक्ष अशोक कुमार शुक्ल को पूर्व अध्यक्ष राममिलन शुक्ल की तरह समझने की गलती कर बैठे। जीजा और साले को शायद यह नहीं मालूूम कि नौकरी के दौरान अशोक कुमार षुक्ल ने बस्ती चीनी मिल के प्रबंधक को उन्हीं के चेंबर में इस लिए मारा था, क्योंकि वह अभिलेखों में लीपापोती कर रहे थे। इससे पहले भी कहा जा चुका है, और फिर कहा जा रहा है, कि भले ही लोग अध्यक्षजी को मौनी बाबा कहें, लेकिन अध्यक्षजी को जानने वाले कहते हैं, कि यह जो भी निर्णय लेते हैं, वह काफी प्रभावशाली होता है। यह ऐसा वार करते हैं, कि सामने वाले को संभलने और समझने का मौका ही नहीं मिलता। यह समस्या को जड़ से समाप्त करने में विष्वास करते है। काम करने में अधिक और बोलने में कम पर इन्हें यकीन है। कहा भी जाता है, कि जिस व्यक्ति ने रात-दिन एक करके ब्राहृमण महासभा को सींचा हो और सबसे अधिक 32 लाख का योगदान दिया हो, क्या वह व्यक्ति यूंही ब्राहृमण महासभा को चोरों के हाथों में जाने देगा? यह कभी नहीं चाहेंगें कि दूसरे की बदनामी का दाग इनके दामन पर लगे। चार की हुई बैठक के बाद लोेगों को अब यह एहसास होने लगा कि अध्यक्षजी चोरों को बख्सने वाले नहीं है। एफआईआर भी हो सकता है, जीजा और साले की बर्खास्तगी भी हो सकती है, और दोनों को बाहर का रास्ता दिखाया भी जा सकता है। इसकी झलक नौ अगस्त को होने वाली बैठक में लोगों को दिखाई भी दे सकता है। अध्यक्षजी यह भी कभी नहीं चाहेंगें कि कोई धरने पर बैठे, क्यों कि इन्हें अच्छी तरह मालूम हैं, कि धरने पर बैठने का मतलब सबकुछ समाप्त हो जाना होगा। जिस तरह अध्यक्षजी ने हिसाब-किसाब देने के तरीके पर नाराजगी और असहमति जताया है, उससे पता चलता है, कि हेराफेरी करने वालों के दिन अब लदने वाले है। हिसाब देखकर साफ पता चलता है, कि बड़े पैमाने पर लेन-देन में हेराफेरी हुई है। हेराफेरी को छिपाने के लिए ही पिछले 25 सालों से हिसाब नहीं दिया जा रहा था। जितना सीमेंट, ईंट, बालू मोरंग दान में आया, उतने में कब का मंदिर का निर्माण हो गया होता, अब सवाल उठ रहा है, कि जब 1200 बोरी सीमेंट और 75000 ईंट दान में आया तो फिर क्यों और किस लिए सीमेंट और ईंट खरीदा गया, 2019 में 78000 का ईंट और गिटटी खरीदी गई, फिर 2022 में 11.52 लाख रुपये का सीमेंट, मोरंग, सरिया और ठेकेदार को 31 दिसंबर 22 को भुगतान किया गया, नौ अप्रैल 18 को ठेकेदार रामकेष को 1.88 लाख का भुगतान हुआ, और फिर उसी दिन ठेकेदार को 1.40 लाख दिया गया, क्यों नहीं एक साथ 3.28 लाख दिया गया, सबसे बड़ी चोरी 2004 में बनकटी के सम्मेलन के नाम पर हुई, 3.22 लाख खर्च दिखाया गया, जब कि सारा खर्च स्व. केके दूबे ने अपने पास से किया। 2004 के बाद एक भी कार्यक्रम नहीं नहीं हुआ, क्यों नहीं हुआ? यह कोई बताने वाला नहीं है। चौकीदार के नाम पर 51500 खर्चा दिखाया गया, फिर भी पत्थर की चोरी हो गई। समरसेबुल के नाम पर दो बार पैसा खर्च किया गया, पहली बार 2018 में 76000 और दूसरी बार 2019 में अन्य सामान के साथ के 2.60 लाख खर्च दिखाया। पांच जनवरी 2002 से 14 जुलाई 26 तक चंदा के नाम पर कुल 82 लाख 96 हजार 928 रुपया मिला, और खर्चा 82 लाख 89 हजार 897 हुआ, खाते में मात्र 7031 रुपया अवषेष है। 7,8, 10 और 18 रुपया तक का खर्चा दिखाया गया, अगर यही पारर्दिशता लाखों के लेन-देन में होती तो कोई सवाल ही नहीं करता। जो आय मद दिखाया गया, उसमें आजीवन सदस्यता राशि, सहायतार्थ, षादी बुकिगं, स्कूल किराया, मूर्ति किराया, बैंक ब्याज आदि बताया गया, व्यय का जो मद बताया गया, उनमें कब्जा हटान, पपत्र व्यय, मिटटी पटान, बाउंडीवाल, पुराने मकान का मरम्मत, छत, दरवाजा, नालीदार चदर, सोक्तस, मिटिगं खर्च, मोठर चबूतरा, सहभोज कार्यक्रम, बिजली बिल, पंखा, फोन बिल, बिजली मरम्मत, घर रंग पोताई, बडढा सफाई, सीए खर्च, नल बनवाई, भूमि पूजन मंदिर, मिक्सर मशीन, रजिस्टेशन नवीनीकरण, परशुराम जयंती, मकर सक्रातिं एवं होली मिलन बताया गया।
- Loading weather...
- |
- Last Update 09 Aug, 10:57 AM
- |
- |
- खबरें हटके
- |
- ताज़ा खबर
- |
- क्राइम
- |
- वायरल विडिओ
- |
- वीडियो
- |
- + More
0 Comment