बस्ती। जो व्यक्ति मंदिर का चंदा चोरी कर सकता है, वह व्यक्ति कुछ भी कर सकता, वह पौराणिक भुजैनिया पोखरा पर कब्जाकर आलीशान मकान  बना सकता है, मंदिर का पत्थर चोरी कर/करवा सकता है, आरती के पैसे की चोरी कर/करवा सकता है, चुनाव के नाम पर पैसा ले सकता है, सालों से हिसाब-किताब नहीं दे सकता और जो ब्राहृमण महासभा को अपना जागीर समझता हो, उस व्यक्ति का पूरी तरह सामाजिक बहिष्कार कर देना चाहिए, एफआईआर और पद से बर्खास्त कर देना चाहिए, जैसा की कई लोगों ने कहा भी कि इस तरह के लोग न सिर्फ ब्राहृमण महासभा बल्कि पूरे समाज के लिए कंलक के समान होते है। जो लोग ऐसे लोगों का बचाव करने में लगे हैं, वह भी उतना ही गुनहगार हैं, जितना महामंत्री शंभूनाथ मिश्र। इनके आवास के आसपास और नगर पालिका के लोगों का कहना है, कि अगर मिश्राजी सबसे पहले भुजैनिया पोखरा पर कब्जा करके मकान का निर्माण न करवाते तो अन्य लोग कब्जा नहीें कर पातें, भुजैनिया पोखरा पर 1988 के आसपास सबसे पहले महांमत्री ने कब्जा किया, और उसके बाद कब्जा करने वालों की लाइन लग गई, देखते ही देखते वह पौराणिक भुजैनिया पोखरा जहां पर पचासों सालों से नागपंचमी के दिन षहर के बच्चें गुड़िया पीटते थे, उसका वजूद ही मिट गया, जिस तरह ब्राहृमण महासभा की बर्बादी के लिए इसके पदाधिकारी, शंभूनाथ मिश्र एंड टीम को कभी न माफ करने की बात कह रहे हैं, ठीक उसी तरह समाज इन्हें भुजैनिया पोखरा का अस्तित्व समाप्त करने के लिए कभी भी माफ नहीं करेगा। पालिका के लोगों का कहना है, कि अगर यह पोखरा पालिका या फिर राजस्व विभाग की परिसंपत्ति होती तो कोई कब्जा नहीं कर पाता, अगर करता भी उसे बेदखल करा दिया जाता, चूंकि पोखरा पिकौरा बक्स के शुक्लजी लोगों का है, इस लिए किसी ने कब्जा करने का विरोध नहीं किया। इसी का फायदा सबसे पहले मिश्राजी ने उठाया, हालांकि इनका जो आलीशान मकान बना हैं, उसका कुछ हिस्सा इन्होंने बैनामा करवाया, लेकिन अधिकांश हिस्से पर इन्होंने कब्जा कर रखा है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि जिस व्यक्ति की सोच 38 साल पहले कब्जा करने की रही हो, वह व्यक्ति कैसा हो सकता है? यही सोच लेकर जीजा और साले ब्राहृमण महासभा में आए, और वही किया जो 38 साल पहले किया था। जिस व्यक्ति की सोच 38 साल में भी नहीं बदल पाई वह अब क्या बदलेगी? मिश्राजी ने भले ही गलत तरीके से बहुत कुछ अर्जित कर लिया, लेकिन वह इज्जत और मान-सम्मान नहीं अर्जित कर पाए, जिसे एक ब्राहृमण अर्जित करता है। कहा भी जाता है, कि ब्राहृमण सबकुछ कर सकता है, लेकिन चोरी और बेईमानी नहीं कर सकता। खासतौर पर मंदिर का चंदा नहीं चोरी कर सकता है, और न पौराणिक पोखरा पर ही कब्जा कर सकता है। ब्राहृमण की पहचान समाज में आदरणीय के रुप में हैं, चोर और बेईमान के रुप में नहीं। बहरहाल, जिस व्यक्ति को यह गुमान हो जाए कि उसका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता, लेकिन अगर वह चाहे तो दूसरे का बहुत कुछ बिगाड़ सकता है। देखा जाए तो जीजा और साले के दिन लद गए, इन दोनों की उल्टी गिनती शुरु हो गई, हों सकता हैं, कि इनके भविष्य का फैसला नौ अगस्त को होने वाली बैठक में ही हो जाए, और उन लोगों की भी उल्टी गिनती शुरु हो गई, जो जीजा और साले के कालेकारनामें पर पर्दा डालने का प्रयास कर रहे हैं। जो लोग यह कह रहे हैं, कि चौके की बात चौके में ही रहे, चौकी तक न जाए, अगर यह लोग चाहते तो इतना बड़ा घोटाला मंदिर में न होता। आरती के पैसे की चोरी होने की बात उस समय उठी, जब पता चला कि कुछ साल पहले हर मंगलवार को आरती होती थी, निर्णय यह हुआ कि आरती में जो पैसा आए उसके लिए एक दानपात्र बनाया जाए, दानपात्र बना भी, लेकिन जब 8-9 माह बाद दानपात्र खोला गया, तो उसमें मात्र 89 रुपया मिला। अब जरा अंदाजा लगाइए कि लगभग 40 आरती में अगर 89 रुपया आता है, तो माना जा सकता है, कि आरती में भी चोरी हुई।