किराए पर सरकारी आवास चाहिए तो सदर ब्लॉक में खाली!

-19 में से 85 फीसद सरकारी आवास किराए पर चल रहे हैं, नौकरी और कहीं कर रहे हैं, लेकिन मकान किराए पा उठा रखा,

-बीडीओ साहब कहते फिर रहे हैं, जब मैं अपना आवास जिला विकास अधिकारी के कब्जे से खाली नहीं करवा पा रहा हूं तौ कैसे सचिवों से खाली करवाउंगा

-जिन सचिवों का कार्यालय पंचायत भवन में होना चाहिए, वह ब्लॉक के सरकारी आवास पर चला रहें

-कार्यालय होने से कालोनी की अनेक महिलाओं को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा, वह कड़ाके की ठंड में धूप लेने के लिए अपने आवास के बाहर भी नहीं बैठ सकती

बस्ती। आप को सुनने में अजीब लग रहा होगा, लेकिन यह सच हैं, कि अगर किसी किराएदार को सरकारी आवास जैसी सुविधा लेना है, तो वह सदर ब्लॉक चले आए आवास खाली हैं, बस आप को किसी ऐसे सचिव से संपर्क करना होगा, जिनका तबादला अन्य ब्लॉक में हो गया, लेकिन उन्होंने सरकारी आवास इस लिए खाली नहीं किया क्यों कि उन्हें अच्छी रकम पर किराए पर देना है। इनका जितना पैसा आवास भत्ता के रुप में कटता है, उसे कई गुना इन्हें किराए के रुप में मिल जाता है, कई लोगों ने सरकारी आवास को किराए पर लेकर  कार्यालय तक खोल रखा हैं, जबकि इनका कार्यालय पंचायत भवन में होना चाहिए। कार्यालय खुल जाने से सरकारी आवास में रहने वाले परिवार की महिलाओं को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा हैं, इस कड़ाकें की ठंड में वह अपने आवास के बाहर अगर धूप का आंनद लेना चाहती है, तो कार्यालय में भीड़ होने के कारण नहीं ले पा रही है। एक तरह से सदर ब्लॉक के आवासीय परिसर में बाहरी लोगों के कारण आराजकता का माहौल पैदा हो गया, कर्मियों की महिलाएं अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रही है। किराएदारी का यह खेल आज से नहीं बल्कि कई सालों से चल रहा है। शिकायत करने के बाद भी आज तक किसी बीडीओ ने नोटिस तक जारी नहीं किया, खाली कराने की तो दूर की बात है।

रही बात बीडीओ की तो वह खुद अपने आवास को जिला विकास अधिकारी से खाली करवा पा रहे हैं, इनके आवास पर डीडीओ साहब पिछले आठ-नौ माह से कब्जा कर रखा हैं, बीडीओ साहब अपना दर्द बयां करके ही रह जा रहे हैं, इनकी इतनी हिम्मत नहीं पड़ती कि वह डीडीओ से अपना आवास खाली करने के लिए कह सके। नेताओं से कहते रहते हैं, कि क्या करें डीडीओ साहब के चलते उन्हें डेली गोरखपुर से अपडाउन करना पड़ता है। कुछ लोग इसे बीडीओ साहब की चालाकी भी मान रहे हैं, ऐसे लोगों का कहना हैं, कि आवास ना होने का रोना रोकर यह कभी कार्यालय आते हैं, तो कभी नहीं आते। कहने का मतलब अगर बीडीओ साहब तो एक दिन में आवास खाली हो जाए, लेकिन यह चाहते ही नहीं कि आवास खाली हो जाए नहीं तो इन्हें ब्लॉक में ही रात्रि निवास करना पड़ेगा, फिर या परिवार के साथ में रहने का आंनद नहीं उठा पाएगे। अब सवाल यह उठ रहा है, कि जब बीडीओ साहब अपना ही आवास खाली नहीं करा पा रहे हैं, तो वह कैसे सचिवों से खाली करवाएगें? वैसे ही यह ब्लॉक हमेशा से चर्चा में रहा। लेकिन इस बार जिस कारण चर्चा में हैं, वह अन्य ब्लॉकों में नहीं होगा। आवास में रहने वाले ही गैर ब्लॉक में जा चके सचिवों के एलाटमेंट को निरस्त करने की मांग कर रहें है। कहा भी जाता है, कि जिस ब्लॉक का बीडीओ और प्रमुख कमजोर होता है, वह ब्लॉक कभी मजबूत हो ही नहीं सकता। जिस ब्लॉक के बीडीओ बंद कमरे में प्रधानों से मनरेगा के कच्चे और पक्के कार्यो की मंजूरी देने के नाम पर खुले आम बखरा लेते हो, उस ब्लॉक में तो अनियमितता होगी ही। मंडल मुख्यालय के इस महत्वपूर्ण ब्लॉक को किसी भी बीडीओ और प्रमुख ने माडल बनाने का प्रयास तक नहीं किया, सभी ने इसे लूट का केंद्र बनाया। इसके लिए काफी हद तक इस ब्लॉेक के नकली प्रधान संघ के अध्यक्ष को भी जिम्मेदार माना जा रहा है। नकली अध्यक्ष पर प्रधानों का खास होने के बजाए प्रमुख और बीडीओ का खास होने का आरोप इसी ब्लॉक के प्रधान लगा रहे है। इनपर प्रधानों के हित में कम और अपने हित में अधिक लगे रहने का आरोप लग रहा है। सवाल उठ रहा है, कि जब प्रधान संघ का अध्यक्ष ही नकली होगा तो उससे किसी असली काम करने की उम्मीद कैसे की जा सकती?