जब तक जेब में दस हजार नहीं आ जाता, तब तक कैंची नहीं उठाउंगा!
-जिला अस्पताल के आर्थो सर्जन डा, अनिल प्रजापति को जब मरीज के साथ आए विवेक ़ित्रपाठी ने ओटी में दस हजार दे दिया, तब खूनचुसवा डाक्टर ने कैंची उठाया, पहले 16 हजार मांगा
-इतना ही नहीं आपरेशन के बाद दो हजार यह कहकर और मांगा कि कम पड़ रहा है, एसआईसी को भी देना पड़ता
-जिला अस्पताल के दो बड़े डाक्टरों के कहने के बाद भी डा. अनिल प्रजापति ने जब दस हजार ले लिया, तब आपरेशन किया
-कुसमौर निवासी गरीब राम बृक्ष पुत्र विपत के घुटने का आपरेषन के लिए सौदेबाजी हुई, मरीज और पैसा देने वाले दोनों ने खुलकर कहा कि वह कहीं भी यह बयान देने को तैयार हैं, कि डाक्टर ने पैसा लिया
बस्ती। अभी तक मरीज प्राइवेट अस्पताल वाले डाक्टरों को ही खूनचुसवा कहते थे, लेकिन अब तो जिला अस्पताल के डाक्टर को भी खूनचुसवा कहने लगे। एक सरकारी अस्पताल का सर्जन अगर मरीज से ओटी में यह कहे कि जब तक दस हजार जेब में नहीं आता आपरेशन के लिए कैंची नहीं उठाउंगा। डा. अनिल प्रजापति ने मरीज से पहले इम्पलांट के नाम पर 16 हजार मांगा, लेकिन मरीज ने तब गरीबी का वास्ता दिया तो रहम खाकर छह हजार कम करते हुए कहा कि दस हजार से एक पैसा भी कम नहीं करुगंा। उसके बाद मरीज ने अपने मालिक विवेक त्रिपाठी को बुलाया और उनसे पैसे की बात कहीं, चूंकि आपरेशन होना आवष्यक था, इस लिए जिनके यहां मरीज राम बृक्ष पुत्र विपत ग्राम कुसमौर काम करता था, ने दस हजार ओटी में दिया, तब जाकर डाक्टर ने आरेशन किया। इतना ही नहीं आपरेषन के बाद जब पर्ची लेकर विवेक त्रिपाठी उर्फ विक्की डाक्टर के पास गए तो कहने लगे कि दो हजार और दीजिए कम पड़ रहा है, एसआईसी को भी देना रहता है। जिला अस्पताल के दो डाक्टरों के यह कहने के बावजूद कि हमारे जानने वालों में से पैसा मत लीजिएगा, उसके बाद भी डाक्टर अनिल प्रजापति ने कोई रहम नहीं किया। मीडिया इससे पहले भी अनेक बार जिला अस्पताल में आर्थो के सर्जरी के और इम्पलांट लगाने के नाम मरीज से पैसा लेने की बात का खुलासा कर चुकी है। शिकायत भी हुई, जांच भी हुई, लेकिन कार्रवाई इस लिए नहीं हुई क्यों कि जांच करने वाले भी चोर और आपरेषन करने वाले भी चोर, ऐसे में कार्रवाई और जांच हो तो कैसे? एक सरकारी डाक्टर ओटी में मरीज से खुले आम पैसा ले रहा हैं, और बाद में यहकर दो हजार और मांग रहा है, कि एसआईसी को भी देना पड़ता है। कितने शर्म की बात है। कहने का मतलब एक गरीब जब आयुषमान कार्ड लेकर प्राइवेट अस्पताल कें डाक्टर के पास आर्थो का सर्जरी कराने जाता है, तो वहां पर भी मरीज से इम्पलांट के नाम पर 20 हजार तक मांगा जाता है, जबकि आयुषमान में आपरेशन से लेकर दवा और रहने एवं भोजन तक की सारी सुविधा निःषुल्क है। वहीं पर जब गरीब मरीज जिला अस्पताल में सर्जरी कराने जाता है, तो उससे भी इम्पलांट के नाम पर 16 हजार मांगा जाता है। जबकि जिला अस्पताल में भी सब कुछ निःशुल्क है। सवाल उठ रहा हैं, कि ऐसे में गरीब मरीज जाए तो किसके पास जाए, सब खून चूसने के लिए लाइन लगाए खड़े है। जिस तरह सरकारी और गैर सरकारी अस्पतालों के डाक्टर पैसे के लिए गरीबों का खून चूसने में लगे हुए हैं, उससे डाक्टरी पेषा पर ही सवाल उठ रहे है। मरीज और पैसा देने वाले मरीज के मालिक दोनों का कहना है, िकवह दोनों किसी भी जगह यह बयान देने को तैयार हैं, कि डाक्टर ने पैसा लिया, और आपरेशन के लिए सौदेबाजी। इन लोगों का कहना है, कि यह लोग जानना चाहते हैं, कि क्या सरकारी अस्पताल में भी इम्पलांट के नाम पर पैसा लगता है। अगर लगता है, तो क्यों नहीं काउंटर पर जमा करवाया जाता। कहा भी जाता है, कि जिस अस्पताल का एसआईसी खुद बखरा लेता हो, उस अस्पताल के डाक्टरों ने अगर मरीजों का खून चूस लिया तो क्या गलत कियां? मरीज की निगाह में एसआईसी और डाक्टर दोनों चोर है। इनके साथ वही व्यवहार सरकार को करना चाहिए, जो एक चोर के साथ में किया जाता है। सरकारी अस्पतालों में लेनदेन को लेकर जो डाक्टरों और मरीजों के तीमारदारों के बीच में लड़ाई की घटनाएं होती है, वह यूंही नहीं होती। अधिकांष मरीज इस लिए चुप रहते हैं, क्यों कि उनके जीवन और मरण का सवाल रहता है। जिला अस्पताल के डाक्टर और एसआईसी इतने लालची होते जा रहे हैं, कि इन्हें अपने पेशे का भी ख्याल नहीं रहता। इसी लिए जब भी कभी डाक्टरों के साथ कोई घटना होती है, इन्हें जन समर्थन नहीं मिलता, हर कोई यही कहता है, कि मार खाया ठीक हुआ, यह लोग इसी के लायक ही है। सरकारी अस्पतालों के डाक्टरों और एसआईसी की देखा देखा अन्य स्टाफ भी मरीज से पहले सौदा करते है। ओटी में अगर कोई सरकारी डाक्टर सौदेबाजी करता है, तो यह अक्षम है।
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