बस्ती। वरिष्ठ भाजपा नेता जगदम्बा शुक्ल ने भ्रष्टाचार पर हमला बोलते हुए योगीजी से कहा कि एक दरोगा को जब एक लाख नहीं मिला तो उसने नार्मल फैक्चर को धारा 307 में बदलकर गरीब को जेल भेज दिया। कहा कि राजस्व और पुलिस विभाग मिलकर आपकी छवि खराब कर रहे है। देखा जाए तो भाजपा राज में भ्रष्टाचार से सबसे अधिक भाजपाई ही परेषान और पीड़ित है। इनकी समझ में नहीं आ रहा है, कि वह समाज में लोगों को क्या जबाव दें? उन लोगों से क्या कहें, जिनके कहने पर भाजपा को वोट दिया? क्या यह कहें, कि जब वह खुद पीड़ित हैं, तो आपकी कैसे मदद करें? हालत यह हो गई, कि आज भाजपाई खुद से सवाल कर रहे हैं, कि आखिर जिले और प्रदेश में हो क्या रहा है? क्या इसी दिन के हम लोगों ने सरकार बनाने में रात दिन एक किया था? आज जितने भी शिकायत शासन, प्रशासन और योगीजी को जा रहे हैं, उनमें अधिकांश भाजपाईयों का ही रहता है। कोई लिखता है, कि जिले की पुलिस और राजस्व कर्मी बेलगाम हो गए हैं, कोई लिखता है, कि जिले में भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच चुका हैं, कोई सवाल करता है, कि आखिर भ्रष्टाचारी अधिकारी और कर्मचारियों के खिलाफ आप कार्रवाई क्यों नहीं करतें? आखिर जनता कब तक भ्रष्टाचार का बोझ ढ़ोती रहेगी? परेषान होकर आज लोग एक दूसरे से पूछ रहे हैं, कि आखिर यह सब हो क्या रहा है? कहां हैं, ईमानदार योगी और इनके अधिकारी क्या कर रहे हैं? सच तो यह है, कि अब लोग परेशान होकर बहनजी को याद कर रहे हैं, एक पक्केे भाजपाई ने यहां तक कह दिया कि इस बार वह और उनका परिवार पहली बार भाजपा को छोड़कर बहनजी की पार्टी को वोट देगें, क्यों कि इस परिवेश में बहनजी ही एक मात्र ऐसी सीएम होगीं, जो भ्रष्टाचार और भ्रष्ट अधिकारियों पर लगाम लगा सके? अब जरा अंदाजा लगाइए कि एक तरफ भाजपा परम्परागत वोट को बचाने के लिए जोर आजमाईश कर रही है, वहीं दूसरी परम्परागत वोट बिखरता जा रहा है, और जनता इसके लिए सिर्फ और सिर्फ योगीजी के शासन को जिम्मेदार मान रही है। यह भी सवाल उठ रहा है, कि ऐसे में क्या भाजपा अध्यक्ष पंकज चौधरी परम्परागत वोट को सहेज पाएगें? हालत यह हो गई हैं, कि लोगों को लगता ही नहीं प्रदेश में भाजपा की सरकार भी है। कोई किसी की नहीं सुनकर उपर से लेकर नीचे तक सब अपनी ढ़पली और अपनी राग बजा रहे है। हर कोई यह जानकर सरकारी खजाना लूट हैं, कि पता नहीं कल क्या हो? भाजपा सरकार की छवि की किसी कोई परवाह नहीं, जिसको देखो वही लूटने में मस्त है। इन सबके बीच सबसे अधिक मलाई अधिकारी और कर्मचारी ही काट रहे है। अधिकारी किसी की सुन ही नहीं रहे हैं, और न कोई कार्रवाई ही कर रहे हैं। बखरा का प्रतिशत दिन प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा है। आम आदमी पिसकर रह जा रहा है। भाजपा कार्यकर्त्ता को समझ में ही नहीं आ रहा है, कि वह करें तो क्या करें? क्यों कि उन्हें कोई पूछने वाला नहीं, पुलिस उनकी नहीं सुन रही हैं, प्रषासनिक अधिकारी नहीं सुन रहे हैं, संगठन के लोग भी नहीं सुन रहे हैं। कार्यकत्ताओं के बीच इतनी लाचारी और मजबूरी इससे पहले नहीं देखी और सुनी गई, अगर यही हाल रहा तो नेताओं को चुनाव में दरी बिछाने वाला कोई कार्यकर्त्ता नहीं मिलेगा, जो खाटी कार्यकर्त्ता थे भी उन्हें संगठन के लोगों ने हरवाह, चरवाह, चालक, चपरासी और रसोईया के आगे तरजीह ही नहीं दिया। जिस भाजपा राज में संगठन के पदाधिकारियों की न सुनी जाती हो, उस राज में कार्यकर्त्ताओं की कितनी सुनी जा रही होगी, इसे आसानी समझा जा सकता है। जब भाजपा के लोग ही यह कहने लगे कि इस बार भाजपा नहीं, तो समझ लेना चाहिए कि 2027 भाजपा के लिए कितना कठिन होने वाला है। ऐसा लगता है, कि मानो भाजपा ने डैमेज कंटोल करना ही भूल गई। क्यों कि अधिकारियों की तरह भाजपाई भी बेलगाम होते जा रहे हैं, एक दूसरे पर कीचड़ उछाल रहे हैं। सबसे अधिक परीक्षा की घड़ी उन प्रत्याशियों की है, जो भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने की योजना बना रहे है। कहना गलत नहीं होगा कि अगर टिकट किसी तरह मिल भी गया तो जीतना मुस्किल होगा, यह हम नहीं बल्कि भाजपा के कार्यकर्त्ता और इनके नेता कह रहें हैं।