बस्ती। जिस तरह बहादुरपुर ब्लॉक मनरेगा में भ्रष्टाचार में नंबर वन बना, ठीक उसी तरह नगर पंचायत बभनान कमीषनबाजी में नंबर वन बन गया। निर्माण कार्यो में रिकार्ड 45-50 फीसद कमीशन चल रहा है। नवागत ईओ अजय कुमार पांडेय के लिए बभनान एक चुनौती की तरह होगा, देखने लायक यह होगा, कि यह कैसे अपने आप को जिले के सबसे अधिक कमीषन वाले नगर पंचायत में फिट कर पाते है? जाहिर सी बात हैं, अगर फिट नहीं बैठ पाए तो अधिक दिन तक नहीं रह पाएगें, क्यों कि किसी भी नगर पंचायत के चेयरमैन सबकुछ बर्दास्त कर सकते हैं, लेकिन कमीषन का कम होना, इन्हें बर्दास्त नहीं होता। यह लोग कभी भी नहीं चाहेगें कि गुणवत्तापरक निर्माण कार्य हो, क्यों कि जब ठेकेदार गुणवत्तापरक काम करेगा तो कमीशन कहां से देखा? यह एक ऐसा सच है, जिसे देखना होगा कि यह ठेकेदार कसे कैसे 22 रुपये में 100 रुपये का काम कराते है। दुनिया का कौन सा ऐसा महारथी ठेकेदार होगा, जिसे मिला तो 22 रुपया लेकिन काम किया सौ रुपये का। कमीशनबाजी में दूसरे नंबर पर कप्तानगंज आते हैं, यहां पर 40-45 फीसद, अगर कमीशनबाजी में बभनान नंबर वन है, तो हर्रैया सबसे कम, यहां पर 25 फीसद कमीशन से चेयरमैन साहब काम चला लेते है। चर्चित रुधौली, बनकटी और मुंडेरवा में 32-35 फीसद चल रहा है। सबसे खराब स्थित ईओ साहब लोगों की है, सबका कमीशन बढ़ जाता है, लेकिन ईओ लोगों का पांच फीसद ही रह गया। यह कोई सरकारी रेट नहीं हैं, बल्कि उन ठेकेदारों से ली गई रेट हैं, जो कमाते तो हैं, 10-20 फीसद लेकिन रिस्क 100 फीसद का रहता है, क्यों कि कार्रवाई के दायरे में सबसे पहले ठेकेदार ही आता है, एफआईआर से लेकर रिकवरी तक ठेकेदार से ही होती, मामला अगर गंभीर रहा तो ब्लैक लिस्टेड का भी दंष इन्हें झेलना पड़ता है। कमीशनबाजी का ही कमाल है, कि नाली और सड़क का निर्माण होते ही टूटने लगती है। अब हम आपको ठेकेदारों का दर्द बताते हैं, मान लीजिए, कि इन्हें बभनान में एक लाख का निर्माण कार्य का ठेका मिला, सबसे पहले 45 फीसद कार्यालय में वला गया, यानि एक लाख में से 45 हजार कमीशन के भेंट चढ़ गया, बचा 55 हजार, 18 फीसद जीएसटी, दो फीसद आईटी, एक फीसद लेबर सेस और दो फीसदी रायल्टी, इस तरह भुगतान होने से पहले ही कमीशन लेकर 68 हजार कट गया, अगर ठेकेदार का लाभांस कम से कम 10 फीसद जोड़ दिया जाए तो कुल 78 हजार खर्चा हुआ, और अगर कहीं ठेकेदार षासन से बजट लाता है, और अगर उसकी सेटिगं सीधे मंत्रीजी से हैं, तो तीन फीसद नहीं तो तीन से पांच फीसद षासन में देना पड़ता है। इस तरह पांच हजार और खर्चे में जुड़ गया, यानि एक लाख में से ठेकेदार का खर्चा 83 हजार आता है। बचा कितना 17 हजार। अब 17 हजार में क्या होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है। ऐसा भी नहीं कि ठेकेदार गेहूं बेचकर कमीशन दे रहा है, वह भी मुनाफा कमा रहा है। कहा जाता है, कि जब सारी गुणवत्ता जमीन के नीचे हैं, तो फिर ठेकेदार को ंिचंता करने की क्या आवष्यकता? ध्यान देने वाली बात यह है, कि यह आकड़ा सिर्फ बभनान नगर पंचायत की है। ऐसे में ठेकेदार चोरी नहीं करेगा तो क्या करेगा? चूंकि ठेकेदार इस लिए चोरी करता हैं, क्यों कि उसे अच्छी तरह मालूम रहता है, कि चाहें शिकायत पीएम तक कोई कर ले, न तो जांच होगी और न कोई कार्रवाई। इसी लिए बार-बार कहा जाता है, कि जिस संस्था की बागडोर जनप्रतिनिधियों के हाथों में होती है, उस संस्था को बर्बाद होने से पीएम और सीएम भी नहीं बचा सकते।

‘एडीएम’ क्या, ‘डीएम’ भी चाहें तो ‘सुधार’ नहीं हो ‘सकता’

पता नहीं कितने डीएम, सीडीओ और एडीएम आए और चले गए, लेकिन कमीषनबाजी का खेल न तो रुका और न कम ही हुआ, बल्कि जो भी अधिकारी आते हेैं, उनका जोर भ्रष्टाचार को कम करने पर नहीं, बल्कि अपना कमीशन बढ़ाने पर अधिक रहता है। इसी लिए मीडिया बार-बार कहती आ रही है, कि कूबत हो तो व्यवस्था बदलिए, अधिकारी नहीं। सीआरओ को स्थानीय निकाय और बीडीए का प्रभार मिलने से लगने लगा था, कि हो सकता है, कि व्यवस्था में सुधार हो। लेकिन आज भी वही सबकुछ हो रहा है, जो एडीएम के रहते हुए हो रहा था। पहले भी बभनान में सबसे अधिक 45 फीसद कमीषनबाजी का खेल होता था, और आज भी हो रहा है। जांच में बभनान में घटिया निर्माण होने की रिपोर्ट भी हुई, लेकिन न तो पिछले वाले एडीएम ने कोई कार्रवाई किया, और न प्रभार पाने वाले सीआरओ ने कुछ किया।