बस्ती। जब भी कोई सीएमओ आता है, तो उन्हें बताया जाता है, कि प्रेमबहादुर सिंह से कभी ‘प्रेम’ मत कीजिएगा, संदीप राय से कभी ‘राय’ मत लीजिएगा, और अजय मिश्र को कभी अपने पास भटकने मत दीजिएगा। यह वह लोग सीएमओ को सलाह देते हैं, जो सालों से इन तीनों की कार्यगुजारी को देखते आ रहे हैं, जिन सीएमओ ने सलाह मान लिया, उसने धोखा भी नहीं खाया और पैसा भी खूब कमाया, जैसे पूर्व सीएमओ डा. दूबे। आजकल सीएमओ कार्यालय में दो भ्रष्ट कहे जाने वाले बाबूओं के बीच अधिकार को लेकर जंग छिड़ी हुई, बात लिखा-पढ़ी करने तक पहुंच गई है। यह जंग उस समय छिड़ी जब मुंडेरवा के सीएचसी के मरम्मत के नाम पर आए 80 लाख की पत्रावली चलाने की बात आई, नियम के तहत पत्रावली प्रमोद कुमार मिश्र के टेबुल से चलनी चाहिए, लेकिन चली प्रेम बहादुर सिंह के टेबुल से। सवाल उठ रहा है, कि जब कार्य का विभाजन हो गया तो क्यों प्रेम बहादुर सिंह के द्वारा प्रमोद कुमार मिश्र के कार्यो में हस्तक्षेप किया जा रहा है, और क्यों पीडब्लूडी को पत्रावली बाबू प्रेम के द्वारा चलाई गई, जब कि यह कार्य प्रमोद मिश्र के जिम्मे है। कहने का मतलब सीएमओ ने प्रमोद मिश्र को फाइव स्टार वाली सुविधा तो दे दी, लेकिन पत्रावली नहीं दिला पा रहें हैं, प्रमोद मिश्र को ज्वाइन किए लगभग एक माह हो गए, लेकिन अभी तक उन्हें टेंडर संबधी कोई भी पत्रावली प्रेम बहादुर सिंह की ओर से नहीं दी गई। जानकार बताते हैं, कि अगर टेंडर वाली पत्रावली प्रेम ने प्रमोद को दे दिया तो कई राज खुल सकते है। अपने फर्जीवाड़ा को छिपाने के लिए पत्रावली नहीं दी जा रही है, चूंकि सीएमओ को कुछ जानकारी है, नहीं और उन्हें गुमराह करके अनेक अनियमित कार्य कराए गए, अब प्रमोद मिश्र के आने के बाद अनियमित कार्य का खुलासा होने का डर प्रेम को सता रहा है। पीडब्लूडी को जो पत्र भेंजा गया, उसमें प्रेम बहादुर सिंह का हस्ताक्षर हैं, जबकि प्रमोद मिश्र का होना चाहिए। सीएमओ कार्यालय में ठेकेदारों का एक गोल ऐसा भी है, जो प्रेम बहादुर सिंह का बचाव कर रहा है, और दूसरा गोल ऐसा हैं, जो प्रेम बहादुर सिंह के कालेचिठटठे को खोलना चाहता है। दोनों बाबूओं को यह लगता है, कि जो भी खबरे मीडिया में आ रही है, वह एक दूसरे के विरोधियों के द्वारा दी जा रही है। दो बाबूओं की लड़ाईं में घोटालें उजागर हो रहें हैं, एक बाबू दूसरे की पोल खोलता है, तो दूसरा बाबू दूसरे की पोल खोल रहा है। बदनामी विभाग और सीएमओ की हो रही है। प्रेम बहादुर सिंह चाहते हैं, कि यह 80 लाख का काम विवादों में रहने वाले और अनियमित रुप से अनुबंधित जय कांस्टक्षन के जनेष्वर मिश्र को मिले। इसी लिए पत्रावली खुद चला रहे है। जबकि नियमानुसार उसी फर्म को 80 लाख का कार्य दिया जा सकता है, जिसका पंजीकरण बी श्रेणी में हो, और जय कांस्टक्षन का पंजीकरण सी श्रेणी में हैं, और इन्हें 70 लाख का काम एक बार में दिया जा सकता हैं। जब कि यह मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन हैं, और वैसे भी जो मामले हाईकोर्ट में विचाराधीन होते हैं, उन मामलों में कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती। भले ही पत्रावली नियम विरुद्व प्रेम बहादुर सिंह के द्वारा चलाई जा रही है, लेकिन अगर कोई मामला फंस जाएगा, तो कार्रवाई प्रेम बहादुर के खिलाफ नहीं बल्कि प्रमोद कुमार मिश्र के खिलाफ होगी, क्यों कि कार्य का आवंटन तो प्रमोद मिश्र के नाम है। प्रेम को इस बात का डर सता रहा है, कि अगर कहीं टेंडर वाली पत्रावली प्रमोद मिश्र को मिल गई, तो जो काम उन्होंने सीएमओ को गुमराह करके किया, उसका कहीं भेद न खुल जाए। दोनों में किसी को ईमानदार नहीं कहा जा सकता है, खासबात यह है, कि प्रेम बहादुर सिंह, प्रमोद कुमार मिश्र और संदीप राय तीनों मृतक आश्रित वाले बाबू है। इस लिए तीनों को नौकरी कैसे मिलती है, इसका एहसास नहीं हैं, वैसे भी जितने भी मृतक आश्रित वाले हैं, उनमें अधिंकाश लोग भ्रष्ट ही निकल रहे है। कहने का मतलब मृतक आश्रित वालों ने पूरे जिले को भ्रष्टाचार की आग में झोंक दिया है।
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