अमित चौधरी बन गए ‘हृवाइट कालर क्रिमिनल’
-सामाजिक अपराधी को सजा देना या पकड़ना आसान होता है, लेकिन सफेद पोष अपराधी तक पहुंचना और उन्हें छूना आसान नहीं होता
-150 करोड़ के धान घोटाले के आरोपी और जिसके खिलाफ पांच-पांच एफआईआर दर्ज हो, वह एक दिन भी जेल नहीं गया,
-पहले अरेस्ट स्टे लिया, जब चार्जशीट दाखिल होने लगी से उससे पहले पांचों मामलें में एंटी सेपेटरी बेल ले लिया
-बाहर पुलिस साथ दे रही और अंदर सरकारी वकील मदद कर रहें, इस सफेद पोष अपराधी ने सारे सिस्टम को खरीद लिया, नौकरी वापस पाने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहा, तभी तो पांच-पांच आईओ और सरकारी वकील को खरीद लिया
-जिस दिन सेवा मंडल बिक गया, उस दिन बहाली तय, जब तक जेपीएस राठौर नहीं बिकेगें तब तक इसकी बहाली नहीं होगी, और मंत्रीजी को खरीदना कोई मुस्किल नहीं, इसी लिए इन्हें ब्रीफकेस प्रेमी मंत्री कहा जाता
बस्ती। सिस्टम को कैसे खरीदा जाता है, अगर किसी को सीखना है, तो वह बर्खास्त पीसीएफ के डीएस अमित कुमार चौधरी से सीख सकता है। 150 करोड़ के धान घोटाले का आरोपी अमित ने दिखा दिया कि पैसे के बल पर किस तरह पूरी व्यवस्था को खरीदा जा सकता है। जिस व्यक्ति के खिलाफ गबन के पांच-पांच मुकदमें हो और वह व्यक्ति एक दिन भी जेल न गया हो तो इसे आप क्या कहेगें। इसका बस चलता तो यह डीएम सिद्धार्थनगर को भी खरीद लेता है, लेकिन यहां इसका पैसा काम नहीं आया, बर्खास्त भी हुआ एफआईआर भी हुआ, और यह सबकुछ ईमानदार डीएम सिद्धार्थनगर के चलते हुआ। अगर यही हिम्मत बस्ती के डीएम दिखाए होते तो कहानी कुछ और होती, फिर इनके खिलाफ इतना मुकदमा दर्ज हो जाता है, कि सालों उसी में परेशान रहते। चूंकि बस्ती के एआर भी फंस रहे थे, इस लिए बर्खास्त डीएस के खिलाफ कठोर और प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाई, कहने का मतलब अमित चौधरी के लिए बस्ती का प्रशासन सिद्धार्थनगर की अपेक्षा आसान और सुलभ रहा। जबकि पिछले सात सालों में अमित चौधरी ने बस्ती को एक तरह से लूट लिया। एक मामूली डीएस देखते ही देखते अरबपति बन गया, उसी रास्ते में चलने का प्रयास अब एआर कोआपरेटिव भी कर रहे है। एआर कोआपरेटिव का अंजाम भी वही होता जो अमित चौधरी का हुआ, लेकिन इनके विभाग के मंत्री के ब्रीफकेस कल्चर और इनके रिष्तेदार कहे जाने वाले एक बड़े ने इन्हें बचा लिया, नहीं तो यह अब तक जेल में होते।
अमित चौधरी के साथ वाले तीन या चार घोटालेबाज जेल की हवा खा रहे हैं, और घोटाले का मुखिया बाहर घूम रहा है। इसे हम और आप क्या कहेंगें? इसी लिए कहा जाता है, कि पुलिस और सरकारी वकील को खरीदिए और मौज करिए। बस्ती मंडल में अगर इतना बड़ा धान का घोटाला हुआ और घोटाले का मुखिया जेल नहीं गया तो इसके लिए कहीं न कहीं किसान कमिष्नर को भी जिम्मेदार मानती है। वैसे भी इनके कार्यकाल में कभी धान घोटाला तो कभी गेहूं घोटाला तो कभी खाद घोटाले का जन्म हुआ। कहा भी जाता है, कि अगर मंडल या जिले में कोई घोटाला होता है, तो वह लचर प्रशासन के कारण होता है। जिले और मंडल वालों को लगता ही नहीं कि कोई कमिष्नर भी कार्यरत् है। जाहिर सी बात है, कि इसका प्रभाव नीचे वाले अधिकारियों पर पड़ता है, वह भी वही करने लगते हैं, जो उनका अधिकारी चाहतें है। इसका जीता जागता उदाहरण एआर और डीआर। इन्हीं दोनों की खाउं नीति के कारण आज मंडल और बस्ती धान, गेहूं और खाद घोटाले में जल रहा है। कहना गलत नहीं होगा कि अमित चौधरी को अरबपति बनाने में इन दोनों का बहुत बड़ा योगदान है। वरना अगर दोनों अधिकारी चाह लिए होते तो अमित चौधरी करोड़ तो क्या लाख भी नहीं कमा पाते। डीआर, एआर और बर्खास्त डीएस के कारण ही मंडल के सचिवों का नाम भ्रष्टाचारियों में शामिल हो गया। बहरहाल, वह दिन दूर नहीं जब घोटालेबाज को लोग बस्ती मंडल में नौकरी करते देख सकते है।
कहा जाता है, कि सामाजिक अपराधी को सजा देना या पकड़ना आसान होता है, लेकिन सफेद पोश अपराधी तक पहुंचना और उन्हें छूना आसान नहीं होता। पुलिस वहां तक पहुंच ही नहीं पाती या फिर पहुंचना ही नहीं चाहती जहां यह मौज मस्ती कर रहे होते। जिस तरह पुलिस परसरामपुर के शांति राइस मिल की मालकिन शांति को घर से पकड़कर जेल में बिना किसी एफआईआर के भेज दिया, उसी तरह क्यों कि घोटाले के आरोपी अमित कुमार चौधरी को पकडा। सवाल उठ रहा है, कि कैसे इन्हें पहले हाईकोर्ट से अरेस्ट स्टे मिला और बाद में जब चार्जशीट दाखिल होने लगी तो पांचों एफआईआर में अग्रिम जमानत कैसे मिल गया? आखिर पुलिस क्या रही थी? जाहिर सी बात हैं, कि पुलिस उसी को ही रात में पकड़कर लाती है, जिससे पैसा नहीं मिला रहता, ऐसे लोगों को दिन के उजाले में भी नहीं पकड़ती जिनसे पैसा मिला रहता है। यही है, बस्ती मंडल के पुलिस का सच। क्यों नहीं कमिष्नर, शांति राइस की शांति देवी की तरह अमित चौधरी की गिरफतारी पर जोर दिया। 150 करोड़ के धान घोटाले के आरोपी और जिसके खिलाफ पांच-पांच एफआईआर दर्ज हो, वह एक दिन भी जेल नहीं जाता है, पहले अरेस्ट स्टे मिलता हैं, पुलिस देखती रह जाती है, और जब चार्जशीट दाखिल होने लगता है, तो उससे पहले पांचों मामलें में एंटी सेपेटरी बेल मिल जाती है। यहां पर पुलिस देखती रह जाती है। बाहर पुलिस साथ दे रही और अंदर सरकारी वकील मदद कर रहें, इस सफेद पोश अपराधी ने सारे सिस्टम को खरीद लिया, नौकरी वापस पाने के लिए पानी की तरह पैसा बहा रहा, तभी तो पांच-पांच आईओ और सरकारी वकील को खरीदा। जिस दिन सेवा मंडल बिक गए, उस दिन बहाली तय, जब तक जेपीएस राठौर नहीं बिकेगें तब तक इसकी बहाली नहीं होगी, और मंत्रीजी को खरीदना काई मुस्किल नहीं, क्यों कि इन्हें ब्रीफकेस प्रेमी मंत्री कहा जाता है।
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