बस्ती। पहली बार एडीएम कार्यालय का ऐसा व्हाइटवाश हुआ कि कोई नहीं बच पाया। लोग समझ ही पाए, कि ऐसा कैसे और क्यों हुआ? पूरा कलेक्टेड कार्यालय इसे लेकर परेशन और हैरान रहा। किसी ने सोचा भी नहीं था, कि इतने व्यापक स्तर पर एक साथ तबादला भी हो सकता है। अगर इस तबादले से सुधार हो सकता है, तो इस निर्णय को सही माना जाएगा, और अगर नहीं हुआ तो फिर चर्चा का विषय बन सकता है। खासबात यह रही कि सभी ने ज्वाइन भी कर लिया। एडीएम कार्यालय में एक साथ सभी को बदलने के पीछे शासकीय कार्य को सकुशल संपन्न कराना माना जा रहा। स्टेनो से लेकर पेशकार तक बदल दिए गए। जो चर्चा का विषय बना हुआ है। एक और खासबात यह है, जिस तबादले वाले पत्र पर एडीएम का हस्ताक्षर होना चाहिए, उस पर सीआरओ का हस्ताक्षर है। एक तरह से इस कार्रवाई को कार्यालयों की गंदगी को साफ करने का अभियान भी माना जा रहा है। जिस तरह एडीएम कार्यालय सहित अन्य का तबादला हुआ, वह काफी चौकाने वाला रहा। इस तरह के तबादले की अपेक्षा कोई नहीं कर रहा था। वैसे तो अनेक तबादले हुए, लेकिन सबसे अधिक चौकाने वाला एडीएम कार्यालय का व्हाइटवाश होना रहा। वैसे शिकायतें तो पहले से ही इस कार्यालय के लोगों की मिल रही थी, लेकिन जब से अर्दली कांड हुआ, तब से जोर पकड़ लिया। आज भी अनेक लोगों का मानना हैं, कि अर्दली कांड यूंही नहीं हुआ, इसी लिए इसे साजिश का एक हिस्सा भी माना जा रहा है। साजिश के खुलासे की लोग प्रतीक्षा और अपेक्षा कर रहे है। पता तो चले कि कौन इतने बड़े अधिकारी के खिलाफ साजिश रचा। इसे जिले के दो टाप क्लास के अधिकारियों के बीच टकराव के रुप में भी जनता देख रही है। जिसकी चर्चा सबसे अधिक राजनैतिक गलियारों में हो रही है, हर कोई चर्चा करके मजा लेना चाह रहा है। इसी लिए तबादले को भी उसी के नजरिए से देखा जा रहा है, वरना एक बाबू का तबादला करने में साहबों को राजनैतिक दखलंदाजी का इतना अधिक सामना करना पड़ता हैं, अधिकारी परेशान हो जाते। यहां तो पूरे स्टाफ को ही बदल दिया गया। अर्दली कांड के बाद साहबों को अगर अपनी छवि सुधारनी/बनानी है, तो अर्दली की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखनी होगी। क्यों कि साहबों के सबसे अधिक करीब अर्दली और पेशकार ही होते है, और अब तक जो दोनों का इतिहास रहा, बहुत अच्छा नहीं रहा। गलत/सही काम कराने वाले भी इन्हीं दोनों के पास सबसे अधिक जाते है। कार्यालय और साहबों की जो गोपनीयता भंग होती, वह इन्हीं दोनों के कारण होती है। आज भी साहब के लोकेशन के बारे में या तो अर्दली या फिर पेशकार से लोग जानने का प्रयास करते है। इसी लिए कहा जाता है, गोपनीयता बनाए रखने के लिए अर्दली और पेशकार दोनों को एक अंतराल के बाद बदल देना चाहिए। बड़े जरुरतमंद लोग सबसे पहले अर्दली और पेशकार को ही मैनेज करते हैं। पटल परिवर्तन का जो नियम हैं, वह इस लिए बनाया गया, ताकि कोई अधिक दिन तक रहकर उसका दुरुपयोग न कर सके। इसका सबसे बड़ा उदाहरण, पीडब्लूडी के टेंडर बाबू लोग है। 16-17 साल से अगर कोई एक पटल पर रह गया तो जाहिर सी बात हैं, कि वह पटल को अपना जागीर की तरह समझने लगता है। जैसा चाहता है, वैसा करता और साहबों से करवाता है। लेकिन बिडंबना यह है, कि साहबों को भी ऐसे लोग पसंद होते हैं, जो उनकी सही/गलत आवष्यकताओं को पूरा कर सके।