बस्ती। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि क्या महादेवा विधानसभा क्षेत्र की जनता को अपना विधायक चुनने का भी अधिकार नहीं? क्या कभी वह अपना विधायक चुन पाएगी? आखिर क्यों पार्टियां महादेवा की जनता को उनके अधिकार से वंचित कर रही है? क्यों पार्टियां स्थानीय नेताओं को मौका नहीं देती? क्यों ऐसे बाहरी लोगों को मौका देती, जिनका मकसद क्षेत्र की जनता का सेवा करना नहीं बल्कि लूटकर के चले जाना? ऐसा भी नहीं कि स्थानीय नेता न हो, ऐसे-ऐसे स्थानीय नेता कि अगर उन्हें मौका मिल जाए तो वह विधायक निधि को नहीं बेचेंगी, कि बल्कि निधि का इस्तेमाल क्षेत्र की जनता की राय से खर्च करेंगी। पार्टिया एक तरह से क्षेत्र के लोगों से उनके आरक्षण का अधिकार छीन रही है। आजादी के बाद से ही क्षेत्र की जनता अपने बीच के विधायक को देखने का सपना देख रही है। स्थानीय विधायक के न होने से क्षेत्र दिन-प्रति दिन भ्रष्टाचार की आग में चल रहा है। अपनांे के बीच का और बाहर के विधायक होने का यही सबसे बड़ा फर्क है। क्षेत्र की जनता में जो लगाव और अपनापन स्थानीय विधायक में रहता हैं, वह जिले के बाहर या विधानसभा के बाहर के होने में नहीं रहता। स्थानीय विधायक 24 घंटे जनता के लिए उपलब्ध रहेगा, और बाहर वाला जब मन करेगा, तभी क्षेत्र में आएगा, उसका अधिकतर समय लखनऊ या दिल्ली में बीतेगा। अगर स्थानीय व्यक्ति एक बार चुनाव हार भी जाता है, तो वह पांच साल तक क्षेत्र में रहकर क्षेत्र के लोगों की सेवा करेगा, और अपना एवं पार्टी के जनाधार को मजबूत करेगा। वहीं पर बाहर वाला अगर हार भी गया तो मुड़ कर क्षेत्र में नहीं आएगा, जैसा कि पिछले चुनाव में बसपा से ‘खरवार’ अंबेडकरनगर से आए, हारे, और फिर पलट तक दुबारा नहीं आए, अगर स्थानीय उदयभान को टिकट देती तो क्या यह क्षेत्र छोड़कर भाग पातें? भागते नहीं बल्कि क्षेत्र को मजबूत बनाने में लग जाते।
एक सवाल और भी उठ रहा है, कि अगर इतने बड़े दलों के पास महादेवा विधानसभा में एक भी नेता विधायक बनने के लायक नहीं तो यह किसकी गलती है? अगर स्थानीय प्रमुख बन सकते हैं, तो विधायक क्यों नहीं? यह सवाल उन दलों के लोगों के लिए हैं, जो स्थानीय लोगों पर भरोसा न करके बाहर वालों पर करते है। यकीन मानिए, अगर किसी दल ने 2027 में किसी स्थानीय को टिकट दे दिया तो जनता उसे सिर आखों पर बैठा लेगी, और इतने वोटों से जीताएगी, कि इतिहास बन जाएगा, क्यों कि क्षेत्र की जनता अपने के बीच के लोगों को विधायक होना देखना चाहती है। जिस भी पार्टी ने स्थानीय को टिकट दिया, समझो महादेवा की सीट उस पार्टी की हो गई। क्षेत्र के लोगों में बाहरी वालों से इतनी नफरत हैं, कि वह उन्हें देखना तक नहीं चाहतें। उनकी मजबूरी हैं, कि उन्हें वोट देना है, यह जानते हुए कि वह जिस बाहरी को वोट दे रहे हैं, वह बेईमान और भ्रष्टाचारी निकलेगा, लेकिन क्या करें, उनके सामने कोई विकल्प नहीं है। महादेवा विधानसभा क्षेत्र में एससी वर्ग के नेताओं की कमी नहीें हैं, कमी उन दलों की है, जो स्थानीय नेताओं के बारे अपना नजरिया नहीं बदल पा रहे है। बाहरी लोगों को टिकट देने का मतलब आरक्षण का मजाक उड़ाना। क्यों कि आरक्षण तो इसी लिए दिया जाता है, ताकि उसका लाभ स्थानीय लोगों को मिले। इतिहास गवाह है, कि बाहरी लोग कभी भी महादेवा क्षेत्र की जनता के बीच लोकप्रिय नहीं हुए। इस लिए लोकप्रिय नहीं हुए, क्यों कि बाहरी लोगों का मकसद लूटखसोट और निधि बेचना रहता है। यही कारण है, कि महादेवा की जनता अब अपना विधायक चाहती है। मान लीजिए कि अगर बसपा को प्रत्याशी चाहिए तो ‘उदयभान’ जैसा प्रत्याशी नहीं मिलेगा, क्षेत्र में इन्हें बसपा का सबसे अधिक लोकप्रिय नेता माना जाता है। क्षेत्र में इनकी पकड़ बहुत अच्छी है, और इन्होंने क्षेत्र और पार्टी के लिए काम भी खूब किया है। बस इन्हें टिकट मिलने भर की देरी है। अगर भाजपा को प्रत्याशी बनाना है, तो रमेश चक्रवर्ती पर पार्टी दांव खेल सकती है, यह 1996 में भाजपा के टिकट पर चुनाव भी लड़ चुके है। यह पिछले कई सालों से क्षेत्र में अपनी जमीन को मजबूत करने के लिए मेहनत कर रहे है। वहीं अगर कांग्रेस स्थानीय को टिकट देना चाहती है, तो अनिल भारती जैसा प्रत्याशी पार्टी को नहीं मिलेगा, वर्तमान में यह क्षेत्र से जिला पंचायत सदस्य भी है। इन्हें पार्टी का एक वफादार कार्यकर्त्ता माना जाता हैं, सालों से यह पार्टी से जुड़े रहे, और पार्टी के हर मूवमेंट में इनका योगदान रहा। रही बात सपा की तो यह पार्टी की मजबूरी होगी, कि वह बाहरी वाले को अपना प्रत्याषी बनाए।
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