आखिर ‘सचिवों’ की ‘फर्जी’ नियुक्ति में ‘क्यों’ नहीं हो रही ‘एआर’ के खिलाफ ‘कार्रवाई’?
-जिला सहकारी बैंक के चेयरमैन एवं भाजपा नेता राजेंद्रनाथ तिवारी की शिकायत पर जांच करने के बजाए उसे रददी की टोकरी में डाल दिया गया
-आज भी बैक डेट में प्रस्ताव लेकर और 2016 में रहे एआर को तलाशकर उनसे बैक डेट में नियुक्ति करने का खेल हो रहा
-बस्ती के पूर्व एडीसीओ एवं एआर के चार्ज पर रहे राम सागर वर्मा के पास हाल ही में बैक डेट में हस्ताक्षर करने के लिए भेजा, प्रलोभन भी दिया, फिर भी उन्होंने हस्ताक्षर नहीं किया
-पांच नाबालिग सचिवों की नियुक्ति के मामले में एआर तो फंसे लेकिन धन के बल पर जांच को ही प्रभावित कर दिया
-दावा किया जा रहा है, कि अगर तत्कालीन समितियों के सचिव, अध्यक्ष, एडीओ और एसीडीओ से इसकी पुष्टि कराई जाए तो एआर और तत्कालीन डीआर की कलई खुल जाए
बस्ती। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि आखिर एआर कितना मजबूत हैं, कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई होती ही नहीं, यहां तक कि डीएम भी एआर के खिलाफ कार्रवाई करने में अपने आपको असहज पा रहे है। बैठकों में नेताओं और मंत्रियों की सुन लेते हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं करते, रही बात सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं की तो यह लोग अगर मन से चाह जाएं तो कब का बोरिया बिस्तर बंध गया होता। कार्रवाई करवाने के बजाए सत्ता पक्ष के विधायक सार्वजनिक रुप से किसानों से माफी मांग रहे है। एक अधिकारी अपने गृह जनपद में बार-बार तबादला करवाकर आ रहा है, और भ्रष्टाचार पर भ्रष्टाचार कर रहा है, फिर भी कोई कार्रवाई नहीं होती है। पहले इनपर पांच नाबालिग सचिवों की फर्जी नियुक्ति करने का आरोप लगा, मामला राजधानी तक पहुंचा, जांच बैठी, लेकिन धन और राजनेैतिक पहुंच के बल पर जांच को ही दबवा दिया। जिला सहकारी बैंक के चेयरमैन एवं भाजपा नेता राजेंद्रनाथ तिवारी शिकायत पर शिकायत करते रहें। बैठकों में लखनउ तक चिल्लाया, मंत्री से भी कहा, इतना तक कहा कि अगर कार्रवाई नहीं कर सकते तो कम से कम बस्ती से हटा तो दीजिए, फिर भी कार्रवाई नहीं हुई, गृह जनपद के होने का सबूत तक दिया, फिर भी नहीं हटाए गए। इसी को देखते हुए ही अधिवक्तता नरेंद्र बहादुर सिंह ने पीएम मोदी से भ्रष्टाचार को लीगलाइज करने की मांग की, ताकि लोग जैसा चाहें वैसा करे, जितना लूटना, चाहें लूटे, बस निर्धारित कमीशन दे दे। आज भी बैक डेट में प्रस्ताव लेकर और 2016 में एआर रहे की तलाषकर उनसे बैक डेट में हस्ताक्षर करवाकर नियुक्ति करने का खेल हो रहा है। इसका खुलासा उस समय हुआ जब बस्ती के पूर्व एडीसीओ एवं एआर के चार्ज पर रहे राम सागर वर्मा के पास हाल ही में बैक डेट में हस्ताक्षर करने के लिए भेजा गया, प्रलोभन भी दिया, फिर भी उन्होंने हस्ताक्षर नहीं किया। इस बात की संभावना जताई जा रही है, कि एआर का फर्जी हस्ताक्षर भी कर लिया गया होगा, और नियुक्ति भी हो गई होगी। दावा किया जा रहा है, कि अगर तत्कालीन समितियों के सचिव, अध्यक्ष, एडीओ और एसीडीओ से इसकी पुष्टि करा ली जाए तो एआर और तत्कालीन डीआर की कलई खुल जाएगी। कहने का मतलब प्रथम चरण के कार्यकाल और दूसरे चरण के कार्यकाल में सचिचों की भर्ती का खुल एआर की अगुवाई में हुआ और हो रहा है। सवाल उठ रहा है, कि इनके ही कार्यकाल में क्यों धान, गेहूं और खाद के घोटाले के साथ सचिवों की फर्जी नियुक्ति ही क्यों होती है? सवाल उठ रहा है, कि अगर कर्मचारी पहले से समितियों पर कार्यरत हैं, तो क्यों नहीं उन्हें किल्लत के समय समिति का प्रभार दिया गया? जो प्रभारी सचिव बनाए गए, उन्हें समिति के सचिव का कार्य क्यों नहीं दिया गया? कुछ ऐसे सवाल हैं, जिसका जबाव एआर के पास नहीं हैं, मगर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है, जिसे सरकारी तौर पर सवाल जबाव करना चाहिए, वह तो चुप बैठा हैं, सिर्फ मीडिया ही सवाल करके रह जा रही हैं, मीडिया की बात अधिकारी कितना सुनते हैं, यह किसी से छिपा हुआ नहीं, जब अधिकारी साक्ष्य देने के बाद भी कार्रवाई नहीं करते तो फिर मीडिया के चिल्लाने पर क्या करेगें? यह भी सवाल बना हुआ। कहने का मतलब अगर भाजपा 2027 में सत्ता में नहीं आती तो इसके लिए पूरी तरह अधिकारियों को ही जिम्मेदार माना जाएगा। रही बात अधिकारियों की तो इन पर इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता कि सीएम योगी रहे या फिर अखिलेश यादव, यह अपना काम अपने हिसाब से करते आ रहे है। इनके कामकाज का सरकार पर कितना प्रभाव पड़ता या फिर सरकार की छवि खराब होती है, इससे भी इनका कोई लेना देना नहीं। इनकी मजबूती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, कि सत्ता पक्ष के विधायक, सांसद और मंत्री तक चिल्लाते रहें हैं, कि अधिकारी बेलगाम हो चुके हैं, लेकिन योगीजी के सेहत पर उसी तरह कोई असर नहीं पड़ता जिस तरह भ्रष्ट अधिकारी पर नहीं पड़ता।
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