बस्ती। जिन सूदखोरों के चलते न जाने कितने को जान गवांनी पड़ी और न जाने कितने घर को बर्बाद होना पड़ा, उन सूदखोरों की जगह खुला आसमान नहीं बल्कि जेल की काल कोठरी है। यह सूदखोर समाज और गरीबों के दुष्मन होते है। इनसे इस बात से कोई मतलब नहीं रहता है, कि उनके ब्याज की भरपाई न करने के चलते किसी का घर बर्बाद हो रहा है, कोई सुसाइड कर रहा हैं, एक ब्याज चुकाने के लिए दूसरा कर्ज लेना पड़ता, जेवर और जमीन तक बिक जाते हैं। यह इतने क्रूर और असंवेदनशील होते हैं, कि इनके भीतर मानवता नाम की कोई चीज नहीं होती। ब्याज का धन देते-देते न जाने लोग कर्ज में डूबते जा रहे है। लेकिन सूदखोरों का ब्याज नहीं समाप्त होता। मूलधन से हजार गुना ब्याज के रुप में ले लेते हैं, फिर भी मूुलधन वहीं का वहीं रहता है। यह सूदखोर अच्छी तरह जानते हैं, कि उनके खिलाफ कोई पुलिस में नहीं जा सकता और न एफआईआर ही दर्ज करवा सकता, इसी का यह लोग नाजायज फायदा उठाते है। जिस दिन पिपरा गौतम के विपिन सिंह पुत्र स्व. रामजतन सिंह की तरह अन्य हो जाएगें तो सूदखोरों का सफाया हो जाएगा। समस्या यह है, कि इनकी दंबगों के आगे पुलिस भी पीड़ितों की नहीं सुनती, अब जरा अंदाजा लगाइए कि जब विपिन सिंह ने एसपी से पिपरा गौतम निवासी पुनीत सिंह पुत्र तेज बहादुर सिंह से जानमाल की गुहार लगाई तो एसपी ने भी यह कहकर अनसुनाकर कर दिया कि हम कैसे मान लें कि तुम्हारे साथ पुनीत सिंह ने ऐसा अमानवीय व्यवहार किया होगा, वह तो भला हो डीआईजी साहब का जिन्होंने दर्द को समझा और एफआईआर दर्ज कराने का आदेष दिया।
डीआईजी को लिखे मार्मिक पत्र को पढ़कर किसी का भी दिल भर आएगा, अगर नहीं भरेगा तो वह सूदखोर जिसने विपिन सिंह का सबकुछ छीन लिया। नशीली दवा खिलाकर जमीन जायदाद लिखवा लिया। मारापीटा और बंदूक दिखाकर कहा कि गांव से भाग जाओ नहीं तो जान से हाथ धोना पड़ेगा। इस तरह का अमानवीय व्यवहार करने वाले सूदखोर ही हो सकते है। डीआईजी से मिलकर कहा कि बहुत ही दुखी मन से न्याय की आस लिए आपके दरबार में आया हूं। जिस एसपी साहब से पीड़ित की बात तक पहीं सुनी, उस व्यक्ति को डीआईजी साहब ने पहले पानी पिलाया, फिर उसकी सुनी है। डीआईजी साहब जैसे पुलिस अधिकारियों के कारण ही जनता का विष्वास अभी पुलिस पर से पूरी तरह नहीं टूटा। कहा कि पिपरा गौतम निवासी पुनीत सिंह ने उसे दस फीसद ब्याज के दर पर तीन हजार पहली जुलाई 25 को उधार दिया। पैसा लेकर वह हरियाणा कमाने चला गया, लेकिन उसकी तबियत खराब हो गई। दस हजार रुपया फिर उसके खाते में पुनीत ने डाल दिया। एक रिष्तेदार को भेज कर कहा कि यह ठीक करवा देगें, दिल्ली 3-4 दिन रहा। उसके बाद उसे कोई नशीला पदार्थ खिलाकर बस्ती ले आए, दो-तीन दिन तक बंधक बनाए रखा, इनके तीन चार आदमियों ने मारापीटा भी। बंदूक निकालकर कहा कि तुम पागल हो तुम्हारा भाई भी पागल है, दोनों को मार दूंगा। मेरा कुछ नहीं कर पाओगे। कहा कि एक सुनियोजित तरीके से 18 दिसंबर 25 को रजिस्टी कार्यालय ले गए, वहां क्या लिखया पढ़ाया हम्हें कुछ नहीं मालूम। फिर हमको डरा धमकाकर कार से अयोध्या ले गए, वहां डरा धमकाया और हरियाणा भेजवा दिया। कहा कि किसी तरीके से जान बचाकर गांव आए और 27 फरवरी 26 को दोपहर में कालर पकड़कर मारापीटा, कहा कि हफतेभर में गांव छोड़ दो, नही ंतो जान से हाथ धोना पड़ेगा। उसके बाद छिपकर अपने घर में रहने लगा। 16 मार्च 26 को फिर पुनीत सिंह मारापीटा। कहा कि इसी हफते तुमको जमीन में तोप देगें। अब आप समझ गए होगें कि यह सूदखोर कितने क्रूर और अमानवीय होते है। षहर में कुछ और भी सूदखोर हैं, जिनके चगुंल से निकलने के लिए न जाने कितने दिनों से छटपटा रहे है। हालही में एक कायस्थ और शुक्लाजी का मामला सामने आ चुका, जिसमें भारी रकम का लेन-देन हुआ, फिर भी मूलधन रह ही गया। लोगों को सूदखोरों के खिलाफ आगे आना होगा, तभी समाज से सूदखोर रुपी कोढ़ समाप्त होगा।
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