बस्ती। जिन पैथालाजी की जांच रिपोर्ट पर गर्भवती महिलाओं और गर्भ में पल रहे बच्चों का जीवन-मरन निर्भर रहता है, अगर उसी रिपोर्ट की कोई विधिक मान्यता न हो तो कैसे जज्जा-बच्चा जिंदा रहेगें? बिना पैथालाजिस्ट के हस्ताक्षर के ओझा डायग्नोन्स्टि सेंटर में मरीजों को रिपोर्ट दिए जाने का मामला सोशल मीडिया पर खूब छाया रहा। सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन हैं, कि अगर किसी मरीज की लैब रिपोर्ट बिना पैथालाजिस्ट के हस्ताक्षर के जारी होती है, तो उसकी कोई विधिक मान्यता नहीं होती। इसी लिए सुप्रीम कोर्ट ने लैब की जांच रिपोर्ट पर पैथालाजिस्ट के हस्ताक्षर को अनिवार्य कर दिया, इसके पीछे दायित्व निर्धारण की बात कही गई। आप लोगों को जानकर हैरानी होगी कि जिला महिला अस्पताल और 100 बेड एमजीएच हर्रैया अस्पताल में दो-दो प्राइवेट लैब हैं, पैथालाजिस्ट भी है, लेकिन कोई जांच रिपोर्ट पर हस्ताक्षर नहीं करता, मरीज ऐसे रिपोर्ट को कहीं चैलेंज भी नहीं कर सकता। जिला महिला अस्पताल में पुजारी लाल गुप्त तो हर्रैया में डा. दीपक शुक्ल पैथालाजिस्ट के रुप में कार्यरत हैं, लेकिन जांच रिपोर्ट पर हस्ताक्षर नहीं करते, क्यों नहीं करते यह सवाल दोनों अस्पतालों के सीएमएस भी नहीं करते, ऐसा लगता है, कि दोनों सीएमएस ने मरीजों को भगवान के भरोसे छोड़ दिया, जब कि दोनों पैथालाजिस्ट को एक-एक लाख से अधिक का वेतन सरकार दे रही है, किस लिए दे रही है, यह सीएमएस नहीं पूछ पा रहे हैं। इससे लगता है, कि दोनों अस्पतालों में प्रशासनिक व्यवस्था नाम की कोई चीज ही नहीं रह गई, यहां के लोगों को जितना इंटरेस्ट सरकारी धन को लूटने और मरीजों का शोषण करने में रहता है, उतना दायित्वों के निर्वहन में नहीं रहता। इन दोनों अस्पतालों में एक भी ईमानदार ढूढ़ने से भी नहीं मिलेगा। यह रही पैथालाजिस्ट के गैरजिम्मेदाराना रर्वैए की बात। अब आ जाइए, दोनों अस्पतालों में एलटी यानि लैब टेक्निसिएन की भूमिका पर। हर्रैया में दो पद के सापेक्ष दो एलटी कार्यरत है। इन्हें भी एक-एक लाख मिलता है। सवाल उठ रहा है, कि जब जांच रिपोर्ट पर पैथालाजिस्ट हस्ताक्षर ही नहीं करेगें, तो दोनों एलटी के होने और न होने से क्या मतलब, इस लिए यह दोनों का ध्यान काम पर कम और राजनीति पर अधिक रहता है। यह दोनों तो खातें तो सरकार का नमक, गाते हैं, प्राइवेट पीओ सिटी और पीसीसीएल लैब की।  जिला महिला अस्पताल में एक भी एलटी नहीं, यह अस्पताल बिना एलटी के चल रहा है। हर्रैैया अस्पताल में आज भी बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा हो रहा है, मैडम, सीएमएस फर्जीवाड़ा करने के लिए मुख्यालय से फर्जीवाड़ा स्पेसिलिस्ट बाबू को अतिरिक्त अटैच करवा रखा है। जिस अस्पताल में फर्जीवाड़ा करने के लिए बाहर से स्पेसिलिस्ट बाबू को बुलाया जाता है, उस अस्पताल की स्थित को अच्छी तरह से समझा जा सकता है। मरीजों और अस्पताल के असंतुष्ट सुरक्षा कर्मियों का दावा है, कि अगर ओपीडी और दवा काउंटर से मरीजों को दिए गए दवाओं का मिलान करा लिया जाए तो भारी अंतर मिलेगा। ओपीडी में कम और दवा काउंटर पर अधिक मरीजों को दवा देने के मामले का खुलासा हो सकता। अगर डाक्टर ने 20 ओपीडी किया तो 40 मरीजों को दवा देता हुआ मिलेगा। यही दवाएं बाद में फर्जी खरीद के काम आता है। काउंटर पर इतना सबकुछ हो जाने के बावजूद फार्मासिस्ट के द्वारा मरीजों को देखना और बाहर की दवा लिखना बंद नहीं किया गया। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि क्यों नहीं जिला महिला अस्पताल की तरह हर्रैया में भी सीसीटीवी कैमरे लगाए जाते। जबकि दो साल पहले षासन का आदेश सीसीटीवी कैमरा लगाने का है। अब आप समझ गए होगें कि जब से मैडम सीएमएस बनी क्यों नहीं सीसीटीवी कैमरा लगवाया गया। सीसीटीवी कैमरा लग जाएगा तो सबसे पहले मरीज को देखने वाले फार्मासिस्ट की चोरी पकड़ी जाएगी, और दूसरा डाक्टरों की ओपीडी की चोरी पकड़ी जाएगी। जिन डाक्टर्स डा. अनीता वर्मा, डा. रंजू कन्नौजिया और डा. अभय पटेल को जिला महिला अस्पताल में तीने-तीन एवं पांच दिन के लिए अटैच किया गया, वह खूब मजे है। यह डाक्टर वेतन तो हर्रैया से लेते हैं, लेकिन मौज बस्ती में करतें।