सूचना का अधिकार कोई एहसान नहीं, यह हमारा संवैधानिक हकःकोर्ट

-मध्यप्रदेश हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, कमजोर करने वालों को मिलेगा करारा जवाब

बस्ती। उच्च न्यायालय, जबलपुर यह फैसला उन लाखों लोगों के लिए एक मिसाल है जो सरकारी संस्थानों में पारदर्शिता, जवाबदेही और ईमानदारी की उम्मीद रखते हैं। आइए, जानिए इस ऐतिहासिक फैसले के प्रमुख बिंदु नौकरी से संबंधित दस्तावेज अब ‘गोपनीय’ नहीं रहेंगे यदि कोई व्यक्ति किसी सार्वजनिक पद पर नियुक्त हुआ है, तो उसकी शैक्षणिक योग्यता, अनुभव प्रमाणपत्र, चयन प्रक्रिया से संबंधित दस्तावेज, नियुक्ति आदेश आदि निजी जानकारी मागंे जा सकते है। कोर्ट का स्पष्ट आदेश है, कि सभी दस्तावेज जनता के लिए सार्वजनिक सूचना हैं और माध्यम से प्राप्त किए जा सकते हैं। गोपनीयता का झूठा बहाना अब नहीं चलेगा सूचना आयोग ने इस को धारा 8(1)(ी), 8(1)(र) और 11 के तहत खारिज कर दिया था, लेकिन अदालत ने कहा बिना ठोस कारण बताए सूचना को रोकना अधिनियम का दुरुपयोग है। जनहित सर्वोपरि है पारदर्शिता से समझौता नहीं अगर किसी नियुक्ति में भ्रष्टाचार या अनियमितता की आशंका है, तो जनता का यह जानना अधिकार है कि चयन प्रक्रिया निष्पक्ष थी या नहीं। गोपनीयता की आड़ लेकर इन तथ्यों को छिपाया नहीं जा सकता। धारा 11 की गलत व्याख्या पर रोक सूचना आयोग ने तीसरे पक्ष की सहमति के बिना जानकारी देने से मना कर दिया था। अदालत ने स्पष्ट कहा अगर सूचना जनहित में है, और किसी तीसरे व्यक्ति को इससे कोई वास्तविक नुकसान नहीं, तो उसकी सहमति जरूरी नहीं है। सूचना देनी ही होगी। गलत मंशा से नकारने पर दंड कोर्ट ने पाया कि यह जानबूझकर खारिज की गई थी ताकि किसी अयोग्य व्यक्ति को बचाया जा सके। आदेश संबंधित जन सूचना अधिकारी पर 25,000 जुर्माना यह राशि आवेदनकर्ता डॉ. जयश्री दुबे को दी जाएगी 15 दिन में निशुल्क सूचना उपलब्ध कराना अनिवाय कोर्ट ने आदेश दियारू सभी मांगी गई सूचनाएं 15 दिनों के भीतर निशुल्क आवेदक को दी जाएं। यह फैसला एक चेतावनी है उन सभी अधिकारियों और संस्थाओं के लिए जो त्ज्प् के तहत सूचना देने से बचते हैं। कानून का पालन न करना अब उन्हें भारी पड़ेगा। आपका आपकी ताकत!अगर आप भी सरकारी भर्तियों, नियुक्तियों या फंड के दुरुपयोग से जुड़े दस्तावेजों की जानकारी चाहते हैं, तो आपका संवैधानिक हथियार है।