‘रामप्रसाद चौधरी’ को ‘हराना’ तो ‘उनकी’ तरह बनना ‘होगा’!
बस्ती। किसी भी पार्टी के लिए कप्तानगंज विधानसभा क्षेत्र से सपा के विधायक कंिवंद्र चौधरी को 2027 में हराना आसान नहीं होगा। इन्हें हराने का मतलब पिता सांसद रामप्रसाद चौधरी को हराना होगा। जिस तरह इस क्षेत्र में रामप्रसाद चौधरी का पीडीए के लोगों में घुसपैठ हैं, उतना अन्य किसी का भी नहीं है। क्षेत्र के लोगों का कहना है, कि कविंद्र चौधरी को हराने के लिए रामप्रसाद चौधरी जैसा बनना पड़ेगा। जिसका एहसास यहां के लोग 2022 में ही करा चुके हैं, जब भाजपा के पूर्व विधायक सीपी शुक्ल के घुटनों के बल माफी मांगने के बाद भी यहां के लोगों ने माफ नहीं किया। यहां के लोग 2017 जैसी गलती नहीं करना चाहते। भाजपा अगर वाकई पिता-पुत्र को हराकर इतिहास रचना चाहती हैं, और कप्तानगंज सीट को प्रदेश अध्यक्ष को तोहफे में देना चाहती है, तो उसे ऐसा प्रत्याशी उतारना होगा, जो ओबीसी चेहरे का हो, और जिसे यादव, चौधरी और मुस्लिम तीनों पसंद करें। किसी अन्य विरादरी को प्रत्याशी बनाने का मतलब भाजपा का सपा को वाकओवर देने जैसा होगा। भाजपा के नवागत प्रदेश अध्यक्ष अगर इस विधानसभा क्षेत्र के लिए खास रणनीति नहीं बनाई या फिर प्रत्याशी का चयन ठीक से नहीं किया तो अन्य चार सीटें जीते या न जीते, लेकिन कप्तानगंज हारने को तैयार रहंे। भाजपा की हार और जीत प्रत्याशी के चयन पर निर्भर होगा। पहली बात ओबीसी के चेहरे पर दांव लगाना होगा और दूसरा भीतरघातियों को किनारे करना होगा। कहने का मतलब भाजपा को भी पीडीए जैसा गेम खेलना पड़ेगा। भाजपा इसी बहाने लोकसभा के हार का बदला भीे ले सकेगी। भाजपा को यह नहीं भूलना चाहिए कि रामप्रसाद चौधरी को इसी विधानसभा क्षेत्र से सबसे अधिक वोट मिला। कहना गलत नहीं होगा कि कविंद्र चौधरी के जीतने के पीछे उनके पिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा। जिले की यह पहली सपा की सीट हैं, जिस पर अभी तक किसी सपाई ने न तो दावेदारी ठांेकी और न उनका फोटो ही अखिलेश यादव के साथ बुके देते हुए वायरल हुआ। पिता-पुत्र को मात देना मतलब चाकोें चबे चबाना जैसा होगा। यही कारण है, कि सपा इस सीट को जिले का ही नहीं पूरे प्रदेश की सबसे अधिक सुरक्षित सीट मान कर चल रही है। टिकट के ठेकेदारों को भी कम से कम कप्तानगंज में तो भाजपा के प्रति ईमानदारी और निष्ठा दिखानी होगी। अगर किसी धन्ना सेठ पर निष्ठा दिखाया तो उनका का तो कुछ नहीं होगा, अलबत्ता कप्तानंगज में भाजपा की नैया अवष्य डूब जाएगी। सभी भाजपाईयों को कप्तानगंज को लेकर टिकट के वितरण से लेकर चुनाव के प्रचार-प्रसार तक एकता दिखानी होगी। एकता वह भी जो सबको दिखाई दें, अगर एकता नहीं दिखाई देगी तो इसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ेगा। भाजपा का लहर भी एकता पर भारी पड़ता है। कप्तानगंज सीट जीत कर एक तरह से जिलाध्यक्ष, प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी को इसी बहाने बहुत बड़ा तोहफा दे सकते है। गेंद पूरी तरह भाजपा के पाले में हैं, अब भाजपा के लोगों को तय करना होगा कि गोल होने दें, या फिर बचाएं। सोचने और विचारने के लिए भाजपा के पास अभी समय है। भाजपा को अभी से ऐसे ओबीसी प्रत्याशी को मैदान में उतार देना चाहिए, जो पीडीए में घुसपैठ बना सके। अगर पार्टी ने अंतिम समय प्रत्याशी का निर्णय लिया तो बहुत देर हो जाएगी। तब प्रत्याशी सिर्फ पूर्व प्रत्याषी बनकर रह जाएगा। भाजपा को दूसरे स्थान पर रहने या जमानत बचाने वालेे प्रत्याशी को उतारने से बचना होगा। प्रदेश अध्यक्ष की जरा सी चूक 27 में भाजपा को कितना नुकसान पहुंचा सकती है, यह देखना वाला होगा। वैसे भी जिस तरह भाजपा सरकार से प्रदेश की जनता दुखी और परेशान हैं, ऐसे में अगर प्रत्याशियों के चयन में कहीं चूक या गलती हुई तो सत्ता से हाथ भी धोना पड़ सकता है।
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