बस्ती। सीएमओ कार्यालय के बाबू प्रेमबहादुर सिंह की प्रेम गाथा जारी है। इन्होंने प्रण कर लिया है, कि जब तक यह सीएमओ को मिटा नहीं देगें तब तक चैन से नहीं बैठेगें। यह जो चाहते थे, वह सीएमओ से करवा लेते थे, चाहें वह फर्जी आदेश हो या फिर फर्जी आर्डर या फिर फर्जी भुगतान ही क्यों न हों, इन्होंने जो चाहा, वही सीएमओ से करवा लिया। ऐसा लगता है, कि मानो सीएमओ अपनी बुद्वि या विवेक से नहीं बल्कि प्रेमबहादुर सिंह के बुद्वि से काम कर रहें है। कहा भी जाता है, कि किसी भी सीएमओ को इतना भोला या इतना सरल नहीं होना चाहिए, कि एक अदना सा बाबू उन पर हावी हो जाए। सीएमओ को यह पता होना चाहिए कि वह किस पत्रावली पर हस्ताक्षर कर रहे है? बाबूओं का तो काम ही उल्टा सीधा काम करवाना रहता है, अब यह सीएमओ पर निर्भर करता है, कि वह जिस पत्रावली या पत्र पर हस्ताक्षर कर रहे हैं, कहीं भविष्य में उनके लिए खतरा न बन जाए, जिस भी साहबों ने बाबूओं पर आंख बंदकर भरोसा किया समझो वह धोखा खाया। कहना गलत नहीं होगा, कि बाबू किसी के नहीं होते, अगर उन्हें इच्छित कीमत मिल जाए तो वह अपने साहब को फंासी पर चढ़ा दें। पहले के बाबू अपने साहबों के प्रति बहुत ही ईमानदार होते थे, तबके साहब भी बाबू पर आंख बंदकर विष्वास करते थे, लेकिन जब से मृतक आश्रित पर बाबूओं की तैनाती होने लगी, बेईमानी का दौर चल निकला। सीएमओ कार्यालय में तीन बाबूओं की नियुक्ति मृतक आश्रित पर हुई, और तीनों आज चोरी और बेईमानी में झंडा गाड़े हुए है। चूंकि यह लोग उस दौर से नहीं गुजरे होते हैं, जो इनके पिता और माता नौकरी पाने के लिए गुजरे होगें, इसी लिए नौकरी कैसे मिलती इसका एहसास मृतक आश्रित वाले बाबूओं को नहीं होता, इन्हें तो यह लगता है, कि सरकार ने इनपर एहसान किया और इन्हें लूट पाट करने का लाइसेंस दिया है। ऐसे बाबूओं का न तो कोई दोस्त होता और न कोई हमदर्द, होगा कैसे जब यह किसी को भी नहीं छोड़ते, मौका मिलने पर सबसे पहले यह अपनों का ही गर्दन काटते है। वैसे प्रेमबहादुर सिंह के प्रेम की गाथा बहुत बार सुनी जा चुकी है, लेकिन आज हम आप लोगों को ऐसी गाथा बताने जा रहे हैं, जिसे सुनकर आप भी चौक जाएगें, और सोचने पर मजबूर हो जाएगें, कि क्या बाबू ऐसे भी होते है। इन्होंने अपने सरकारी आवास के मरम्मत, टायल्स लगवाने, डंेटिगं पेंटिगं करने के लिए जीडी मिश्र के फर्म ‘मां लक्ष्मी’ को जनवरी 25 में आर्डर दिया, लगभग दो लाख का भुगतान भी हुआ, फिर मार्च 25 में यानि मात्र दो माह के बाद प्रेमबहादुर सिंह ने सीएमओ को अंधेरे में रखकर उसी काम के लिए लखनउ के ‘स्वाधीनता इंटरप्राइजेज’ को मरम्मत के साथ विधुतीकरण का आर्डर दे दिया, और लगभग दो लाख का भुगतान भी करवा दिया। अब जरा अंदाजा लगाइए कि एक ही काम के लिए दो बार आर्डर और दो बार भुगतान किया गया, सवाल उठ रहा है, कि क्या कोई फर्म लखनउ से आकर दो लाख का काम बस्ती में करेगी? इससे साफ पता चलता है, कि प्रेमबहादुर सिंह और सीएमओ ने मिलकर दो लाख से अधिक का फर्जीवाड़ा किया, इसी को कहते हैं, अपने साहब को धोखा देना, सीएमओ को दो लाख के घोटाले में शायद ही दस रुपया मिला होगा। प्रेमबहादुर सिंह ने अपने साहब को पहली बार धोखा नहीं दिया, बल्कि इसके पहले भी दिया, 40 लाख का फर्जी भुगतान करवाने के मामले में धोखा दे चुके है। इस मामले में सीएमओ और प्रेमबहादुर सिंह दोनों बुरी तरह फंसे हुए हैं, हाईकोर्ट सीएमओ को दो बार मौका दे चुकी है, प्रेमबहादुर सिंह की ओर से जितने भी फर्जीवाड़ें किए गए, उन सभी पत्रावलियों का पता ही नहीं चल रहा है, प्रमोद कुमार मिश्र पत्रावली मांगते थक जा रहे हैं, लेकिन नहीं दी जा रही है, विजिलेंस के एसपी भी पत्रावली मांग चुके हैं, लेकिन उन्हें भी उपलब्ध नहीं कराया गया। सीएमओ कार्यालय में कोई भी ऐसा बाबू नहीं जिसकी जांच न चल रही हो, और जो भ्रष्टाचार में लिप्त न हो, जब साहब भ्रष्टाचार में लिप्त रहेगें तो बाबू भी रहेगें।  कहा भी जाता है, एक चोर पर भरोसा कर लेना लेकिन तीनों मृतक आश्रित वाले बाबूओं पर मत करना।