बस्ती। प्रमोद कुमार मिश्र को गोरखपुर से बस्ती सीएमओ कार्यालय में लाने वालों की मंशा सीएमओ को बेवकूफ बनाकर लूटपाट करने की है। मिश्राजी उन बाबूओं में से नहीं हैं, जो झट से हजार दो हजार लपक लेते हैं, मिश्राजी इतनी छोटी रकम की ओर देखते ही नहीं, पकड़ना तो बहुत दूर की बात है। यह उन्हीं मामलों में हाथ डालते जिसमें लाख दो लाख मिलने की संभावना रहती है, भले ही चाहें इसके लिए सीएमओ को धोखा ही क्यों न देना पड़े? चूंकि स्थानीय होने के नाते इनका भाजपा के नेताओं से अधिक नजदीकी हैं, या यह कहिए, कि इन्होंने अपने लाभ के लिए नेताओं से संबध बना रखा है। अगर किसी की नियुक्ति मृतक आश्रित पर करनी होती है, तो उससे यह कहा जाता है, कि दो लाख लगेगा, क्यों कि बिना दो लाख लिए सीएमओ पत्रावली पर हस्ताक्षर ही नहीं करेगें। उधर मिश्राजी सीएमओ से यह कहते हैं, कि साहब मामला सत्ता पक्ष के सांसद और विधायक का है, और इसके लिए उन्होंने फोन भी किया था, सांसद और विधायक का नाम सुनते ही सीएमओ साहब तैयार हों जाते, उधर जिसकी नियुक्ति होनी होती, उससे कहते कि जाओ सांसद और विधायक से सीएमओ को फोन करवा दो, नेताओं ने यह जानकर सीएमओ को फोन कर दिया, कि किसी का भला हो जाएगा, लेकिन उन्हें क्या मालूम कि इसके पीछे मिश्राजी की साजिश भी हो सकती है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि नियुक्ति हो गई, और मिश्राजी ने दो लाख भी ले लिया, मगर सीएमओ और नेताजी को एक रुपया भी नहीं मिला, और किसी को पता भी नहीं चला कि मिश्राजी ने दो लाख भी लिया। इसी का नाम हैं, प्रमोद कुमार मिश्र। चूंकि अधिकांश सीएमओ बाहर के होते हैं, इस लिए उन्हें स्थानीय नेताओं के बारे में कोई खास जानकारी नहीं रहती, इसी का फायदा मिश्राजी से सालों तक उठाया। असल में मिश्राजी की नियुक्ति जिला होम्योपैथ में बाबू के पद पर हुई, बाद में इन्होंने सीएमओ कार्यालय में समायोजन करवा लिया, समायोजन तो करवा लिया, लेकिन होम्योपैथ कार्यालय पर इनका सालों तक कब्जा रहा, लगभग सालों तक मिश्राजी ने होम्योपैथ कार्यालय में किसी बाबू की नियुक्ति या समायोजन नहीं होने दिया, गोरखपुर जाने से पहले तक यह सीएमओ और होम्योपैथ दोनों देखते थे, जितने भी लेन-देन होता था, वह होम्योपैथ कार्यालय में ही होता था। मिश्राजी को जानने वाले कहते हैं, कि इतना शातिर बाबू पूरे स्वास्थ्य विभाग में नहीं मिलेगा। इनका शातिराना दिमाग हमेशा पैसे पर रहता है, कहां से और किस सा्रेत से पैसा मिल सकता है, उसकी तलाश में रहतें है। अगर ऐसा नहीं होता तो प्रदीप कुमार की फर्जी मृतक आश्रित की नियुक्ति के मामले में जांच कमेटी इन्हें दोषी नहीं मानती, यह अलग बात हैं, कि उस जांच रिपोर्ट को ही दबवा दिया, वरना यह तत्कालीन सीएमओ डा. जेएलएम कुशुवाहा के साथ जेल की हवा चुके होतें।
बताते हैं, कि प्रमोद मिश्र को बस्ती लाने के पीछे लूटपाट गैंग की मंशा उन फर्जी सामानों का भुगतान करना, ताकि सीएमएसडी स्टोर प्रभारी डा. बृजेश शुक्ल, एनएचआरएम के संदीप राय, चीफ फार्मासिस्ट अजय मिश्र और सीएमओ को लूटने का मौका मिल सके। पूरा सीएमओ कार्यालय और जिला जानता है, कि लूटपाट करने वाला गैंग सीएमओ को मूर्ख बनाकर लूट रहा है। यह लूटपाट गैंग जो चाहता है, सीएमओ से आदेश करवा लेता है, जिन मामलों में पैसा मिल जाता है, उन मामलों में मिनटों में आदेश में परिवर्तन हो जाता है। हाल ही में सल्टौआ के एमओआईसी की नियुक्ति हुई, अभी एमओआईसी ने ज्वाइन भी नहीं किया था, कि उनके स्थान पर किसी और एमओआईसी का आदेश हो गया। बाद में पता चला कि आदेश बदलने के पीछे लेन देन रहा। प्रमोद कुमार मिश्र और उनके टीम को इतना शक्तिशाली माना जाता है, कि वह दूसरे पटल के कार्य को भी चुटकी में करवा देते। डाक्टर्स और फार्मासिस्ट के तबादले में लूटपाट गैंग की अहम भूमिका रहती है। बिना इन्हें चढ़ावा चढ़ाए कोई इधर से उधर हो ही नहीं सकता। एक तरह से इन लोगों ने सीएमओ के साथ पूरे कार्यालय को कैप्चर कर रखा है। कहना गलत नहीं होगा, कि यही लोग सीएमओ कार्यालय को चला रहे है। सीएमओ से अधिक यह लोग कमा रहे हैं, कोई स्टोर को लूट रहा है, तो कोई टेंडर में डांका डाल रहा है, तो कोई विधुत और सिविल कार्य का फर्जी करवाकर लूट रहा। ऐसे-ऐसे सामान खरीदे जा रहे हैं, जिसकी कोई आवष्यकता ही नहीं, सीएमओ आवास एक तरह से गोदाम बना हुआ है, चूंकि 40 फीसद वाले सामान अधिक खरीदे जाते हैं, जिस सामान की नियमानुसार जो सामान हर तीन साल में खरीदना चाहिए, उसे हर माह दो माह में खरीदे जा रहे है। लोग कहते भी है, कि जिस दिन चीफ फार्मासिस्ट अजय मिश्र का प्रभार स्टोर से हट गया, उस दिन काफी हद तक भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सकता है। सवाल उठ रहा है, कि इतनी शिकायतें के बावजूद न तो प्रभार हटाया जा रहा है, और न इनका तबादला ही हो रहा, आखिर इसके पीछे कौन? कहीं जीजा राज्यपाल तो नहीं।
0 Comment