बस्ती। जिस तरह ब्राहृमण महासभा में वाक युद्व हो रहा है, उसे लेकर कहा जा रहा है, कि जीते कोई भी, लेकिन हार तो ब्राहृमण महासभा की होगी। न इतिहास और न ब्राहमण समाज कभी भी उन लोगों को माफ नहीं करेगा, जो लोग इस वाक युद्व के जिम्मेदार है। जिस वर्ग को सबसे अधिक विद्वान वर्ग माना जाता है, अगर वही वर्ग एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाए, तो पूरा समाज प्रभावित होता है। इतनी प्रतिष्ठित संस्था के महामंत्री और कोषाध्यक्ष अगर 25 सालों में भी हिसाब-किताब नहीं दे पाते तो सवाल तो दोनों पर उठेगा ही, अगर कोई दोनों को बर्खास्त करने और एफआईआर दर्ज कराने की मांग करते हुए यह कहतें है, कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गई, तो धरने में बैठेगें, को राष्टीय अध्यक्ष को इसे गंभीरता से लेनी चाहिए, क्यों कि अगर पदाधिकारी धरने पर बैठ गए, तो फिर ब्राहृमण महासभा कोई उभार नहीं पाएगा, और अगर कहीं मांग मान ली गई, तो दोनों कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेगें, बहरहाल, यह संस्था ऐसे मोड़ पर आ कर खड़ा हो गया, कि इससे जुड़े लोग समझ ही नहीं पा रहे हैं, कि आखिर इस संस्था को बदनामी से बचाए तो कैसे बचाए? सबसे अधिक उहापोह की स्थित अध्यक्षजी के सामने हैं, अध्यक्ष होने के नाते इन्हें कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ रही है, और पड़ेगी, इन्हें खुद नहीं मालूम होगा। क्यों कि अंत में ढ़ीकरा इन्हीं के सिर फुटने वाला है। वैसे भी अब आरोप इन पर भी लगने लगें है। अब तो लोग इससे आहत होकर ग्रुप से ही बाहर होने लगे है। कहां पहले लोग जुड़ने के लिए परेषान रहते थे, और कहां अब ग्रुप से बाहर हो रहे है। यह गिरावट कोई मामूली गिरावट नहीं है।

ब्राहृमण महासभा के हमेशा हितैषी रहने वाले नरेंद्र बहादुर उपाध्याय लिखते हैं, कि जो भी हो रहा या चल रहा है, वह केवल ब्राहृमण समाज को क्षति पहुंचा रहा है। बड़े अफसोस से कहते हैं, कि अब सालों तक कभी यह समाज खड़ा नहीं हो पाएगा। कोई भरोसा भी नहीं करेगा। जो भी अच्छा या बुरा हुआ, उसे बातचीत के जरिए हल किया जा सकता था, लेकिन अब ऐसा लगता हैं, मानो युद्व छिड़ा हुआ हो, इसमें सभी जीत सकते हैं, लेकिन हार तो ब्राहृमण महासभा की ही होगी। सबसे अधिक बुद्विमान माने जाने वाला ब्राहृमण समाज आज सामाजिक रुप से हंसी का पात्र बना हुआ है, किसी संस्था के स्वाभिमान एवं उसके अस्तित्व को बचाए रखने के लिए अनुशासन जरुरी होता है। सबसे बुद्विजीवी समाज को नंगी नाच होते लोग देख रहे है। राकेश कुमार पांडेय कहते हैं, कि आज ब्राहृमण महासभा 25 साल बाद जागा, और कमियों को जान पाया, इसके लिए वे लोग बधाई के पात्र हे।, जिन लोगों ने जगाने का काम किया। अंम्बिका पांडेय कहते हैं, कि बैठक पर बैठक हुई, फिर तरीखों का जाल बिछा, सत्य अगर निर्मल हैं, तो मन क्यों इतना बिचलित हो रहा है। कहते हैं, कि अनमान की धूल से मत मंदिर का मान गिराइए, सत्य की ज्योति जलाकर फिर विष्वास जगाइए, यह सभा किसी एक की नहीं हैं, सबकी अमानत है, आइए मिलकर ज्ञान, शील और गौरव पुनः जगाइए। रामकृष्ण दूबे कहते हैं, कि ब्राहृमण महासभा में समाज की बात कम और राजनैतिक प्रचार ज्यादा होता है, न कि ब्राहृमण महासभा पर कोई चर्चा होती है। सोलरसन बैटरी के कहते हैं, कि क्या ब्राहृमण समाज के भाजपा और सपा नेता और अन्य पार्टी के नेता मर गए हैं, क्या, जिनकी आवाज नहीं निकल रही है, अगर सबको भय और डर है, तो वद और पार्टी छोड़कर चूड़ी पहन ले और घर में रोटी बनाए और खाए। डा. आशीष नरायन त्रिपाठी कहते हैं, कि अब तो ब्राहृमण महासभा में जाने का मन नहीं करता, क्यों कि सम्मान नहीं मिलता, कहते हैं कि हिसाब-किताब देखकर सभी लोगों को पता चल गया होगा, कि क्यों इतने सालों से मठाधीशी और भ्रष्टाचारी सोच के लोग अपने मनमुताबिक चला रहे थे, आने-जाने वालों से ऐसा दुर्व्यवहार करते थे, कि वह आना ही छोड़ दें, ताकि इन लोगों का भ्रष्टाचार और चंदा चोरी का एकछत्र साम्राज्य फलता फूलता रहे। अध्यक्षजी से कहा कि बिना देरी किए कटोर निर्णय ले ताकि भविष्य में यही निर्णय एक उदाहरण के रुप में लोगों के सामने दृष्टांत बने और पवित्र मंदिर और ब्राहृमण महासभा के बारे में भ्रष्टाचार करने से बचे।