बस्ती। एक सप्ताह पहले आवास एवं शहरी नियोजन के प्रमुख सचिव पी. गुरुप्रसाद के उस आदेश पर सवाल उठ रहे हैं, जिसमें इन्होंने अपर आयुक्त की जांच को दरकिनार कर तत्कालीन बीडीए सचिव/एडीएम कमलेशचंद्र और तत्कालीन एक्सईएन पंकज पांडेय को क्लीन चिट दे दिया, और जिस तत्कालीन जेई अनिल कुमार त्यागी को जांच रिपोर्ट में निर्दोष बताया गया था, उसे ‘परिनिंदा का दंड’ सुनाते हुए इसे जेई के चरित्र पंजिका में दर्ज करने का निर्देष बुलंदशहर-खुर्जा के विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष को निर्देष दिया है। आदेश में जेई के खिलाफ प्रचलित अनुशासनिक कार्रवाई को समाप्त कर दिया गया है। यह एक ऐसा आदेश हैं, जिससे भ्रष्टाचारियों को बढ़ावा मिलेगा और ईमानदार का मनोबल गिरेगा। प्रमुख सचिव ने एक ऐसे ईमानदार जेई का मनोबल गिराया, जो भ्रष्टाचारियों के रास्ते का रोड़ा बन चुके थे, और जिसे बस्ती से हटाने के लिए न सिर्फ इन्हें डराया और धमकाया गया, बल्कि कार्यालय में ही इन्हें कार्यालय के लोगों के द्वारा मारापीटा गया, मोबाइल छीन लिया गया, इतना ही इन्हें कई बार अवैध निर्माण कर रहे भवन स्वामियों से सरे आम पिटवाया भी गया, अगर ऐसे ईमानदार जेई के लिए कार्रवाई होती है, और भ्रष्टाचारियों को क्लीन चिट दिया जाता तो सवाल तो पूरी व्यवस्था पर उठेगा, उस व्यवस्था पर उठेगा, जिसमें योगीजी बराबर जीरो टालरेंस नीति का एचएमबी रिकार्ड बजाते है। अब आप लोग समझ गए होगें कि क्यों बीडीए वाले तत्कालीन सचिव कमलेशचंद्र और तत्कालीन एक्सईएन पंकज पांडेय जैसा बनना चाहते हैं? और क्यों नहीं कोई जेई अनिल कुमार त्यागी जैसा बनना चाहता? जांच में तत्कालीन बीडीए के उपाध्यक्ष/डीएम के क्रियाशैली पर भी सवाल उठाए गए थे, और कहा गया, उपाध्यक्ष ने बिना परीक्षण कराए ही जेई के खिलाफ कार्रवाई करने की संस्तुति दे दी। देष का शायद यह पहला ऐसा मामला होगा, जिसमें दोषियों को क्लीन चिट और निर्दोष को सजा दी गई हो। प्रमुख सचिव ने उन साक्ष्यों का परीक्षण ही नहीं किया, जिसमें साक्ष्य के साथ कहा गया कि तत्कालीन सचिव और तत्कालीन एक्सईएन के द्वारा उनके खिलाफ साजिश रची गई, जो गलती उनसे हुई नहीं उसका भी आरोप मढ़ दिया, और जिसने गलती की, उसे बरी कर दिया। स्पष्ट कहा गया कि मुख्य लिपिक एमके सोलंकी, तत्कालीन एक्सईएन पंकज पांडेय, तत्कालीन सचिव कमलेशचंद्र और तत्कालीन सहायक अभियंता/प्रभारी एक्सईएन संदीप कुमार के द्वारा अनेक निर्देषों और पत्राचार के बाद भी शडयंत्र के तहत अभिलेख/दस्तावेज जांच अधिकारी को उपलब्ध नहीं कराया गया। जेई पर चार गंभीर आरोप लगाए गए थे, जिसमें इन्हें तीन में बरी करते हुए कहा कि आरोप साबित नहीं होता, और जिन एक मामले में आरोप साबित होना बताया गया, उसमें भी इन्हें जानबूझकर दोषी बनाया गया, आरोप लगाया गया कि इन्होंने 1223 के सापेक्ष मात्र 1120 पत्रावलियों का ही परीक्षण किया गया, जब कि शासन को जो रिपोर्ट भेजी गई, उसमें सभी 1223 पत्रावलियों का परीक्षण करना बताया गया। अगर यह मामला हाईकोर्ट के सामने पहुंच गया तो कोई बचेगा नहीं। जिस तरह एक साजिश के तहत जेई के खिलाफ आरोप पत्र दिया गया, और इनके तबादले के लिए उपाध्यक्ष से पत्र लिखवाया गया, उसका भी खुलासा जांच में हुआ। किस तरह बीडीए को लूटने के लिए तत्कालीन सचिव और तत्कालीन एक्सईएन के द्वारा जेई को अपने रास्ते से हटाने के लिए साजिश रची गई, उसका भी खुलासा जांच रिपोर्ट में हुआ, उपाध्यक्ष को गुमराह करके जो जेई के खिलाफ पत्र लिखाए गए, उसकी भी पोल जांच रिपोर्ट में खुली।