बस्ती। गोरखपुर के सीएमओ भले ही फर्जीवाड़ा के दोषी बाबू प्रमोद कुमार मिश्र की योग्यता और प्रतिभा का उपयोग पांच साल में भी नहीं कर पाए, लेकिन बस्ती के सीएमओ ने इनकी योग्यता और प्रतिभा को ज्वाइन करते ही पहचान लिया, और समझ गए, कि इसी बाबू के भीतर वह काबिलियत हैं, जो उनके लूटपाट के टारगेट पूरा कर सके। इसी लिए सीएमओ ने बाबू की सुख सुविधा के लिए सारे नियम कानून को ताक पर रखकर इन्हें नया कमरा दिया, नया एसी लगवाया और आराम करने के लिए नया सोफा बिछवाया, जब कि सीएमओ साहब को अच्छी तरह से मालूम हैं, कि एक बाबू को एसी और नया सोफा नहीं दिया जा सकता है, सवाल उठ रहा है, कि जब बाबू के लिए एसी और सोफा अनुमन्य ही नहीं तो फिर किस मद से इतना धन व्यय किया गया। वहींे पर अनुमन्य वाले पांच ऐसे डिप्टी सीएमओ रैंक के अधिकारी हैं, जिन्हें या तो कंटोल रुम में बैठना पड़ता, या फिर एक साथ कई एक ही कमरे में बैठता पड़ता, फिर सवाल उठ रहा है, कि आखिर एक बाबू पर सीएमओ साहब इतना मेहरबान क्यों? वह भी ऐसे बाबू के लिए जिसके खिलाफ अगर कार्रवाई हो जाती तो जेल में होते। सवाल पर सवाल उठ रहा है, आखिर सीएमओ साहब ने यही दरियादिली अपने डिप्टी सीएमओ एवं नोडल स्तर के अधिकारी के प्रति क्यों नहीं दिखाई? क्यों एक भ्रष्ट बाबू पर प्यार लुटा दिया? अब जरा उन डिप्टी सीएमओ साहब लोगों की मनोदशा का अंदाजा लगाइए, कि एक अदने से बाबू के लिए नया एसी और नया सोफा और नया कमरा उपलब्ध करवा दिया गया, लेकिन उन लोगों के लिए एक कमरा तक उपलब्ध नहीं कराया गया, सीएमओ साहब ने एक बाबू के सामने अपने अधिकारियों की उपेक्षा की, जिसकी चर्चा हो रही है। एक तरह से नीचा दिखाने का काम सीएमओ ने किया, जिसका सभी डिप्टी सीएमओ को विरोध करना चाहिए, लेकिन एक ने भी विरोध नहीं जताया, जताते गए, अगर जताते तो नोडल का पद छिन जाता। एक भी डिप्टी सीएमओ के भीतर इतनी भी गैरत नहीं बची, वह विरोध तक दर्ज करा सके। विरोध दर्ज कराने का मतलब लाखों की कमाई पर ताला लगना जैसा होगा। सीएमओ साहब के लिए कमाउपूत तो उनके नोडल डिप्टी सीएमओ भी है, लेकिन ऐसा लगता हैं, कि नोडल लोग सीएमओ की इच्छा की पूर्ति नहीं कर पा रहे थे, तभी तो एक बाबू के सामने उन्हें नीचा दिखाया गया। अब आप लोेगों को ‘प्रमोद कुमार मिश्र’ की अहमियत का पता चल गया होगा, जो बाबू पांच साल तक सूखे की जिंदगी काटा हो, अगर उसे हरियाली नजर आएगी, तो वह हरियाली को चरने में नहीं चूकेगा। इनके रिकार्ड के बारे में बताने की आवष्यकता नहीं, यही वह बाबू हैं, जो 17-21 तक की तैनाती के दौरान इन्होंने डूडा वालों के साथ मिलकर लगभग 250 लोगों की नियुक्ति बिना योग्यता और मानक को पूरा किए बिना करवाया, एक-एक लाभार्थियों से 80 हजार से लेकर एक लाख तक लिया गया, इनमें कई ऐसे हैं, जिन्हें एक-एक साल से मानदेय तक नहीं मिला। तत्कालीन सीएमओ डा. जेएलएम कुशवाहा के हिस्से में एक लाभार्थी का 20-20 हजार आया, और बाबू के हिस्से में प्रत्येक से 10-10 हजार आया। दो से ढ़ाई करोड़ का खेल हुआ। इस खेल में सबसे अधिक महत्वपूर्ण भूमिका तत्कालीन बाबू प्रमोद कुमार मिश्र और डूडा के जिम्मेदार की रही। यह वही बाबू हैं, जिन्होंने गरिमा भारती के मृतक आश्रित की नियुक्ति न करके प्रदीप कुमार की न सिर्फ नियुक्ति करवा दिया, बल्कि उसके पांच लाख के देयों का भुगतान भी करवा दिया, बाद में जब इसकी जांच हुई तो प्रमोद कुमार मिश्र और तत्कालीन सीएमओ कुशवाहाजी दोनों दोषी पाए गए, जांच टीम ने दोनों के खिलाफ विधिक कार्रवाई के साथ अनुषासनिक कार्रवाई करने की संस्तुति दी, लेकिन बाद में मामले को रफादफा कर दिया गया। सवाल उठ रहा है, कि क्या प्रमोद कुमार मिश्र के हाथों में कोई पटल सुरक्षित रह पाएगा? बार-बार कहा जा रहा है, कि मिश्राजी को अपने लाभ के लिए एनएचआरएम के डा. बृजेश शुक्ल और स्टोर इंचार्ज अजय मिश्र के द्वारा गोरखपुर से बस्ती लाया गया, तभी तो इनके आते ही इनकी सुख सुविधा के लिए सरकारी खजाने को सीएमओ ने खोल दिया। जिस बाबू को गोरखपुर में पांच साल तक कोई पटल मिला, उसके आते ही अगर मलाईदार पटल और फाइव स्टार होटल की तरह सुविधा मिल जाए, तो इसके पीछे की मंशा को अच्छी तरह समझा जा सकता है।
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