ओमप्रकाश गौतम

गढ़मुक्तेश्वर : नगर पालिका सीमा में टोल स्थापना से लेकर स्वीकृति के दस्तावेजों तक पर उठे गंभीर सवाल, आरटीआई से मिले अभिलेखों के आधार पर हाईकोर्ट में रिट याचिका पंकज लोधी अपना पक्ष खुद रखेंगे।

 गढ़मुक्तेश्वर नगर पालिका क्षेत्र में स्थापित टोल प्लाजा को लेकर चल रही हाइकोर्ट में जनहित याचिका में एक महत्वपूर्ण मोड़ सामने आया है। लंबे समय से इस मामले को न्यायालय में उठा रहे समाजसेवी पंकज लोधी को माननीय हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ के समक्ष स्वयं अपना पक्ष रखने और बहस करने की अनुमति मिलने से प्रकरण की सुनवाई को लेकर नई उम्मीद जगी है। यह मामला अब केवल गढ़मुक्तेश्वर तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि टोल स्थापना के स्थान, सरकारी स्वीकृति और संबंधित अभिलेखों की प्रमाणिकता जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न भी सामने ला रहा है।

पंकज लोधी के अनुसार, वह वर्ष 2017 से आंदोलन कर रहे एवं 2022 से इस मामले में जनहित याचिका के माध्यम से उच्च  न्यायालय  में कानूनी संघर्ष कर रहे हैं। उनका कहना है कि सीमित आर्थिक संसाधनों और हाईकोर्ट की अत्यधिक दूरी के कारण लगातार न्यायिक पैरवी करना उनके लिए कठिन रहा है। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और सूचना का अधिकार अधिनियम (आरटीआई) के माध्यम से विभिन्न विभागों से दस्तावेज जुटाकर मामले को आगे बढ़ाया। उनका कहना है कि इस प्रकरण में वकीलों के माध्यम से प्रभावी पैरवी और समय पर आवश्यक कदम उठाने में आई शिथिलता के कारण भी उन्हें स्वयं आगे आकर अपना पक्ष रखने का निर्णय लेना पड़ा।

नगर पालिका सीमा में टोल स्थापना पर उठाया सवाल

पंकज लोधी का कहना है कि माननीय हाईकोर्ट के समक्ष 13 जुलाई 2022 के आदेश का भी महत्वपूर्ण संदर्भ है, जिसमें नगर पालिका सीमा में टोल लगाए जाने की अनुमति के संबंध में गंभीर कानूनी प्रश्न उठता है। उनका आरोप है कि टोल विभाग ने न्यायालय में दाखिल अपने शपथपत्र में गढ़मुक्तेश्वर नगर पालिका के उपकार्यालय ब्रजघाट को गांव के रूप में दर्शाया, जबकि नगर पालिका से प्राप्त आरटीआई सूचना के अनुसार ब्रजघाट नगर पालिका का हिस्सा रहा है। पंकज लोधी के मुताबिक, इस तथ्य की पुष्टि संबंधित नगर पालिका अभिलेखों से होती है और इसे न्यायालय के समक्ष प्रमाणित दस्तावेजों के साथ स्पष्ट किया जाना आवश्यक है।

उनका एक अन्य प्रमुख सवाल टोल की स्वीकृत लोकेशन को लेकर है। पंकज लोधी के अनुसार, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) से आरटीआई के माध्यम से प्राप्त सूचना में टोल की स्वीकृति गढ़मुक्तेश्वर नगर पालिका सीमा से 3.9 किलोमीटर दूर दर्शाई गई है। दूसरी ओर, गढ़मुक्तेश्वर नगर पालिका से प्राप्त सूचना के अनुसार, ब्रजघाट में गंगा पुल का आधा हिस्सा गढ़मुक्तेश्वर नगर पालिका सीमा में आता है, जबकि सीमा से 3.9 किलोमीटर की दूरी गंगा के दूसरी ओर अमरोहा जिले के मोहम्मदाबाद गांव के निकट पड़ती है। 

एन एच ए आई की आरटीआई         

छिजारसी टोल से मुरादाबाद की ओर दूसरा टोल 59 किलोमिटर पर अप्रूवल है जबकि भौतिकता में 51 किलोमीटर पर टोल लगा दिया 

पंकज लोधी का दावा है कि स्वीकृति संबंधी अभिलेखों में दर्शाए गए स्थान और वर्तमान में हापुड़ की ओर गढ़मुक्तेश्वर नगर पालिका क्षेत्र में संचालित टोल की वास्तविक स्थिति के बीच अंतर है। इसी आधार पर उन्होंने टोल की स्वीकृत लोकेशन, संबंधित अधिसूचना और स्थापना की वैधानिकता की जांच की मांग उठाई है। उनका कहना है कि टोल विभाग द्वारा न्यायालय में संबंधित अधिसूचना प्रस्तुत किए जाने का प्रश्न भी इस मामले में महत्वपूर्ण है।

दस्तावेजों के आधार पर उठेगा मामला

पंकज लोधी का कहना है कि उनके पास एनएचएआई और नगर पालिका से प्राप्त आरटीआई सूचनाएं हैं, जिनके आधार पर वह न्यायालय के समक्ष टोल की स्वीकृत दूरी, वास्तविक स्थापना स्थल, ब्रजघाट की प्रशासनिक स्थिति तथा संबंधित अधिसूचना के विषय में अपना पक्ष रखेंगे। उनका मानना है कि इन सभी तथ्यों का निष्पक्ष न्यायिक परीक्षण आवश्यक है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि टोल निर्धारित स्वीकृति के अनुसार स्थापित है या नहीं।

उन्होंने कहा कि पिछले लगभग 15 वर्षों से टोल वसूली का मुद्दा स्थानीय नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है। यदि जांच और न्यायिक परीक्षण में स्वीकृत स्थान से अलग टोल स्थापित किए जाने या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदारी निर्धारित करने, वसूली की वैधानिकता की जांच करने और आवश्यक कार्रवाई पर निर्णय लेने का प्रश्न भी उठ सकता है। जनप्रतिनिधियों में से भी कोई गंभीरता से जनता के सवालों का जवाब देने  से भाग रहे हैं 

स्थानीय प्रशासन की भूमिका पर भी उठ सकते हैं सवाल

पंकज लोधी के अनुसार, यदि टोल स्थापना में नियमों अथवा स्वीकृति संबंधी शर्तों का उल्लंघन प्रमाणित होता है, तो संबंधित विभागों के साथ-साथ उन प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका की जांच का प्रश्न भी उठ सकता है, जिनके कार्यकाल में इस विषय पर कार्रवाई अपेक्षित थी। हालांकि, इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष संबंधित अभिलेखों के परीक्षण और माननीय न्यायालय के निर्णय के बाद ही निकाला जा सकेगा।

जनहित के इस मामले पर लगी जनता की निगाहें 

समाजसेवी पंकज लोधी को स्वयं बहस करने की अनुमति मिलने के बाद अब सबकी निगाहें इस जनहित याचिका की आगामी कार्यवाही पर टिकी हैं। इस मामले में यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि टोल की वास्तविक स्थापना का स्थान सरकारी स्वीकृति और अधिसूचना से मेल खाता है या नहीं।

पंकज लोधी का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि नगर पालिका क्षेत्र के नागरिकों के हितों की रक्षा और सरकारी नियमों के अनुपालन को सुनिश्चित कराने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप प्राप्त करना है। यदि मामले में अनियमितता प्रमाणित होती है, तो उसके दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं और अन्य स्थानों पर टोल स्थापना की प्रक्रिया तथा स्वीकृति संबंधी दस्तावेजों की जांच की आवश्यकता भी सामने आ सकती है। जिलाधिकारी हापुड़ कविता मीना ने नगर पालिका सीमा में टोल का अप्रूवल की जांच सहित पांच बिंदुओं पर जिला स्तरीय समिति बनाई पंद्रह  दिनों में जवाब देने के आदेश दिए परंतु चार माह बीतने के बाद भी कोई सन्तुष्टि करण  नहीं कर पा रहे 

अब देखना होगा कि आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों और न्यायालय के समक्ष रखे जाने वाले तथ्यों के परीक्षण के बाद इस लंबे समय से चल रहे जनहित प्रकरण में क्या दिशा निकलती है।