बस्ती। जिले में एक नेताजी है, जिन्हें पीडब्लूडी का माहिर और पुराना खिलाड़ी माना जाता है, इनके पावरफुल होने का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है, कि कभी इनके आवास पर ठेकेदारों और अधिकारियों का चौपाल लगता था, इस चौपाल में यह तय होता था, कि कौन सा ठेका किस ठेकेदार को मिलेगा, और किसे नहीं मिलेगा, कौन अधिकारी रहेगा और कौन नहीं रहेगा। सपा शासन काल में जब शिवपाल सिंह यादव पीडब्लूडी मंत्री और राजकिशोर सिंह कैबिनेट मंत्री हुआ करते थे, तो नेताजी ने खूब पैसा कमाया, अधिकारी  तबादला रोकवाने और इच्छित जिला पाने के लिए नेताजी से मिलने के लिए समय मांगते थे।  इसे देखते हुए तत्कालीन अधीक्षण अभियंता ‘शर्माजी’ ने इनसे संपर्क किया, क्यों कि इनका तबादला बस्ती मंडल से किसी और मंडल में हो गया था, ‘शर्माजी’ बस्ती से जाना नहीं चाहते थे, क्यों कि इन्हें बस्ती के ठेकेदार और टेंडर बाबू कमाउपूत लगने लगे थे, तबादला रोकवाने का सौदा हुआ, ‘षर्माजी’ ने नेताजी को ‘ब्रीफकेश’ थमा दिया। लेकिन किन्हीं कारण से नेताजी ‘शर्माजी’ का तबादला नहीं रोकवा सके। बात जब पैसा वापस करने की आई, तो नेताजी फरार हो गए, और तब तक बस्ती नहीं आए, जब तक ‘षर्माजी’ चले नहीं गए। ‘षर्माजी’ को नेता/ठेकेदार ने ऐसा ठगा, जैसे जिला पंचायत के एक ठेकेदार ने महिला इंजीनियर का 40 लाख ठग लिया, ठेकेदार तब तक फरार रहा, जब तक महिला इंजीनियर बस्ती से चली नहीं गई। अधिकारियों को ठगने के मामले में बस्ती के ठेकेदारों का कोई जबाव नहीं। ‘षर्माजी’ और महिला ‘इंजीनियर’ बस्ती से रोकर यह कहते हुए गए कि अब कभी बस्ती नहीं आउंगा, क्यों कि यहां के ठेकेदार बेईमान ही नहीं बल्कि ठग भी है। ऐसा है, जिले के ठेकेदारों का इतिहास। कोई नेता बनकर ठगा तो कोई दोस्त बनकर उधार लेकर ठगा।

संतकबीरनगर में नेताजी के एक चहेते पीडब्लूडी के एक्सईएन ‘एसके पांडेय’ रहे, इन्होंने नेताजी को खूब पैसा कमवाया, फर्जी भुगतान करवाया, नेताजी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके ‘पांडेयजी’ को बस्ती का भी अतिरिक्त प्रभार दिलवा दिया, ताकि नेताजी और एक्सईएन दोनों मिलकर दोनों जिलों को लूट सके। उस समय टेंडर बाबू का काम कैशियर देखा करते थे, शिवकुमार नंदन कैशियर थे, नेताजी और एक्सइएन मिलकर उनके डीवीजन का टेंडर नंदनजी से चोरी करवाना चाहते थे, नेताजी ने एक्सइएन को तो सेट कर लिया, लेकिन कैशियर को सेट नहीं कर पाए, यहां तक कि बड़े साहब ने कैशियर से कहा भी कि जैसा नेताजी चाह रहें हैं, वैसे कर दो, फायदे में रहोगे, इस पर कैशियर ने कहा कि आप हमारे साहब हैं, इस्तीफा दे दूंगा, लेकिन चोरी नहीं करुगंा। कहा कि हमको हटा दीजिए, लेकिन मैं नेताजी के लिए अपना ईमान और धर्म नहीं बेचूंगा। चूंकि कैशियर के सेट हुए बिना टेंडर की चोरी हो नहीं सकती थी, इस लिए साहब को नेताजी के लिए कैषियर को हटाना पड़ा। नेताजी का इतना दबदबा था, कि उन्होंने निर्माण खंड एक में जाकर सभी बाबूओं से पूछा कि कौन कैषियर बनना चाहता, जानकार हैरानी होगी कि लगभग सभी बाबूओं ने कैशियर बनने से इस लिए मना कर दिया, क्यों कि नेताजी ने ‘शिवकुमार नंदन’ को हटवाया था। तब ‘जानकी प्रसाद’ नामक बाबू कैशियर बनने को तैयार हुए, जब जानकी प्रसाद कैशियर की कुर्सी पर बैठ गए, तो नेताजी ने उनसे टेंडर चोरी करने को कहा, इस पर कैषियर ने नेताजी से कहा कि नौकरी आपने हमको नहीं दिया, कि आपके लिए टेंडर चोरी करुं। केैशियर ने नेताजी से कहा कि मैं ‘नंदन’ नहीं हूं, जो इस्तीफा दे दूं, मेरा नाम ‘जानकी प्रसाद’ है, देखता हूं कौन हमसे टेंडर चोरी करवाता है। कहने का मतलब कोई जरुरी नहीं कि साहब अगर बेईमान और चोर हो तो बाबू भी चोर और बेईमान हो। जो भी अधिकारी नेताओं के चक्कर में पड़ा समझो ठगा गया, बस्ती के कुछ ठेकेदारों ने यह साबित कर दिया कि मौका मिले तो वह अधिकारियों को भी ठग सकते है। इसी लिए अब कोई अधिकारी नेताओं पर भरोसा नहीं करता। बल्कि अधिकारी, नेताजी को पटकनी देने के फिराक में रहता है, और जैसे ही मौका मिलता है, वैसे पटकनी देने में नहीं चूकता, जैसा कि हाल ही में एसई ने नेताजी को पटक दिया।