क्यों ‘होल सेलर्स’ ने ‘कोडीन’ को सिर्फ ‘होल सेलर्स’ को ही ‘बेचा’?

बस्ती। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि नशे का कारोबार करने वाले होलसेलर्स ने कोडीन सीरप क्यों होलसेलर्स को ही बेचा? क्यों नहीं किसी रिटेलर्स को बेचा? जब कि होलसेलर्स को रिटेलर्स को बेचना चाहिए था, इससे किसी बड़ी साजिश का पता चलता है। एसआईटी को इस पर भी ध्यान देना चाहिए, अगर एसआईटी ने इस पर होमवर्क कर लिया तो एक ही झटके में उस सवाल पर से पर्दा उठ जाएगा, जिसमें बार-बार कहा जाता है, कि करोड़ों की खरीद फरोख्त सिर्फ और सिर्फ कागजों में ही हुई, कागजों में माल आया और कागजों में होलसेलर्स को माल बेच दिया। कोडीन सीरप न सिर्फ कगजों में बिका बल्कि उसकी जीएसटी भी जमा हुआ। सवाल उठ रहा है, कि जब माल कागजों में बिका तो होलसेलर्स को क्या लाभ हुआ, और यह लाभ किसने दिया? और कितना दिया? यह भी सही है, कि होलसेलर्स को माल टासंपोर्ट से आया, और इन्होंने जिस भी होलसेलर्स को बेचा उसका भुगतान बैंक से हुआ, लेकिन माल भी कागजों में आया और कागजों में माल भी बेचा गया। चर्चाओं पर अगर नजर डाले तो एक शीशी पर होलसेलर्स को कमीशन के रुप में 100 से 150 रुपया  मिला होगा, और जिसने कमीशन दिया, उसने सीरप को बंगलादेश के बाजार में प्रति शीशी 600 से 700 में बेच दिया। तभी तो एक-एक व्यक्ति ने 20-20 लाख शीशी बेच डाला, जाहिर सी बात हैं, कि अगर किसी को माल कागजों में बेचना है, तो वह करोड़ों शीशी बेच देता, कहने का मतलब इस नशे के कारोबार में खरीदने और बेचने वाले का एक रुपया भी नहीं लगा, और मुनाफा करोड़ों का हुआ। भले ही चाहे इससे बच्चे मरे या फिर लाखों घर बर्बाद हो, इससे कारोबारियों का कोई लेना-देना नहीं। अगर किसी भी कंपनी या फिर होलसेलर्स को इस तरह का कारोबार करने और लाभ कमाने का मौका मिलेगा, तो वह इसके लिए कुछ भी सकता। बेरोजगारी समाप्त करने का इससे बड़ा कोई साधन हो ही नहीं सकता। मोदी और योगीजी को इस कारोबार को कानूनी रुप से दे देना चाहिए, ताकि अधिकांश बेरोजगारों को कम से कम रोजगार तो मिल जाएगा, और सरकार का रोजगार देने का एजेंडा भी कामयाब हो जाएगा। चूंकि कंपनी को भी कोडीन भारत में ही बेचना था, इस लिए कंपनी ने बड़े-बड़े और नामचीन होलसेलर्स का चयन किया, ताकि सरकार को लगे कि माल भारत में ही बिका, क्यों कि जब तक भारत में माल कागजों में नहीं बिकता, तब तक माल बंगलादेश नहीं जाता। कहने का मतलब भारत में कोडीन तो कागजों में बिका लेकिन असली कोडीन बगंलोदेश में बिका। जिस तरह कंपनी ने होलसेलर्स को कागजों में बेचा उसी तरह होलसेलर्स ने भी कागजों में बेचा। होलसेलर्स का सिर्फ होलसेलर्स को बेचना और रिटेलर्स को न बेचना को यह साबित करता है, कि कोडीन सीरप बेचने का खेल कागजों में हुआ, अगर वाकई रिटेलर्स को बेचा गया होता तो उसके यहां मिलता। चिराग लेकर ढूढ़ने पर भी रिटेलर्स के यहां नहीं मिलेगा। सवाल उठ रहा है, कि अगर बोगस फर्म गणपति को बेचा गया तो उसने भी किसी रिटेलर्स को ही बेचा होगा। होलसेलर्स यह कहकर बच सकते हैं, कि उसने माल खरीदा और बेचा, और उसे भुगतान भी हुआ, लेकिन असलियत तो किसी और ओर ईशारा कर रही है। इस बात की भी जांच होनी चाहिए, कि क्यों पिछले छह माह में ही होलसेलर्स के लाइसेंस जारी हुए। इस बात की भी जांच होनी चाहिए, कि जब जिले में दो दर्जन से अधिक होल सेलर्स हैं, तो डीएलए और डीआई ने क्यों सात होलसेलर्स की जांच किया? क्यों नहीं अन्य होलसेलर्स की जांच की? बताते हैं, कि जांच के इस खेल में भी बड़ा खेल हुआ। इस बात की भी चर्चा हो रही है, कि क्यों बीसीडीए के अध्यक्ष और उनकी पत्नी की ही जांच की गई? क्यों नहीं अन्य बड़े होलसेलर्स की गई? जबकि लगभग सभी ने कोडीन बेचा होगा। इस पूरे मामले में सबसे अधिक संदिग्ध भूमिका डीएलए और डीआई की है। अगर यह दोनों अपनी जिम्मेदारी निभाते तो आज बस्ती का नाम बदनाम न होता। कहना गलत नहीं होगा कि पिछले दो साल से नशे का अवैध कारोबार हो रहा है, और जिसके चलते हजारों परिवार बर्बाद हो गए, उसके लिए पूरी तरह डीएलए एवं डीआई को ही दोषी माना जा रहा है। असल में देखा जाए तो कार्रवाई तो इन्हीं दोनों के खिलाफ होनी चाहिए, अगर इन्हें छोड़ दिया तो फिर कोई अन्य कांड हो सकता है। ईडी की जांच में यह साबित हो गया, सरगना शुभम जायसवाल ने दो डीआई को भी करोड़ों रुपया दिया। जिस तरह इस तस्करी में सफेद पोशो का नाम सामने आ रहा है, उससे राजनीति गलियारे में हलचल मची हुई है। वैसे भी बिना सफेद पोश के संरक्षण के इतना बड़ा कांड हो ही नहीं सकता। नेताओं का तो समझ में आता है, लेकिन डीएलए और डीआई का समझ में नहीं आता। योगीजी के रहते अगर सूबे में इतना बड़ा खेल होता है, तो इसकी छींटे डिप्टी सीएम पर भी पड़ेगें।       ‘

जब’ कांड ‘भाजपा काल’ में ‘हुआ’ तो ‘दोषी’ सपाई ‘कैसे’ हो ‘गए’?

सवाल उठ रहा है, कि जब कोडीन कांड भाजपा काल में हुआ तो दोषी सपाई कैसे हो गए? अगर मान लिया जाए कि इस कांड को सपाईयों ने अंजाम दिया तो शासन-प्रशासन और डिप्टी सीएम एवं हेल्थ मिनिस्टर, प्रमुख सचिव हेल्थ, आयुक्त औषधि, डीएलए और डीआई क्या कर रहे थे? इसका सीधा मतलब सपाईयों ने भाजपाईयों के गढ में सेधंमारी कर दी। योगीजी यह कहकर नहीं बच सकते कि यह पूरा कांड सपाईयों ने किया, और बदनाम भाजपा को किया। वैसे भी डिप्टी सीएम के अब तक के कार्यकाल में इनके विभाग में सबसे अधिक घोटाला हुआ। यूपी में पिछले तीन सालों से कोडीन का अवैध कारोबार हो रहा है, और सरकारी अमला सोता रहा, इसे प्रदेश की जनता क्या माने, और अब तो अखिले यादव ने भी कोडीन माफिया और कोडीन भाई के घरों और कार्यालयों पर बुलडोजर चलाने की सहमति दे दी है, योगीजी को यह मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहिए। कौन नहीं जानता कि इस खेल में किस पार्टी के लोग और कौन-कौन शामिल है। अगर ईमानदारी से बुलडोजर चला तो सपाईयों पर कम और भाजपाईयों पर अधिक चलेगा। हो सकता है, कि इस कांड से भाजपा के कुछ बड़े लोगों पर कार्रवाई की गाज भी गिर जाए। भाजपा को अगर साफ मन से 2027 के चुनाव में जाना है, तो इस कांड के असली दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी।