कठिनौली के प्रधान राम भरोस से बदला लेने को बेताब सचिव अशोक गौतम

-नौ साल पहले प्रधान के चाचा की षिकायत पर ग्राम विकास अधिकारी अशोक कुमार गौतम निलंबित हुए थे, रिकवरी भी हुई थी

-सचिव को कठिनौली में लाने के लिए कई प्रधानों ने चंदा भी दिया, ताकि कठिनौली ग्राम पंचायत का प्रभार मिल सके

-यह पहले ऐसे सचिव होगें जो इतना पावरफुल हैं, कि सुबह इनका तबादला होता और षाम होते-होते तबादला निरस्त हो जाता

-यह मनी और पावर के बल एक ही कलस्टर में 17 साल तक नौकरी किया, यह प्रधानी का कामकाज भी देखते

-इनपर अधिकारी से लेकर प्रमुख तक मेहरबान रहते हैं, मेहरबानी का कारण सबको खुश रखना

-जब भी इनका तबादला किसी अन्य ब्लॉक में होता तो यह पुनः एक दो माह में जुगाड़ से वापस ना सिर्फ साउंघाट ब्लॉक आ जाते हैं, बल्कि दौलतपुर कलस्टर जिसमें कठिनौली भी शमिल हैं, वासप ले लेते

-इनके सिर पर इसी कलस्टर के एक नकली प्रधान और भाजपा के पदाधिकारी का हाथ है, इन्होंने मनी और पावर के बल पर जैसा चाहा वैसे नौकरी किया, इन पर कोई नियम कानून लागू नहीं होता, क्यों कि यह अधिकारियों और नेताओं के चहेतें

-कठिनौली के प्रधान राम भरोस ने सीडीओ को पत्र लिखकर इन्हें कलस्टर में पड़ने वाले ग्राम पंचायत कठिनौली, पुर्सिया, भादी बुजुर्ग एवं मुबड़रा चिंता एलाट ना करने की अपील की

बस्ती। क्या कोई भ्रष्ट ग्राम विकास अधिकारी इतना पावरफुल भी हो सकता है, कि वह अधिकारियों को अपनी अंगुली पर नचा सके, जैसे चाहे वैसे नौकरी करे और जो कलस्टर चाहे उसे मिल जाए, और जितना साल तक रहना चाहे रहे। यह मनी और पावर का इस्तेमाल करके 17 साल तक एक ही ब्लॉक में और एक ही कलस्टर में घूमफिर कर नौकरी किया, मजबूरी में अगर इन्हें ब्लॉक से हटाना भी पड़ा तो कुछ दिन बाद यह पुनः साउंघाट आ जाते हैं, और इच्छित कलस्टर ले लेते है। इनकी मजबूती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है, कि सुबह इनका तबादला होता और षाम होते-होते निरस्त हो जाता है। इन पर आरोप है, कि इन्होंने नीचे से लेकर उपर तक के लोगों को खरीद रखा है। तभी तो यह पिछले 17 सालों से एक ही ब्लॉक में नौकरी कर रहे है। इनके कलस्टर वाले प्रधान इन्हें इतना चाहते हैं, कि इनके लिए हजारों रुपया चंदा भी देते हैं, ताकि इन्हें फिर से कलस्टर मिल सके। इन्हीं के कलस्टर में कठिनौली ग्राम पंचायत भी है, जिसके प्रधान राम भरोस है। कहा जाता है, कि इनसे बदला लेने के लिए यह पुनः कठिनौली का प्रभार चाहते हैं, क्यों कि नौ साल पहले इनके चाचा कहे जाने व्यक्ति तुलसीराम ने इनके भ्रष्टाचार की षिकायत की थी, जांच हुई और षिकायत, सही पाया गया, निलंबित हुए, कुल एक लाख 10 हजार 420 की रिकवरी भी निकली, जिसमें इनके हिस्से में 36807 रुपया आया, बहाली के लिए इन्हें पैसा जमा करना पड़ा। यह भ्रष्टाचार इन्होंने तत्कालीन कठिनौली के प्रधान जगराम के साथ मिल कर किया, प्रधान को नोटिस भी जारी हुआ। यह पहले ऐसे सचिव होगें जिन्हें आठ बार कठिनौली का प्रभार दिया गया, क्यों दिया गया, यह लिखने  की बात नहीं बल्कि समझने की।

अब जरा अंदाजा लगाइए कि जो सचिव कठिनौली में भ्रष्टाचार के आरोप में निलंबित हुआ हो, और जिसके खिलाफ रिकवरी हुई हो, अगर उसी सचिव को कठिनौली ग्राम पंचायत का प्रभार मिल गया तो वह सचिव भजन तो गाएगा नहीं, सबसे पहले वह षिकायत करने वाले चाचा के भतीजे यानि प्रधान रामभरोस को बर्बाद करेगा, प्रधानी नहीं करने देगा, भुगतान नहीं होने देगा, कार्यो की स्वीकृति नहीं होने देगा। उसके बाद वह उन प्रधानों के साथ मिलकर भ्रष्टाचार करेगा जिन्होंने उसका आर्थिक मदद की। कहने का मतलब जब भ्रष्ट प्रधान और भ्रष्ट सचिव मिल जाएगें तो क्या होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है। कहा भी जाता है, कि अगर सचिव चाह जाए तो कोई प्रधानी नहीं कर पाएगा, और अगर प्रधान चाह जाए तो कोई सचिव भ्रष्टाचार नहीं कर पाएगा। क्यों कि दोनों एक दूसरे के पूरक होते हैं, और दोनों के हस्ताक्षर से भुगतान होता है। इस लिए प्रशासन को भी चाहिए कि ऐसे सचिव को कठिनौली ग्राम पंचायत का प्रभार ना दिया, जो बदला के लिए प्रभार चाह रहा है। चूंकि मनी और पावर में इतनी ताकत होती है, कि अच्छे-अच्छे अधिकारी भी गलत काम करने को तैयार हो जाते है। कहा जाता है, कि अगर भाजपा के एक पदाधिकारी का हस्तक्षेप नहीं होता तो इस सचिव की इतनी हिम्मत नहीं पड़ती कि वह भ्रष्टाचार कर सके। अब सवाल यह है, कि जब नकली प्रधान और भाजपा के पदाधिकारी ही भ्रष्टाचारियों का साथ देगें और खुद भ्रष्टाचार करेगें तो सरकार और पार्टी की बदनामी तो होगी ही। वर्तमान समय में इनके आका की भूमिका एक एमएलसी साहब निभा रहें हैं। यह एमएलसी साहब लखनउ में बैठकर भ्रष्ट प्रधानों और सचिवों की सिफारिश करते रहते है। जिस तरह भ्रष्ट प्रधान और सचिव होते हैं, ठीक उसी तरह उनके आका भी होते हैं।