जिला पंचायत ने गंाधीजी का ही नहीं, पूरी दुनिया का अपमान किया
-जिस तरह इन सभी ने मिलकर गांधीजी की 76 साल पुरानी प्रतिमा को शोचालय के बगल के कूढ़े के कचरें में फेका उससे लोगों में गुस्सा और आक्रोष बढ़ता ही जा रहा
-अगर मांग के मुताबिक सभी लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं हुआ तो 27 दिसंबर 24 से कांग्रेस के लोग धरना-प्रदर्शन करेंगे, फिर यह आंदोलन जिले का ना होकर प्रदेश और देश स्तर का हो जाएगा
-मामला मीडिया में आने के बाद हर कोई जिला पंचायत के जिम्मेदारों के खिलाफ विधिक कार्रवाई की मांग उठ रही
-आंदोलनकारियों की ओर से कोतवाली में तहरीर देने और डीएम को ज्ञापन देने की भी घोषणा की गई
बस्ती। जिस जिला पंचायत के अध्यक्ष, एएमए, इंजीनियर और जेई के लिए लक्ष्मी ही सबकुछ हो, वे लोग गांधीजी की अहमिसत क्या जाने और जब अहमियत नहीं जानेगें तो सम्मान कैसे करेंगें? इन लोगों को तो गांधीजी की प्रतिमा में भी नोट दिखाई दिया, तभी तो लक्ष्मी के लिए भवन को जबरिया जर्जर बताकर उसे ध्वस्त कराने का ठेका अपने चहेते ठेकेदार शिव प्रसाद चौधरी को कौड़ी के भाव में दे दिया, और ठेकेदार ने गांधीजी का ऐसा अपमान किया, जिसे सुन और पढ़ दुनिया के लोग चकित है। यह लोग मनी और पावर में इतने नषे में चूर रहते हैं, कि इन्हें गंाधीजी के बलिदान तक याद नहीं रहता। यह भी पता नहीं रहता जिसका इन लोगों ने अपमान किया उससे पूरी दुनिया कितना प्रेम और सम्मान करती है। गांधीजी को क्या मालूम रहा होगा कि जिसकी प्रतिमा दुनिया के 148 देषों में लगी हो, उन्हीं की प्रतिमा जिला पंचायत के जिम्मेदार कचरे के ढे़र में फेक देगें। जो 43 जिला पंचायत सदस्य गांधीजी की प्रतिमा पर फूल माला चढ़ाते थे, उनमें एक ने भी यह जानने और देखने का प्रयास नहीं किया कि गांधीजी की प्रतिमा सुरक्षित है, या असुरक्षित? देखा जाए तो इन सभी ने भी जिला पंचायत के जिम्मेदारों की तरह गांधीजी की खोजखबर ना लेने का अपराध किया है। इन सभी को भी लक्ष्मी से उतना ही प्रेम रहता है, जितना अध्यक्ष, एएमए, इंजीनियर, जेई और ठेकेदार को रहता है। इनमें अगर किसी ने भी अपने सामाजिक दायित्वों का निवर्हन और गांधी प्रेम दिखाया होता तो आज गांधीजी कचरे के ढ़ेर में नहीं मिलते। मामला बढ़ता और फंसता देख ठेकेदार आंदोलनकारियों को मैनेज करने में लगें हैं, चाहें जैसे मैनेज हो, और धरना-प्रदर्शन ना हो, इसके लिए पूरा जिला पंचायत लगा हुआ है। लक्ष्मी का लालच भी दिया जा रहा है। अगर कांग्रेसी मैनेज हो गए, जैसा की उम्मीद नहीं हैं, तो फिर जिले से कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो जाएगा। मीडिया भी फिर कभी इन लोगों का साथ नहीं देगी। वैसे गांधीजी की प्रतिमा को कचरे के ढ़ेर से निकालने में अहम भूमिका निभाने वाले गिरिजेश पाल और बाबू राम सिंह का कहना हैं, एफआईआर तो हर हाल में दर्ज होगा, प्रशासन भले ही ना दर्ज कराए कोर्ट से दर्ज होगा।
जिला पंचायत को लूटने और उसे बर्बाद करने में ठेकेदारों का महत्वपूर्ण भूमिका रहा। इसमें पहले स्थान पर कृष्ण कुमार गुप्त उर्फ किस्सू, शिवप्रसाद चौधरी और सुधारक ओझा का नाम है। एक तरह से यह तिकड़ी पूरे जिला पंचायत का संचालन करती हैं, इनकी मजबूती और दंबगई के आगे एएमए नतमस्तक रहते हैं। आज जो जिला पंचायत के जिम्मेदारों की किरकारी हो रही है, वह भी ठेकेदारों के कारण ही हो रही है। किस्सू का आय और हैसियत प्रमाण-पत्र को ही फर्जी बताया जाता हैं, इन्होंने तथ्यों को छिपाया और दोनों प्रमाण-पत्र बनाया, जिसकी जांच होने जा रही है। इनके खिलाफ वाहन को जलाने, आगजनी करने और बलबा करने तक केस दर्ज है। यह चार्जशीटेड हैं, अभी भी यह मुकदमें से बरी नहीं हुए है। फ्राड के केस में इन पर मुकदमा भी कायम हो सकता है। यह लोग अब तक अरबों रुपया का चूना अध्यक्षों, एएमए, इंजीनियर्स और अवर अभियंताओं के साथ मिलकर लगा चुके है। वर्तमान में जिला पंचायत में चौधरियों का राज है। अध्यक्ष चौधरी, एएमए चौधरी और ठेकेदार चौधरी। इन्हीं लोगों के ईर्द गिर्द जिला पंचायत चल रहा है। जान बूझकर चौधरी एएमए को लाया गया, ताकि जिला पंचायत को जैसे चाहें वैसे लूटा जा सके। अधिकांष जिला पंचायत सदस्य, चौधरियों के लूटपाट गैंग का हिस्सा है। इनमें प्रमुख रुप से गिल्लम चौधरी का नाम लिया जाता है। इनकी किस्मत खराब थी, वरना आज यह जिले के प्रथम नागरिक की कुर्सी पर बैठे होतेे, उसी हिसाब से इन्होंने जिला पंचायत सदस्यों को खरीदने में पैसा भी लगाया, बहरहाल, इनका पैसा तो इन्हें सूदसमेत मिल गया, किस तरह मिला, यह सभी लोग जानते है। वैसे देखा जाए तो गिल्लम चौधरी ही चेयरमैन की कुर्सी के लायक है। लेकिन डर्टी राजनीति ने उनका हक छीन लिया। अनेक जिला पंचायत सदस्य आज भी कहते हैं, कि अगर गिल्लम चौधरी चेयरमैन होते तो इतनी लूटपाट नहीं होती, और कुर्सी की गरिमा बरकरार रहती। बीच में कई ऐसे अवसर भी आए लेकिन बिकने के खेल ने पूरे खेल को ही बिगाड़ दिया। यह भी सही है, कि अगर गिल्लम चौधरी पूरी तरह ईमानदार होते तो आज जिला पंचायत की सूरत और सीरत कुछ और होती, तब गांधीजी कचरे के ढ़ेर में ना पाए जाते। जब तक विकास मिश्र एएमए रहे, तब तक अध्यक्षजी की गाल उस तरह नहीं गली जिस तरह यह चाहते थे, लेकिन जैसे ही चौधरी एएमए आ गए अध्यक्षजी की ना सिर्फ पूरी की पूरी दाल गल रही हैं, बल्कि पहले से अधिक अब सकून भी महसूस कर रहें है। जातिवाद ने ऐसा जहर बोया कि बिना किसी रोकटोक के फर्जी भुगतान से लेकर टेंडर देने की प्रक्रिया प्रारंभ हो गईं, और जब से अध्यक्ष को सपा के सांसद राम प्रसाद चौधरी, विधायक कबिंद्र चौधरी, राजेंद्र चौधरी और महेद्र यादव का साथ मिला तब से इन्हें विधायक अजय सिंह की आवष्यकता ही नहीं, यही वह अजय सिंह हैं, जिन्होंने अध्यक्ष के लिए बैठक में अध्यक्ष का आखं दिखाने वाले की आंख निकाल लेने की बात कही थी। तब विधायकजी अध्यक्ष के लिए भगवान से कम नहीं थे, उसके बाद अध्यक्ष की नजर में विधायकजी की क्या अहमियत रह गई, यह बताने वाली बात नहीं हैं, बल्कि समझने वाली है। कहा जाता है, जो व्यक्ति पूर्व सांसद और पूर्व विधायक संजय प्रसाद जायसवाल का नहीं हुआ, उस व्यक्ति से वफा की उम्मीद करना ही बेमानी है। इसी लिए अध्यक्ष के बारे में कहा जाता हैं, कि यह किसी के भी नहीं हैं, उन लोगों के भी नहीं हैं, जिन लोगों ने इन्हें फर्ष से अर्स तक पहुंचाया।
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