बस्ती। अधिकारियों को ज्ञापन देते समय अनेक पत्रकारों ने कहा कि गोसेवा आयोग के उपाध्यक्ष महेश शुक्ल ने जो कुछ भी पत्रकार विपिन बिहारी त्रिपाठी और उनके परिवार के साथ किया, अगर वही पत्रकार का परिवार शुक्लजी के साथ किया होता तो कब का बुलडोजर चल गया होता, जेल की हवा खा रहें होते, लेकिन यहां पर एफआईआर दर्ज करने को कौन कहे, पत्रकारों से ज्ञापन तक नहीं लिया गया। जिले के पत्रकारों को इस पर गहन विचार करना होगा, कि क्या वह इस लायक भी नहीं कि प्रशासन उनसे ज्ञापन भी न लें? प्रशासन अगर पत्रकारों का ज्ञापन देने के अधिकार से वंचित रखता तो इसे किसी भी दशा में उचित नहीं माना जा सकता है। इसे लेकर पत्रकारों में बहुत ही पीड़ा है। कहा भी गया कि सिर्फ ज्ञापन ही तो था, और इस तरह के रोज न जाने कितने ज्ञापन प्रशासन लेता है। जो पत्रकार वर्ग, प्रशासन की रात दिन सेवा करता है, अगर उसी वर्ग का ज्ञापन न लिया जाए और उनकी पीड़ा तक को न सुनी जाए, तो पत्रकारों में पीड़ा होना लाजिमी है। इसी दर्द को लेकर पत्रकारों ने प्रशासन की मनमानी नहीं चलेगी, का नारा लगाना पड़ा। पत्रकार साथी यह भी कह रहे थे, कि जब ज्ञापन नहीं लिया तो कार्रवाई भी नहीं होगी। पत्रकार समूह को ज्ञापन दिए बिना वापस जाना पड़ा। पत्रकार साथियों का कहना रहा कि अगर मैडम दो मिनट पत्रकारों को दे देती को क्या नुकसान हो जाता? मजबूरी में पत्रकारों को कमिष्नर कार्यालय तक पैदल मार्च करना पड़ा। फिर वहां से पैदल एसपी कार्यालय आना पड़ा। एसपी साहब ने न सिर्फ सबको अंदर बुलाकर ज्ञापन लिया, बल्कि बैठाकर पीड़ित परिवार की बात सुनी और कार्रवाई करने का भरोसा भी दिया। बाहर निकलकर पत्रकारों ने कहा भी कि हम सभी को मालूम हैं, कि कार्रवाई नहीं होगी, लेकिन कम से कम एसपी साहब ने हम लोगों की बात तो सुनी। बात यहां पर कार्रवाई करने या न करने की नहीं, बल्कि पीड़ित पत्रकारों की समस्या सुनने की है। अगर भाजपा के राज में पत्रकारों की नहीं सुनी जाएगी तो पत्रकारों के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और नहीं हो सकता। इसी लिए पत्रकार कह रहे हैे, कि इस मामले में ‘मायावती’ के षासनकाल का कोई जबाव नहीं। जिस भाजपा राज में नेता अगर कानून को अपने हाथ में ले ले रहें है, तो उस राज का भगवान ही मालिक। सही क्या है, गलत क्या हैं, यह सभी को मालूम है। जमीन किसकी है, और किसकी नहीं, यह भी सभी को मालूम है। लेकिन इसका निर्णय कैसे होगा? कौन करेगा? जाहिर सी बात हैं, कि जब तक पैमाईश नहीं होगी असलियत सामने नहीं आएगी। अधिकारियों को ज्ञापन देने के बाद पीड़ित और पत्रकार साथियों को लग गया कि भाजपा राज में न्याय पाना मुस्किल है। कहते हैं, कि जब पत्रकारों को न्याय नहीं मिलेगा तो आम जनता का तो भगवान ही मालिक। बार-बार कहा जा रहा है, कि किसी को भी कानून को अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। जो भी कानून अपने हाथ में लेता है, उस पर सवाल उठता है, और उठता रहेगा। किसी को यह नहीं लगना चाहिए, कि अगर उसके साथ सरकारी मशीनरी हैं, तो उसका कुछ नहीं होगा। मान लीजिए कि अगर कुछ नहीं हुआ, तो ‘सोषल लास’ तो होगा ही। इसी नुकसान से सबको बचना चाहिए, क्यों कि सबकी भरपाई हो सकती है, लेकिन जो सामाजिक क्षति होती है, उसकी भरपाई नहीं हो सकती है। सीधा सा मतलब खुद चैन की नींद सोइए और दूसरे को भी सोने दीजिए। जो लोग मनि और पावर का घमंड दिखाते हैं, उसे खोने में अधिक समय नहीं लगता। सब कुछ भूल जाइए लेकिन अपने अतीत को मत भूलिए। वही व्यक्ति समाज में इज्जत, शोहरत और पैसा कमाता है, जो अपने अतीत को हमेशा याद रखता है। ऐसे मामलों में पत्रकारों की पत्रकारिता को दोश देना ठीक नहीं होगा। क्यों कि जिस तरह नेता अपना काम करता है, पत्रकार भी उसी तरह अपना काम करता है। अक्सर देखा गया है, कि जब भी इस तरह की घटना होती तो सबसे पहले पत्रकारों पर ही सवाल खड़ा किया जाता है, ऐसा लगता है, कि मानो कांड नेताजी ने नहीं बल्कि पत्रकार ने किया हो। भाई मेरे एक पत्रकार किसी से क्या लें लेता हैं, वह न तो किसी के घर में डांका डालता है, और न सरकारी धन ही लूटता है। पत्रकारों के पास तो कोई निधि भी नही होती जिसे वह बेच सके, या फिर जीएसटी में कमीशन मांग सके। लेकिन नहीं, उसके बाद भी हर कोई पत्रकारों को ही अपना निशाना बनाते है। जेल में सड़वाने और नेस्ताबूत करने तक की वह लोग धमकी देते हैं, जो सिर से पांव तक भ्रष्टाचार में डूबे रहते है।
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