बस्ती। कहना गलत नहीं होगा, कि आम जनता, नेताओं और अधिकारियों के कामकाज से अधिक पत्रकारों के क्रियाकलापों की समीक्षा करती है, जैसे ही उन्हें मीडिया की भूमिका संदिग्ंध नजर आती है, उगंली उठाने में देरी नहीं लगातें। जब से हर मोबाइल वाला व्यक्ति पत्रकार बन गया तब से मीडिया की कलई खुलने लगी। मीडिया के बारे में लोगों की सोच का पता इस बात से चलता है, कि जब भी किसी पत्रकार के खिलाफ कोई कार्रवाई या फिर उनके साथ कोई मारपीट की घटना होती है, तो दुख और अफसोस जाहिर करने के बजाए यह कहते हुए मिलते हैं, कि अच्छा हुआ पीटा गया। जिस समाज में मीडिया के पीटे जाने पर अफसोस नहीं बल्कि खुशी जताई जाती है, तो इसे पूरे मीडिया जगत को गंभीरता से लेना चाहिए, और सुधार करने के साथ छवि बनाने पर जोर देना चाहिए। क्यों कि वाकई यह मीडिया के लिए परेशान और हैरान करने वाली बात है। इसका मतलब जनता मीडिया, नेता और पुलिस में कोई फर्क नहीं समझती। सुधरने के बजाए मीडिया भी कभी न सुधरने वाली नीति पर चल पड़ी है।
जिस तरह दो-तीन दिन पहले कुदरहा के मीडिया के बारे में यह लिखा गया, कि ‘क्या यहां के पत्रकारों का जमीर बिक चुका’ है। इसे लेकर कुदरहा के राज कुमार राज कम्पयूटर वाले ने लिखा कि ‘‘कुछ लोग बिना जिम्मेदारी समझे ही पत्रकार बनने का टैग लगा लेतें है, जिसके अपने घर की व्यवस्था ठीक से नहीं चल रही हैं, वह भी समाज को दिशा देने की बात कर रहा, कुदरहा में कुछ ऐसे तथाकथित पत्रकार हैं, जो खबर ढ़ूढने से ज्यादा चाय पिलाने वाले को ढ़ूढते फिरतें है’’। यह सही है, कि जब हम दो किलो टमाटर, लिटटी चोखा, गैस सिलेंडर और लिफाफा के चक्कर में पड़ जाएगें तो फिर पत्रकारिता कहां से कर पाएगें। कहां से हम समाज के हीरो बन पाएगें। समाज का एक वर्ग भी ऐसा है, जो पत्रकारों की मजबूरी और समस्या जानता और समझता है, लेकिन यह वर्ग यह भी कहता और चाहता है, कि भाई कम से कम पूरा का पूरा खबर तो मत घोंट लिया करो। कुछ तो जिम्मेदारी दिखा दिया करो। जिस तरह कुदरहा में चौकी इंचार्ज के निलंबन के बारे में यहां की मीडिया तीन दिन तक खबर को दबाए रखा, उसे लेकर मीडिया की खूब किरकीरी हुई। सवाल उठा कि क्यों नहीं एक भी पत्रकार ने अपनी जिम्मेदारी को निभाया? क्या सभी लोगों का जमीर चौकी इंचार्ज ने खरीद लिया था? जिस तरह कुदरहा के मीडिया के बारे में इस घटना को लेकर कमेंट किए गए, ठीक उसी तरह का कमेंट हर्रैया के पत्रकारों के बारे में भी ‘महाकाल टी सेंटर’ के मनोनीत सभासद रवि गुप्त के बारे में किया गया। कुदरहा वालों का जमीर तो तीन दिन बाद जागा, लेकिन हर्रैया के पत्रकारों का जमीर 15 दिन बाद भी नहीं जागा। आषनाई के चक्कर में नौकर को जहर देकर मार देने की घटना को किसी भी पत्रकार ने खबर नहीं बनाया। यहां तक कि मृतक का भाई तहरीर लेकर पुलिस के पास जाता हैं, और सीधे आरोप लगाता है, उसके भाई की हत्या रवि गुप्त और मृतक की पत्नी रुचि ने आशनाई के चक्कर में कर दिया, तब भी खबर नहीं बनती। पूरा का मीडिया मीडिया खामोश रहता है। जब जिले से इसकी खबर निकलती है, तो क्षेत्र के लोग जान पाते हैं, कि उनके क्षेत्र में ऐसी भी घटना हुई। सवाल उठ रहा है, कि क्या महाकाल टी सेंटर वाला इतना मजबूत हो गया कि वह हर्रैया के धुरंधर कहें जाने वाले पत्रकारों का मुंह बंद कर सकें। क्षेत्र में बड़े-बड़े अखबार के कार्यालय खुलने से क्या फायदा? जब पत्रकार इतनी बड़ी घटना पर अपनी कलम न चला पाएं। पता नहीं यहां के पत्रकारों को घरेलू गैस की समस्या क्यों नहीं दिखाई देती? पता नहीं क्यों 100 बेड एमसीएच हर्रैया अस्पताल में हो रहे लूटपाट न तो दिखाई देता और न सुनाई देता? सवाल उठ रहा है, कि पत्रकार को लिफाफा, गैस सिलेंडर चाहिए या फिर खबर। यह वही हर्रैया क्षेत्र हैं, जहां पर कभी पत्रकारों की तूती बोलती थी, अधिकारी डरते थे, गांजा और स्मैक की तस्करी करने वाले कांपते थे। पुलिस तक डरती थी। नगर पंचायत अध्यक्ष तक गलत काम करते डरते थे। ऐसा भी नहीं कि पत्रकारों का जमात गायब हो गया, बस उनकी प्राथमिकताएं बदल गई। हर्रैया उलटने की क्षमता रखने वाले पत्रकार पता नहीं कहां गुम हो गए। तेवर दिखाने वाले पत्रकारों को यह तो संस्थान ने या फिर यहां के नेताओं ने कमजोर कर दिया, क्षेत्र में खुले आम अखबार की प्रतियां नेताओं के ईशारे पर जलाई जाती है, उसके बाद भी नेता की कलई खोलने के बजाए, उनकी दरबारी करने लगें। जबाव देने के बजाए, उनकी जीहूजूरी करने लगें। जब भी हर्रैया के किसी पत्रकार के साथ कोई घटना होती तो एकता दिखाने के बजाए तितर बितर हो जाते हैं, जिसका फायदा घटना को अंजाम देने वाले उठाते है। यहां पर हर्रैया के सभी पत्रकारों के बारे में नहीं कहा जा रहा है, कुछ ऐसे भी पत्रकार हैं, जो आज भी किसी नेता की जीहूजूरी करने नहीं जाते हैं, ऐसे लोग जेल चले गए, लेकिन अपने कलम की धार को कमजोर नहीं होने दिया। जब किसी पत्रकार का मनोबल गिर जाता है, तो वह उठ नहीं पाता। जरुरत हैं, मनोबल को उंचा रखना है। ऐसे भी पत्रकार हैं, जिनका विरोध उनके घर वाले करते हैं, फिर भी वह ईमानदारी से पत्रकारिता करने का प्रयास रहे है। जब पत्रकार विज्ञापन खरीदेगा और बेचेगा तो पत्रकारिता पर दाग लगना लाजिमी है। विज्ञापन को अधिकार तक ही सीमित रखिए, कारोबार मत बनाइए। वरना सब्जी बेचने और अखबार वालों में कोई खास फर्क नहीं रह जाएगा।
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