‘फर्जीवाड़ा’ में फंस गए ‘रेडक्रास’ सोसायटी के ‘अध्यक्ष’


-एक्सरे टेक्निीसियन रफीउदीन ने मेडीवर्ल्ड के डा. प्रमोद कुमार चौधरी के खिलाफ डिग्री चुराकर उसका गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगाकर एफआईआर लिखवाने की तहरीर दी

-रफीउदीन का कहना है, कि जब उसे पता चला कि मेडीवर्ल्ड वालों ने उनकी डिग्री का गलत इस्तेमाल किया तो गूगल पर सर्च किया, तब पता चला कि मेंडीवर्ल्ड अस्पताल कहां

-इसके शिकायत पर नोडल डा. एसबी सिंह ने अस्पताल को नोटिस जारी कर एक दिन में जबाव मंागा, लेकिन आठ दिन बीत गए, जबाव नहीं दिया

-जो रफीउदीन का कहना है, कि उनका न सिर्फ डिग्री को चोरी किया गया, बल्कि उनके नाम से फर्जी शपथ-पत्र भी डा. प्रमोद कुमार चौधरी ने बनाया

-कहा कि पिछले तीन साल से वैकंसी निकलने का इंतजार कर रहा हूं,, कहा कि इस फर्जीवाड़े पर इसके नोडल और पूरा सीएमओ कार्यालय मिला हुआ, अगर नोडल सत्यापन किए होते तो असलियत का पता चलता, मोटा लिफाफा मिल गया और लाइसेंस दे दिया

बस्ती। रेडक्रास सोसायटी के अध्यक्ष और मेडीवर्ल्ड अस्पताल के संचालक डा. प्रमोद कुमार चौधरी की मुस्किलें कम होने के बजाए और बढ़ती जा रही है। हाल ही में रेडक्रास सोसायटी के हरीश सिंह ने इनके खिलाफ 20 लाख के हर्जाने का दावा ठोंका और अब डुमरियागंज निवासी रफीउदीन ने इनके उपर एक्सरे टेक्निसिएन की डिग्री चुराने का आरोप लगाते हुए मुकदमा दर्ज करने की तहरीर दी है। वैसे तो दोनों मामले काफी गंभीर हैं, लेकिन डिग्री की चोरी करने और फर्जी षपथ-पत्र बनवाने के मामले में इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो सकता है। रफीउदीन का कहना है, कि आज तक वह डा. प्रमोद चौधरी से नहीं मिला, मुझे तो इनके अस्पताल का नाम गूगल से पता चला। कहा कि मेरी फर्जी डिग्री इनके पास कैसे पहुंच गई, और नोडल ने बिना सत्यापन के कैसे लाइसेंस जारी कर दिया और बिना मेरे हस्ताक्षर के कैसे नोटरी शपथ-पत्र बन गया? मेरी समझ में नहीं आ रहा है। कहा कि सभी ने मिलकर मेरी डिग्री का गलत इस्तेमाल किया, मेरे साथ छल किया। कहा कि जब हमने किसी को अपनी डिग्री दी ही नहीं तो कैसे हमारी डिग्री मेडिवर्ल्ड अस्पताल में लगाकर उन्हें लाइसेंस जारी कर दिया गया? देखा जाए तो इस फर्जीवाडे़ में डा. प्रमोद चौधरी से लेकर नोडल और नोटरी शपथ-पत्र जारी करने वाले फंस रहे है। खासबात यह है, कि शपथ-पत्र तो रफीउदीन के नाम का बनाया गया, लेकिन जहां पर शपथी का हस्ताक्षर होता उसे खाली छोड़ दिया गया, यानि बिना शपथी के हस्ताक्षर के नोटरी शपथ-पत्र बनवा दिया गया। बताया जाता है, कि इस पूरे फर्जीवाड़े के खेल में इसके नोडल ही पूरी तरह जिम्मेदार है। चूंकि इन लोगों को मोटा लिफाफा चाहिए, इस लिए इनसे गलत काम करवाना मुस्किल नहीं होता। इनके ही निरीक्षण और सत्यापन रिपोर्ट पर लाइसेंस जारी होता है, इस लिए जितने भी गलत काम हुए हैं, उन सभी के लिए नोडल को ही जिम्मेदार माना जाना चाहिए। कार्रवाई भी इन्हीं के खिलाफ ही होनी चाहिए, चूंकि पूरा सीएमओ कार्यालय बिका होता है, इस लिए कार्रवाई नहीं हो पाती। अगर कार्रवाई होती तो आधे से अधिक अस्पताल, अल्टासाउंड और पैथालाजी बंद हो गए होते। नियम तो यह भी कहता है, कि अगर कोई नोडल को गुमराह करके लाइसेंस प्राप्त किया गया तो नोडल उसके खिलाफ एफआईआर भी दर्ज करा सकतें हैं, चूंकि नोडल खुद बेईमान और चोर होते हैं, इस लिए एफआईआर कराना तो दूर की बात कार्रवाई तक नहीं करते। चूंकि इस मामले में कोई लीपापोती नहीं कर सकता। हालांकि आदतन सीएमओ कार्यालय डा. प्रमोद चौधरी को बचाने का अथक प्रयास करेगें, चूंकि मेडीवर्ल्ड वाले सीएमओ कार्यालय के दुलुरवा है। इस लिए बचाने का हर संभव प्रयास करेगें, लेकिन जब बात सीएमओ और नोडल पर आ जाएगी तो बचना और बचाना दोनों मुस्किल हो जाएगा। अगर इस मामले में एफआईआर हो गया, जिसकी संभावना अधिक है, तो इसमें कई लोग फंस जाएगें। इसके वर्तमान नोडल डा. एसबी सिंह ने तो नोटिस जारी कर दिया, लेकिन अभी तक नोटिस का जबाव नहीं दिया। अगर मेडीवर्ल्ड वाले सही होते तो कब का जबाव दे दिए होते। कहने का मतलब सबसे अधिक नुकसान इसमें मेडीवर्ल्ड वालों का होगा, इज्जत भी जाएगी, पानी की तरह पैसा भी बहाना पड़ेगा और पुलिस का चक्कर अलग से लगाना पड़ेगा। रेडक्रास सोसायटी की अलग से बदनामी होगी। अब देखने वाली बात यह होगी कि रेडक्रास की टीम अपने अध्यक्ष की कितनी मददगार साबित हो सकती है। पहले इस डिग्री का इस्तेमाल इनके भाई प्रवीन चौधरी ने किया, उनके न रहने पर डा. प्रमोद चौधरी ने डिग्री का गलत इस्तेमाल किया। एक नामचीन डाक्टर को अगर अस्पतान छोड़कर कोर्ट कचहरी और पुलिस का चक्कर लगाना पड़े तो कहीं न कहीं गलत होने का संकेत मिलता है। वैसे इसे सिर्फ आरोप ही नहीं मानना चाहिए बल्कि प्रमाणित आरोप मानना चाहिए। क्यों कि सारे साक्ष्य इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं, कि मेडीवर्ल्ड वालों ने कुछ तो गलत किया। कितना किया, यह जांच का विषय है। इनके अस्पताल का पंजीकरण तक निरस्त हो सकता है। सवाल यह भी उठ रहा है, कि जब इतने नामचीन लोग पैसा कमाने के लिए फर्जीवाड़ा करंेगे, तो जो नामचीन नहीं हैं, अगर उन्होंने फर्जीवाड़ा कर लिया तो क्या बुरा किया? एक सच यह भी हैं, कि अधिकांश नामचीन और पैसे वालों को ही पैसे की भूख होती है। इनका नाम चाहे हजार करोड़ के क्लब में शामिल हो जाए, फिर भी इन्हें पैसा चाहिए, वह भी अनैतिक रुप से, इसी पैसे की चाहत ने न जाने कितने नामचीन लोगों की इज्जत का जनाजा निकल चुका।