बस्ती। अगर किसी जिले के डीएम और सीडीओ को इस बात का पता न चले कि उसके अधिकारी योजनाओं को लूट रहे हैं, तो इसे डीएम और सीडीओ के सूचना तंत्र में चूक माना जाएगा, अगर इसे हम और आप यह कहें, कि विभागीय अधिकारी, डीएम और सीडीओ से अधिक चालाक और चतुर है, तो गलत नहीं होगा। यही उप निदेशक कृषि और उनके लूटपाट गैंग कर रहें है। इस विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को इस बात का भी डर नहीं लगता कि अगर योजना अध्यक्ष/डीएम और सचिव/सीडीओ को पता चल जाएगा तो उनका क्या होगा? इन लोगों को अच्छी तरह पता है, कि जब तक उनके भ्रष्ट मंत्री रहेगें, तब तक डीएम और सीडीओ कुछ नहीं कर पाएगे। अगर ऐसा नहीं होता तो पहले ढैंचा खाद का घोटाला किया, फिर धान की बीज का घोटाला किया और उसके बाद मिक्स हरी खाद का घोटाला किया, यह लोग घोटाले पर घोटाला करते जा रहे हैं, और डीएम और सीडीओ को पता ही नहीं चल रहा। सवाल उठ रहा है, कि जब इतने घोटाले होगें तो जमीन उपजाउ कैसे होगी? और जब जमीन उपजाउ नहीं होगी, तो पैदावार नहीं होगें, और जब पैदावार नहीं होगा तो किसानों की आय दोगुनी भी नहीं होगी, सरकार तो चाहती है, कि किसानों की आमदनी दोगुनी हो, लेकिन जब तक डीडी, जेडीए और जिला कृषि अधिकारी जैसे भ्रष्ट अधिकारी रहेगें आय दोगुनी होने को कौन कहे, उत्पादन ही कम हो जाएगा। पिछले कई सालों से देखा जा रहा है, कि जिस तरह किसानों के नाम पर कभी यंत्रीकरण तो कभी खाद तो कभी निःशुल्क ढैंचा, हरी खाद एवं धान की बीज का घोटाला हो रहा है, उससे सबसे अधिक नुकसान किसानों का ही हो रहा है। सरकार की छवि अलग से खराब हो रही है। लाभ सिर्फ और सिर्फ अधिकारियों और कर्मचारियों का हो रहा है, नुकसान किसानों का सरकारी धन का हो रहा है। योजना का दुरुपयोग न हो इसके लिए सरकार ने योजना की रखवाली के लिए डीएम को अध्यक्ष और सीडीओ को सचिव बनाया, अगर डीएम और सीडीओ मिलकर भी योजनाओं में चोरी को नहीं रोक पा रहे हैं, तो फिर ऐसी रखवाली का क्या मतलब? सच तो यह है, कि योजनाओं की रखवाली या फिर मानिटरिगं सिर्फ बैठकों तक ही सीमित रहती है, अगर डीएम और सीडीओ योजना का स्थलीय निरीक्षण करते रहते तो भय बना रहता है, और तब किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ भी मिलता। मंडल में अगर कृषि योजनाओं में लूटपाट हो रहा है, तो इसके लिए ‘रीलबाज’ और ‘रंगबाज’ जेडीए को जिम्मेदार माना जा रहा है, कहा जाता है, कि जब इन्हें रील बनाने से फुर्सत मिलेगी, तभी तो यह मानिटरिगं करेगें, जब कार्यालय बैठे इन्हंे इनका हिस्सा मिल जाता है, तो क्यों स्थलीय निरीक्षण करने जाएगें? कुछ दिन पहले आप लोगों ने किसानों को मिलने वाले निःशुल्क लगभग 60 लाख की लागत का दो हजार क्ंिवटल ढैंचा खाद के घोटाले के बारे में पढ़ा या सुना होगा, यह कभी घोटाला चर्चा में नहीं आता अगर डीडी साहब विषय वस्तु विशेश्रज्ञ यादवजी के कहने पर घोटाला करने वाले हर्रैया, कुदरहा, सल्टौआ, विक्रमजोत और परसरामपुर के कृषि बीज गोदाम प्रभारियों से पांच-पांच लाख की डिमांड न करते। अगर दो-दो लाख लेकर बैठ जाते तो घोटाले का उजागर नहीं होता। बहरहाल जिन पांचों स्टोर प्रभारियों ने दो क्ंिवटल ढैंचा का घोटाला किया, उन्हीं लोगों ने 500 किलो हरी खाद और 400 किलो धान बीज का घोटाला किया। जांच से बचने और कागजी कोरम को पूरा करने के लिए दो-चार किसानों के खेतों में जाकर फोटो खिंचवा लेते हैं, और उसी फोटो को विभाग के पोर्टल पर अपलोड कर देते है।