‘बेनकाब’ हो गया ‘बीडीए’ को ‘लूटने’ वाला ‘गैंग’!

बस्ती। अगर बीडीए का सचिव ही भ्रष्टाचार करने वाले गैंग का लीडर बन जाएगें और उसके संरक्षक उपाध्यक्ष होगें तो बीडीए को भ्रष्टाचार से मुक्त और भवन स्वामियों को भ्रष्टाचारियों से कौन बचाएगा? बीडीए के इतिहास में लिखा जाएगा कि तत्कालीन बीडीए के सचिव एंव एडीएम कमलेश चंद्र, एक्सईएन पंकज पांडेय, एक्सईएन स्ंादीप कुमार, एई अरुण कुमार, जेई आरसी षुक्ल, मुख्य लिपिक महेंद्र सोलकी, कमलेश मिश्र एवं अवनीष सहित अन्य ने मिलकर एक ईमानदार जेई अनिल कुमार त्यागी को अपने रास्ते से हटाने के लिए साजिश रची, ताकि लूटपाट का सिलसिला चलता रहें। काली कमाई के रास्ते में रोड़ा बन चुके इस जेई को इन लोगों ने मिलकर इतना प्रताड़ित किया कि वीआरएस लेेने को मजबूर होना पड़ा। अनेकों बार मारपीट और हमले तक करवाए गए, काली कमाई का भेद न खुल जाए, इस लिए मारपीटकर मोबाइल तक छीन लिया। फर्जी आरोप लगाकर षासन से जांच तक करवा दिया, और यह सब कुछ इस लिए किया, ताकि गैंग को लूटने की खुली आजादी मिल सके। गैंग के लोगों ने कमाया तो करोड़ों, लेकिन यह सब मिलकर भी एक ईमानदार जेई अनिल त्यागी का कुछ नहीं बिगाड़ सके, अलबत्ता गैंग के लोगों पर ही कार्रवाई की तलवार लटक रही है। यह वही जेई अनिल त्यागी हैं, जो निलंबन के बाद सात साल तक इस लिए बहाल नहीं हुए क्यों कि इन्होंने बाबू को साढ़े सात हजार रिष्वत नहीं दिया। लूटपाट में बाधक बने तत्कालीन जेई अनिल कुमार त्यागी को गैंग के लोगों ने फंसाने की जो साजिष रची, उसका दांव उल्टा पड़ गया, षासन ने जेई को सारे आरोपों से बरी कर दिया, एक तरह से गैंग के लोगों की साजिष एक ईमानदार जेई के सामने नाकाम हो गई। सत्य की जीत हुई और असत्य की हार। जेई पर जितने भी भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे, उनके एक भी आरोप साबित नहीं हुआ। खासबात यह है, कि जिसने भी आरोप लगाया, वह खुद भ्रष्टाचार में शामिल रहा। इसका खुलासा अपर आयुक्त की जांच में हुआ।

तत्कालीन आईएएस अधिकारी एवं बीडीए के सचिव पीपी मीणा ने थोड़े ही कार्यकाल में जो ईमानदारी दिखाई और जिसके चलते सैकड़ों भवन स्वामियों को बीडीए के भ्रष्टाचार से मुक्ति मिली, बीडीए के लोगों की काली कमाई बंद हो गई, उनकी ईमानदारी की मिसाल आज भी दी जाती है। अगर कुछ समय यह और रह गए होते तो पंकज पांडेय, संदीप कुमार, एई अरुण शर्मा, आरईडी के जेई आरसी शुक्ल, वरिष्ठ लिपिक महेंद्र सोलंकी जैसे भ्रष्ट लोगों को जिला छोड़कर जाना पड़ता। यही कारण है, कि मीणाजी को जिले की जनता बस्ती के डीएम एवं बीडीए के उपाध्यक्ष के रुप में देखना चाहती है। अब जरा अंदाजा लगाइए कि बीडीए को साढ़े तीन करोड़ से अधिक चूना लगाने वाले विनियमित क्षेत्र के भ्रष्ट जेई भगवान सिंह और चंद्र प्रकाश चौधरी के खिलाफ सचिव ने कार्रवाई करने के लिए एक भी पत्र नहीं लिखा, और न ही पैसा वापसी के लिए कोई कार्रवाई किया, अलबत्ता एक ऐसे ईमानदार जेई के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए सारा जोर लगा लगा दिया, जिसने अपने कार्यकाल में 1700 से अधिक अवैध निर्माण करने वालों के खिलाफ न सिर्फ कार्रवाई करवाया बल्कि शमन शुल्क का करोड़ों जमा भी करवाया। जिन लोगों ने 33 अवैध कालोनियों के मालिकों से करोड़ों लेकर उन्हें छोड़ दिया, उनके खिलाफ न तो सचिव और न उपाध्यक्ष की ओर से कोई कार्रवाई की गई, आज भी जब बीडीए की बैठक होती तो तो कमिष्नर/बीडीए के अध्यक्ष की ओर से अवैध कालोनी को ध्वस्त करने के आदेश दिए जाते है। यह सिलसिला पहली बैठक से लेकर 15वीं बैठक तक चला, लेकिन एक भी अवैध कालोनी को ध्वस्त नहीं किया गया, यह उस बीडीए का सच हैं, जिसके अध्यक्ष कमिश्नर, उपाध्यक्ष डीएम और सचिव एडीएम है। सवाल उठ रहा है, कि जब इतने बड़े-बड़े अधिकारियों के रहते बीडीए में भ्रष्टाचार का बोलबाला हो, तो अन्य विभागों में क्या हो रहा होगा, इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। बार-बार सवाल उठ रहा है, कि मीणाजी के बाद क्यों नहीं एक भी सचिव ने बीडीए के भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए कदम उठाया? क्यों कदम उठाने वाले जेई अनिल कुमार त्यागी को वीआरएस लेने के लिए मजबूर किया गया? अधिकारियों के साथ उन तीनों बीडीए के सदस्यों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं, जो बैठकों में तो जाते हैं, लेकिन चाय और समोसा खाने के लिए। आखिर इनकी क्या मजबूरी हैं, जो यह भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई नहीं करवा पाते, अब तो जनता इन्हें भी भ्रष्टाचारियों का साथ देने वालों की श्रेणी में गिनती कर रही है। इन तीनों सूरमा के सामने बीडीए में भ्रष्टाचार चरम पर पहुंचा, और यह लोग मूकदर्शक बने रहे? एक भी सदस्य ने नैतिकता के नाते अभी तक इस्तीफा नहीं दिया, लगता है, कि इन लोगों को बीडीए का चाय और समोसा प्रिय लगने लगा। रामनगर के ब्लॉक प्रमुख यशंकात सिंह आवाज तो उठाते हैं, लेकिन उसके बाद खामोष हो जाते हैं, क्यों खामोश हो जाते हैं, यह सवाल बना हुआ है। बैठक में आवाज उठाने से ही जिम्मेदारी किसी सदस्य की समाप्त नहीं हो जाती, जबकि उसे अंजाम तक न पहुंचाया जाए। जिले के लोगों को आज तक सदस्यों की उपयोगिता समझ में नहीं आया। अगर इनसे कोई सवाल पूछे कि भईया इतने सालों के कार्यकाल में आप लोगों ने बीडीए को क्यों भ्रष्टाचार की आग में जलने दिया?, क्यों नहीं अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन किया? जबाव शायद चुप्पी में ही रहेगा।