बस्ती। चाहें देवरिया के बीएसए और बाबू हों, चाहें बस्ती के बीएसए और बाबू हों या फिर चाहें अन्य जिलों के बीएसए और बाबू हांे, सबों की नजर में पैसा ही सब कुछ हो गया। इन लोगों की नजर में शिक्षकों के जान की कोई कीमत नहीं। लगता है, कि इन लोगों के भीतर से संवेदना पूरी तरह मर चुकी है। मानो यह अपने आप को सामाजिक प्राणी मानते ही नहीं। पैसे ने इन्हें इतना अंधा कर दिया हैं, कि कोई जिए या मरे, इनपर कोई फर्क नहीं पड़ता, भले ही चाहें इनके उत्पीड़न से कोई शिक्षक अपनी जान दे दे या फिर सदमे से उसकी जान चली जाए। यह लोग पैसे के लिए इतना नीचे गिर चुके हैं, कि इनकी नजर में जिंदा इंसान की कोई अहमियत ही नहीं रह गई। इनके लिए पैसा ही सबकुछ है। लगता है, मानो, मरने के बाद यह लोग पैसा साथ में लेकर जाएगे। इन्हें पैसा कमाने के आलावा और कुछ नहीं आता, इन्हें उस षिक्षा की गुणवत्ता से भी कोई लेना देना नहीं, जिससे समाज में इनकी पहचान और रुतबा बना हुआ है, और जिसके चलते यह दिन-रात भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं। यह लोग जब घर से कार्यालय की ओर निकलते हैं, तो कार और बाइक में ही कमाने का एक टारगेट बना लेते है। जिस दिन इनका टारगेट पूरा नहीं होता, उस दिन यह बेचैन हो जाते है। चूंकि इनके रडार पर हजारों शिक्षक रहते हैं, इस लिए टारगेट पूरा न होने का कोई गंुजाइष ही नहीं रहता। टारगेट को पूरा करने में एबीएसए और बाबू इनकी सहयोगी की भूमिका निभाते हैं। भ्रष्टाचार ने बीएसए, एबीएसए और बाबूओं को कहीं का नहीं छोड़ा। समाज और शिक्षकों की नजर में न तो यह एक अच्छा व्यक्तित्व वाला इंसान रह गए, और न अच्छा अधिकारी और बाबू। अधिकारियों और बाबूओं को भ्रष्टाचारी बनाने में बेसिक संगठनों के पदाधिकारियों का बहुत बड़ा योगदान है। अगर योगदान न होता तो यह लोग इतने मनबढ़ न होते। कहने को तो जिले में शिक्षकों के हितों की रक्षा करने के लिए बेसिक के दो मजबूत गुट काम कर रहे हैं, लेकिन इन दोनों गुट के लोग कितना सफल हैं, यह सवाल बना हुआ है, अगर यह शिक्षकों के इतने हितैशी होते तो ‘अखिलेश मिश्र’ के मौत के जिम्मेदार बीएसए और एबीएसए के खिलाफ देवरिया के बीएसए की तरह मुकदमा दर्ज होता। न जाने कितने षिक्षकों का उत्पीड़न बीएसए, एबीएसए और बाबूओं के द्वारा डेली किया जाता हैं, लेकिन आवाज नहीं उठाई जाती। भ्रष्टाचार के खिलाफ मानों दोनों गुटों के नेताओं ने दरी बिछाना ही भूल गए। बीएसए के बाबूओं के बारे में बार-बार कहा जाता है, हर बीएसए इन्हें इस्तेमाल करता है। इन्हीं बाबूओं के जरिए बीएसए अपना टारगेट पूरा करते है। जब भी बीएसए, एबीएसए और बाबूओं का नाम आता है, लोगों के जेहन में भ्रष्ट अधिकारियों की छवि सामने आ जाती है। कहा भी जाता है, कि अगर बीएसए चाह जाएं तो बिना उनकी मर्जी के उनके कार्यालय में एक पत्ता भी नहीं हिल सकता, पांच-दस लाख मांगना तो दूर की बात है। अब जरा अंदाजा लगाइए, कि देवरिया का शिक्षक कृष्ण मोहन सिंह इस लिए फंासी पर लटक जातें है, कि वह बीएसए और बाबू को 16 लाख नहीं दे पातें, बस्ती के शिक्षक अखिलेश मिश्र की जान इस लिए सदमें में चली जाती हैं, क्यों कि बीएसए उसे बहाल नहीं करते, बहाल तब करते हैं, जब जांबाज शिक्षक ‘अखिलेश मिश्र’ की मौत सदमे से हो जाती। मृतक शिक्षक का परिवार इस लिए चुप रहता है, कि उसके परिवार के सदस्य को नौकरी मिल गई, शिक्षक संगठन के पदाधिकारी इस लिए चुप रहे, क्यों कि इन्हें इसी बहाने बीएसए को अपनी वफादारी दिखानी थी। सच पूछिए तो इससे न तो मृतक शिक्षक की आत्मा को शांति मिली होगी और न पीड़ित परिवार को न्याय ही मिला। जिस बस्ती के बीएसए के खिलाफ एफआईआर दर्ज होना चाहिए था, वह संगठनों के पदाधिकारियों के चलते भ्रष्टाचार पर भ्रष्टाचार कर रहा। भले ही चाहें संगठन के पदाधिकारी इस मामले में जो भी सफाई दें, लेकिन समाज की नजर में वह भी बीएसए की तरह गुनहगार माने जा रहें है।