‘आखिर’ अधिकारी ‘एक्षन’ मोड में कब ‘आएगें’ और कब ‘उन्हें’ गुस्सा ‘आएगा’?

बस्ती। जिले की जनता बार-बार सवाल कर रही है, कि अधिकारी आखिर एक्षन मोड में कब आएगें और कब उन्हें गुस्सा आएगा? पूरा जिला भ्रष्टाचार की आग में जल रहा है, लेकिन प्रषासनिक और विकास के अधिकारियों को लगता ही नहीं जिले में भ्रष्टाचार नाम की कोई चीज भी है। पहले के कमिश्नर, डीएम, सीडीओ और एडीएम को गलत बात सुनकर गुस्सा आता है, और त्वरित एक्षन मोड में आ जाते थे, लेकिन आज के अधिकारियों को कोई गुस्सा नहीं आता, अगर कोई मीडिया या आम आदमी भ्रष्टाचार या फिर गलत होने की जानकारी देता है, तो गुस्से में आना तो दूर की बात सुनना तक पसंद नहीं करते, हंसकर टाल जाते है। मीडिया ने जब डीएम और एडीएम को नशे के कारोबारियों के खिलाफ कार्रवाई न होने की बात कही, तो सुनने के बजाए कहा कि एफआईआर दर्ज हो गया, आईओ अपना काम करेगा, अब इन अधिकारियों को कौन समझाने जाए कि आईओ तो कानूनी कार्रवाई करेगा, लेकिन प्रशासनिक कार्रवाई तो प्रशासन के लोग ही करेंगें, बहरहाल, मीडिया को जब अपेक्षित जबाव नहीं मिला तो कहा कि मैडम सच तो यह है, कि आप लोग मीडिया की बात सुनना ही नहीं चाहती, जब कि मीडिया जिले में काम करने का एक आईडिएल माहौल बनाने में आप की मदद कर रहा। कहने लगी कि नहीं हम लोग आपकी बात को एवाइड नहीं कर रहे है। यही मीडिया हैं, जब तत्कालीन डीएम पंकज यादव से कहा था कि हमारे जिले में हवाई अडडे की जमीन पर लोगों ने न सिर्फ कब्जा कर रखा, बल्कि उसे तहसील और चकबंदी वालों की मदद से बेच भी रहे है। सुनते ही नाराज हो गए, लगभग कुर्सी से उठ गए थे, कहा कि हमारे जिले में हवाई अडडे की जमीन पर कब्जा। आप लोगों को जानकर हैरानी होगी कि उन्होंने त्वरित तत्कालीन डीडीसी बाजपेईजी को चंेबर में बुलाया कि कहा कि एक सप्ताह का समय देता हूं, अगर हवाई अडडे की जमीन हवाई अडडे के नाम नहीं हुई, तो पंखे से उल्टा टांग दूंगा। एक सप्ताह कोैन कहे, चार दिन में ही जमीन हवाई अडडे के नाम हो गई, खतौनी लाकर डीएम को दे दिया। उसके बाद हवाई अडडे की जमीन बिकनी बंद हो गई, जो काम पिछले कई सालों से नहीं हो रहा था, और जिसके चलते सरकारी जमीन बेची जा रही थी, वह काम मात्र चार दिन में हो गया। इसी लिए कहा जाता है, कि जब तक अधिकारियों के भीतर काम करने का जज्बा नहीं होगा, तब तक न तो अधिकारी और न जिला आईडिएल बन सकता है। पंकज यादव जैसा जज्बा तत्कालीन डीएम रोशन जैकब में भी था, जिले के अब तक के इतिहास में यह पहली ऐसी डीएम साबित हुई, जिनके कार्यकाल में जनता दरबार में मिलने के लिए टोकन जारी होता था, तीन दिन पहले किसी का नंबर नहीं आता है, स्कूली बच्चे मिलने जाते थे, मैडम, उन्हें चाकलेट देती थी। इनके कार्यकाल में काम करने का एक आईडिएल माहौल, जिले में बना था, यह बात वर्तमान डीएम को भी बताया जा चुका। कहना गलत नहीं होगा कि कमिश्नर और डीएम अपने उस आदेश की भी समीक्षा तक नहीं करते, जो उन्होंने जनता दरबार में फरियादियों के लिए किया था। अधिकारियों को पता ही नहीं रहता कि किस अधिकारी ने उनके आदेश का पालन किया और किसने नहीं किया? क्यों कि ऐसे अधिकारी फरियाकदयों के प्रति संवेंदनशील नहीं होते। कमिश्नर और डीएम को तब पता चलता, जब फरियादी दुबारा यह फरियाद करने आता है, कि साहब आप ने जो आदेश किया था, उसका कुछ नहीं हुआ, फिर आदेष होता और फिर कुछ दिन बाद फरियादी जनता दरबार में पहुंचता है, और कहता है, कि साहब अभी तक आपके आदेश का पालन एसडीएम ने नहीं किया। फिर आदेश होता और फिर फरियादी यह कहने आता हैं, कि साहब क्या करुं, कोई सुनता ही नहीं। अगर साहब लोग दूसरी बार के आने के बाद ही एसडीएम को फोन लगाते और कहते, थे, कि अगर इस बार पालन नहीं हुआ तो तुम्हारी खैर नहीं। जिस तरह से फरियादियों के प्रति अधिकारियों का रर्वैया होता जा रहा है, उससे सरकार की छवि तो खराब हो ही रही है, साथ ही अधिकारी की भी छवि खराब होती। मजबूर होकर पीड़ितांे को यह कहना पड़ता है, ऐसे सीएम और अधिकारी के होने से क्या फायदा जब इनकी बात एसडीएम और लेखपाल नहीं सुनते।