बस्ती। पहले साहूकारों के चक्कर में पड़कर गरीब आत्महत्या करता था, और अब सूदखोरों के उत्पीड़न का षिकार होकर वह अपनी जान दे रहा हैं, समाज और सरकार के दुष्मनों के चलते अब तक न जाने कितने गरीबों के घर बर्बाद हो गए, कितने बेघर हो गए, कितनों की जमीनें बिक गई, कितनों के गहने या तो बिक गए या फिर गिरवी में चला गया, इतनी बर्बादी और उत्पीड़न के बाद भी गरीब कभी सूदखोरों के मूलधन और ब्याज के चंगुल से आजाद नहीं हो पाता। यह सूदखोर इतने बेरहम होते हैं, कि मुखिया के मरने के बाद भी वह बचे परिवार से अपना ब्याज और मूलधन लेने के लिए घर जा धमकते हैं, दबाव बनाते हैं, अपमानित करते हैं, कहते हैं, कि अगर ब्याज और मूलधन नहीं दे सकते तो जमीन या घर हमारे नाम कर दो, या फिर जिस तरह पिता ने आत्महत्या किया उसी तरह तुम भी जाकर मर जाओ। ऐसे में पत्नी या बेटे के सामने मुखिया की तरह आत्महत्या करने के आलावा और कोई रास्ता नहीं बचता। एक बार पत्नी या बेटे को फिर से आत्महत्या करने को मजबूर होना पड़ता है। अब जरा अंदाजा लगाइए, कि अगर परिवार के मुखिया, पत्नी और बेटे को सूदखोंरों के चलते आत्महत्या करना पड़े और उसके बाद भी सूदखोरों का बचे परिवार के सदस्यों पर ब्याज और मूलधन देने का दबाव बनाया जाए तो क्या परिवार का कोई भी सदस्य जिंदा रह पाएगा? इस तरह तो पूरे परिवार को आत्महत्या करना पडेगा। गरीब इतना सबल भी नहीं होता कि वह सूदखोरों के खिलाफ आवाज उठा सके, अगर परिवार का कोई मुखिया आत्महत्या न करे तो किसी को यह भी पता नहीं चल पाएगा, कि गांव के जो लोग अपने आप को बड़ा आदमी और समाज सेवी कहते हैं, असल में वह हैं, क्या? इस लिए गरीब  अपने उपर हुए अन्याय को भगवान के भरोसे छोड़ देता है। रही बात सूदखोरों का उपर वाले के लाडी से डरने की बात तो इन्हें किसी भी भगवान से जरा सा भी डर नहीं लगता, कहते हैं, कि अगर हम लोग भगवान की लाडी से डरने लगे तो फिर फारचूनर से कैसे चलेंगें? इन्हेे फलता फूलता देख यह कहा जा सकता है, कि पैसे के आगे इनके लिए इंसान तो क्या भगवान भी कोई महत्व नहीं रखता। अगर होता तो इन्हें किसी के आत्महत्या पर अफसोस होता और परिवार के पास जाते और संवेदना जताते हुए कहते कि कोई बात नहीं, अब पैसा मत देना। क्या आप लोगों ने किसी सूदखोर के बारे में इस तरह की संवेदना देखा या सुना? जबाव शायद न में ही होगा। जिन सूदखोंरों का परिवार गरीबों के ब्याज के पैसे से भोजन करता हो, वह कहां से और कैसे संवेदनशील हो सकता है? जो सूदखोर बचे अन्य सदस्यों को आत्महत्या करने को मजबूर करें, वह कैसे बड़ा आदमी या वरिष्ठ समाज सेवी हो सकता है? ध्यान देने वाली बात यह है, कि कोई भी गरीब जरुरतमंद मौज मस्ती के लिए सूद पर पैसा नहीं लेता, और जो सूद पर पैसा लेता है, वह इतना मजबूत नहीं होता कि समय से मूलधन को वापस कर सके, मूलधन की तो छोड़िए ब्याज की रकम भी नहीं लौटा पाता, यही वे लोग होते हैं, जिन्हें सूदखोंरों के चलते आत्महत्या करने को मजबूर होना पड़ता है। जब आप माह का दस फीसद यानि साल का 150 फीसद ब्याज लेगें तो गरीब आत्महत्या करेगा ही, पोखरभिटवा में जो गरीब ने आत्महत्या किया, उसके पीछे 150 फीसद सालाना ब्याज लेना बताया जाता है। अगर सूदखोर अपमानित और आत्महत्या के लिए न उकसाए तो न जाने कितने गरीबों की जिंदगियां बच सकती है। गरीबों को इतना अपमानित किया जाता, जैसा कि पोखरभिटवा में देखने को मिला, कि इनके सामने दुनिया छोड़ने के आलावा और कोई रास्ता नहीं बचता। इन्हें आत्महत्या करने के लिए विवष किया जाता है। ऐसे भी मामले सामने आए, जब परिवार के मुखिया और उसके बेटा या पत्नी को सूदखोरों के चलते आत्महत्या करनी पड़ी। अगर सूदखोरों का बस चले तो यह पूरे खानदान को आत्महत्या करने के लिए विवष कर दें। सूदखोंरों को अच्छी तरह मालूम हैं, कि ब्याज पर पैसा देना अपराध की श्रेणी में आता है, लेकिन यह लोग धन के लालच में न सिर्फ अपराध पर अपराध किए जा रहे हैं, बल्कि गरीबों की जान लेने का कारण भी बनते जा रहे है। अधिकांश सूदखोर सफेद पोश की श्रेणी में आते है। पूरे जिले में सूदखोरों ने ब्याज पर पैसा देने का अवैध धंधा बना लिया। गांव से लेकर शहर तक इनका साम्राज्य फैला हुआ है। इनकी चपेट में गरीब से लेकर अमीर तक आ चुके है। हाल ही में पेटांल पंप के मालिक को सूदखोरों के चलते आत्महत्या करना पड़ा, उसके बाद भी परिवार पर बकाए का एफआईआर दर्ज करवा दिया। मेरी जानकारी में कई भाजपाई भी ब्याज पर पैसा देने का धंधा कर रहें है।