बस्ती। पत्नी अगर प्रधान है, और पति कोटेदार तो दोनों मिलकर लूटेगें ही, पत्नी प्रधान मनरेगा को लूटेगी तो पति कोटेदार गरीबों का अनाज लूटेगें। पति कोटेदार का नाम गुलाम हुसैन तो पत्नी प्रधान का नाम हसीना बानो है। मामला साउंघाट के ग्राम पंचायत सोनहटी बुजुर्ग का है। अगर दोनों लूटते नहीं तो कैसे अकूत संपत्ति के मालिक बनते। अब सवाल उठ रहा है, कि कैसे पति के कोटेदार रहते पत्नी दो बार पिछले दस साल से प्रधान चुनती आ रही है। क्या इतने सालों में किसी ने इसकी शिकायत नहीं कि, की कोटेदार की पत्नी प्रधान नहीं हो सकती और प्रधान का पति कोटेदार नहीं हो सकता। पता चला कि गांव वालों ने इसकी शिकायत एसडीएम से लेकर डीएम और कमिश्नर से लेकर मुख्यमंत्री तक किया, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला, क्यों कि जितने भी शिकायतें उपर की की गई, उपन सभी का निस्तारण करने के लिए सांउघाट विकास खड़ अधिकारी के पास भेज दिया जाता, चूंकि एडीओ पंचायत सहाबुदीन प्रधान और कोटेदार के रिश्तेदार हैं, इस लिए फर्जी और भ्रामक रिपोर्ट लगाकर निस्तारित कर दिया जाता रहा है, रही बात बीडीओ और सचिव की तो इन दोनों का मुंह नोटों से बंद कर दिया जाता रहा, वर्तमान एसडीएम हिमांशु कुमार ने जांच करवाकर 13 मई 26 को कोटा निरस्त कर दिया, जाहिर सी बात हैं, कि अगर एसडीएम ने कोटा निरस्त किया हैं, तो काफी छानबीन के बात किया होगा, कोटा निरस्त करने से पहले एसडीएम ने नोटिस के जरिए कोटेदार को अपना प़क्ष रखने को कहा, लेकिन कोटेदार ने कोई पक्ष नहीं रखा, और जब यह मामला अपर आयुक्त प्रषासन के पास जाता हैॅ, उन्होंने यह कहते हुए एसडीएम के आदेष को निरस्त कर दिया, कि एसडीएम ने कोटेदार का पक्ष नहीं सुना और एक तरफा निर्णय लेते हुए कोटा को निरस्त करने का आदेष दे दिया। अब जरा अंदाजा लगाइए, कि शिकायतकर्त्ता शपथ-पत्र के साथ एसडीएम को नोटिस लगाकर जबाव देता है, लेकिन अपर साहब का भी मानो नोटों से मुंह बंद कर दिया गया होगा, तभी तो अपर साहब ने एसडीएम के आदेश को निरस्त कर दिया, यह पहला मामला नहीं हैं, जब कोटा निरस्त करने के मामले में कमिश्नरी न्यायालयों में बहाली के लिए सौदा किया जाता है। कहना गलत नहीं होगा, कि चकबंदी न्यायालय की तरह कमिष्नरी न्यायालयों में भी न्याय बिकने लगा, अगर ऐसा नहीं होता तो तत्कालीन अपर आयुक्त प्रशासन पत्रावली बेचकर नहीं जाते। अब जरा अंदाजा लगाइए कि गांव वाले बयान दे रहे हैं, कि कोटेदार गुलाम हुसैन और पत्नी प्रधान हसीना बानो दोनों पति और पत्नी हैं, और दोंनों साथ में रहते भी है, लेकिन अपर साहब यह मानने को तैयार नहीं कि दोनों पति और पत्नी की तरह एक साथ रहते हैं, यह तो उस दस रुपये के स्टांप को सच मान रहे हैं, जिसमें तलाक देने की बात कही गई। चूंकि अपर साहब को सच्चाई देखना ही नहीं था, इस लिए उन्होंने अपनी आंख को पूरी तरह बंद कर लिया, और एक ऐसा निर्णय दिया, जिससे न्याय की हत्या की हत्या हुई, एक ऐसे पति और पत्नी को लूटने का मौका दे दिया, जो सालों से लूटते आ रहे है। अपर साहब ने यह तक नहीं देखा कि जब कोटेदार ने प्रधान पत्नी को तलाक दे दिया तो तलाक के एक साज 13 दिन बाद कैसे हसीना बानो को बच्चा हो गया, और जिसका सबूत परिवार रजिस्टर में बच्चे के पिता का नाम गुलाम हुसैन लिखा हुआ है। इस फर्जीवाड़े में क्षेत्र के जिला पंचायत सदस्य और उनके प्रतिनिधि भी शामिल है। इन दोनों ने लिखकर दिया कि प्रधान और कोटेदार अलग-अलग रहते हैं, इन दोनों में पति और पत्नी का कोई रिश्ता नहीं है। अगर अपर साहब, बीडीओ, एडीओ पंचायत और सचिव बिक सकते हैं, तो अगर जिला पंचायत सदस्य और नकली प्रतिनिधि बिक गए तो कौन सी बड़ी बात है। वैसे इस मामले में एसडीएम ने षिकायतकर्त्ता को साक्ष्य उपलब्ध कराने के लिए नोटिस जारी किया हैं, अगर साक्ष्य के आधार पर एसडीएम साहब को निर्णय करना होगा, तो उन्हें एक मिनट भी नहीं लगेगा, लेकिन अगर यह अन्य लोगों की तरह बिक गए तो इनमें और अपर साहब में कोई फर्क नहीं रह जाएगा। अपर साहब डीजीसी क्रिमिनल दुर्गा प्रसाद उपाध्याय के दलीलों उनके द्वरा प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों का भी अध्यन नहीं किया, जब कोई अधिकारी सरकारी अधिवक्ता को अनसुना करता है, तो यह माना जाता है, कि अधिकारी विपक्ष से लाभान्वित हो गया, वरना ईमानदार अधिकारी सबसे पहले सरकारी वकील की सुनता है, क्यों कि सरकारी वकील कभी सरकार के विरोध में नहीं जा सकता, अपर साहब को भी इस बात का जबाव देना होगा कि क्यों उन्होंने फैक्ट को दरकिनार किया और डीजीसी की बात को नहीं माना।