बस्ती। जब भी बस्ती की राजनीति का जिक्र होगा, उसमें सबसे कमजोर आज के विपक्ष का नाम आएगा, एक ऐसा विपक्ष जिसके पास चार विधायक और एक सांसद हो, और उसके बाद भी विपक्ष नजर न आए, तो समझा जा सकता है, कि आज के विपक्ष को क्यों लोग इतना कमजोर मान रहे है। कहना गलत नहीं होगा कि बस्ती के विपक्ष को सरकार से टकराने की हिम्मत ही नहीं है। यह लोग सदन में हमला बोलते हैं, और न बाहर सड़क पर ही उतरते है। जब कि सत्ता के खिलाफ जाकर जनता ने इन्हें माननीय बनाया, लेकिन बाद में जनता को लगा कि उसे तो उसके ही माननीयों ने ठगा। क्यों कि जनता ने जिसे माननीय बनाया वही सत्ता पक्ष की गोद में जाकर बैठ गया। आज जिले भर की जनता गैस, खाद, बिजली, ईधन और गन्ना भुगतान को लेकर धरने पर बैठ रही हैं, और जिन विपक्ष के लोगों को धरने पर बैठना चाहिए, वे मौज कर रहे है। निधि बेच रहे हैं, निधि के जीएसटी में कमीशन मांग रहे है। सो रहे है। अगर यही विपक्ष है, तो फिर जनता से बहुत बड़ी भूल और चूक हुई। खुले आम थानों और तहसीलों में एक आम आदमी शोषण का षिकार हो रहा है, और आज तक एक भी विपक्ष का नेता न तो तहसील के सामने और न थाने पर धरना प्रर्नशन किया, क्या इसी को विपक्ष कहतें हैं, और क्या यही विपक्ष 2027 में सत्ता हासिल करने का सपना देख रही है। अगर 2027 में जिले से विपक्ष का सफाया होता है, तो इसके लिए कोई और नहीं बल्कि पार्टी के मुखिया जिम्मेदार होगें। मुखिया के सपने को कम से कम बस्ती का विपक्ष तो पूरा नहीं होने देगा। जिन कारणों से सत्ता पक्ष के चार विधायक हारे, वही कारण 2027 में विपक्ष के लिए बनता जा रहा है। विपक्ष का विधायक अपने आप को सत्ता पक्ष का मानकर कोई मुद्वा ही नहीं उठाता। डा. लोहिया ने कहा भी है, कि अगर सड़कें सूनी हो जाएगी तो संसद आवारा हो जाएगा। विपक्ष का दौड़ अधिकारियों को ज्ञापन देने तक ही सीमित रह गया है। इनका यह कहना कि इस सरकार में उनकी कोई नहीं सुनता, अगर कोई सुनता तो क्यों नहीं इस्तीफा दे देते? यह ऐसा कहकर या तो यह समझते हैं, कि जनता बेवकूफ हैं, या यह खुद कों बेवकूफ समझ रहें है। इन्हें निधि में कमीशन और जीएसटी में कमीशन मांगना तो आता है, लेंकिन जनता के मुद्वे को उठाना इन्हें नहीं आता। यह लोग निधि के कमीषन से न्यौता हकारी करते हैं। ऐसा लगता है, कि मानों विप़क्ष जनता के बीच रहना ही भूल गया। आवाज उठाना तो दूर की बात हैं, बयान तक जारी नहीं करते। मीडिया से दूर भागते, ताकि इन लोगों को चडडी और बनियाइन न उतर जाए। बाप और बेटे उदघाटन और न्यौहकारी में तो एक साथ दिखते हैं, लेकिन पार्टी के छोटे कार्यक्रमों में जहां पर कार्यकर्त्ताओं का इनके जाने से मनोबल बढ़ता है, नहीं जाते, यह सिर्फ बड़े मंच पर एक साथ दिखाई देते है। कम से कम ऐसे हालात में इन्हें एक ही मंच पर एक साथ होकर सत्ता पक्ष की सरकार को ललकारना चाहिए। बताना चाहिए, कि बस्ती का विपक्ष उतना कमजोर नहीं हैं, जितना सत्ता पक्ष वाले समझते है। महिने दो महिने में ज्ञापन देने के लिए न्याय मार्ग पर एकत्रित हो जाते है। उसी दिन जनता विपक्ष के लोगों को देख पाती है। इनका पैदल मार्च सिर्फ 100 मीटर का होता है। आज के ज्ञापन कार्यक्रम में भी सांसदजी मौजूद नहीं रहे।